बालिका दिवस विशेष : फूलों की महकती क्यारियां, हमारी-आपकी बेटियां


संयुक्त परिवार, यानी भारतीय संस्कृति की एक ऐसी समृद्ध परंपरा जिसका मुकाबला दुनिया के किसी भी देश की कोई भी संस्कृति नहीं कर सकती। भारत में संयुक्त परिवार की अवधारणा एक गहन संस्कार के रूप में स्वीकारी गई है। एक विराट बगिया की तरह, जहाँ हर प्रकार के फल और औषधि के वृक्ष भी हैं और सुंदर सुकोमल फूलों की महकती क्यारियां भी। एक परिवार, जहाँ दादा-दादी की अनुशासन कायम करती उपस्थिति भी है और नन्हे नटखटों की मस्ती भरी किलकारियां भी। कहीं एक साथ बनते व्यंजनों की खुशबू है तो कहीं एक साथ कूटते मसालों की गूँजती ध्वनियां।

संयुक्त परिवार में जहाँ सुख-दुख साँझे होते हैं वहीं जीवन के प्रति एक सुलझी हुई समझ भी यहीं विकसित होती है। संयुक्त परिवार सिखाता है कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव जीवन और जीव से बढ़कर नहीं होते। यही वजह है कि संयुक्त परिवार में रह रहे बच्चों में जीवन के प्रति एक गहरी सोच होती है। बात जब बालिका-शिशु से लेकर अल्हड़ किशोरी और किशोरी से लेकर गंभीर युवती की हो तो संयुक्त परिवार की महत्ता सहज ही सामने आ जाती है।
जिस दिन जन्म लेती है वह नन्ही कली, एक साथ कई नामों और उपनामों से आँगन गूँज उठता है। किसी के लिए कलिका, भोली, चंचल परी, पाँखुरी गुलाब की, डोर रेशम की, हीरे की कनी, चौरे में सजी तुलसी, दहलीज की रंगोली, पूजा की रोली या हरसिंगार पर चहकती रंगीन चि‍ड‍़‍िया, तो किसी के लिए लाड़ो, बेटू,‍ चिकी, गुड्डी और गु‍ड़‍िया!
गोद से उतरते ही जब वह गुलाब‍ी पैरों से डगमगाकर चलना शुरू करती है तो बुआ, चाची, दादी, ताई के साथ-साथ चचेरे भाई-बहनों की एक लंबी फौज होती है उसे थामने के लिए। लेकिन ठोकर लगने पर उसे गोद में उठाने के बजाय फिर उठकर चलने के लिए प्रेरित करते हैं उसके चाचा, दादा, ताऊ और बड़े भाई। यही तो खासियत होती है संयुक्त परिवार की जहाँ एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का ना सिर्फ निर्माण होता है बल्कि विकास और रक्षण भी। जहाँ अकेलेपन को थामने के लिए कई हाथ आगे आ जाते हैं वहीं स्वयं को समझने के लिए समयानुसार प्रशिक्षण भी यहीं मिलता है।
खासकर उम्र के सबसे कच्चे और कोमल दौर में जब किशोरी में भावनाओं का उद्दाम आवेग होता है, जब उन्माद और उत्साह में भेद कर पाना संभव नहीं होता, जब प्रेम और छलावा एक रूप में दिखाई पड़ते हैं तब संयुक्त परिवार की अनुभवी महिलाओं का साथ उसे संबल देता है। उम्र के हर छोटे-बड़े बदलावों को वह सहजता से लेना सीखती है। शारीरिक परिवर्तनों पर हो रहे कौतुक को अपनी हमउम्र बहनों के साथ बाँटकर स्वाभाविक विकास की राह पर आगे बढ़ती है। एकल परिवार में जहाँ मुसीबत में उचित-अनुचित का अंतर समझाने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं होता वहीं संयुक्त परिवार में उसकी छोटी से छोटी परेशानी भी किसी से छुपी नहीं रह सकती।
यहाँ वटवृक्ष की तरह पितामह यानी दादाजी होते हैं जिनकी सुखद छाँव तले यही नन्ही पौध जीवन-रस पाती हैं। दादी होती है जिनके पिटारे में अनुभवों के बहुमूल्य रत्न छुपे होते हैं जिसे वह हमेशा अपनी पोती से ही बाँटना पसंद करती है। चाचा, ताऊ और बड़े भाईयों की सुरक्षा प्रदान करती कतार होती है जिनके रहते उसे समाज की उन विषमताओं का सामना नहीं करना पड़ता जो एकल परिवार की किशोरियों को करना पड़ता है। यह कड़वा सही मगर समाज का सच है इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
विवाह की दहलीज तक आते-आते वह हर अनिवार्य गुणों को खुद में सहजता से पाती है जो सुयोग्य बहू में अपेक्षित होते हैं। उसे किसी कोचिंग, कोर्स, या क्लासेस की जरूरत नहीं होती। संयुक्त परिवार में रहते हुए धीरे-धीरे कब वह सब चीजें सीख जाती है खुद उसे भी नहीं पता चलता। यहीं उसमें धैर्य, सहनशीलता, सबको साथ लेकर चलने का गुण, अपनी चीजों को सबमें बाँटने का भाव और अन्य कौशल विकसित होते हैं जो एकल परिवार की कन्याओं में असंभव तो नहीं मगर मुश्किल जरूर होते हैं।
संयुक्त परिवार में नन्ही कली पारिवारिक गुणों को तो आत्मसात करती ही है बल्कि जीवन को सही ढंग से, सही दिशा में जीने की कला सीख कर अपने व्यक्तित्व में भी निखार लाती है। बढ़ती आत्महत्याएँ, वैवाहिक विसंगतियाँ, गलत फैसले और दूषित संस्कारों के बीच संयुक्त परिवार की अहमियत और अधिक बढ़ जाती है। भारतीय समाज को उनकी यह अनमोल देन हो सकती है कि वह अपनी बालिकाओं को अपनी समस्त वैचारिक धरोहरों के साथ संस्कारित करें और समाज की हर विपरित परिस्थिति का सामना करने की दक्षता विकसित करें। संयुक्त परिवार में ही बालिका का कोमल व्यक्तित्व एक कलात्मक निखार पा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं।
बेटियाँ शुभकामनाएँ हैं, बेटियाँ पावन दुआएँ हैं।
बेटियाँ जीनत हदीसों की, बेटियाँ जातक कथाएँ हैं।
बेटियाँ गुरुग्रंथ की वाणी, बेटियाँ वैदिक ऋचाएँ हैं।
जिनमें खुद भगवान बसता है, बेटियाँ वे वन्दनाएँ हैं।
त्याग, तप, गुणधर्म, साहस की बेटियाँ गौरव कथाएँ हैं।
मुस्कुरा के पीर पीती हैं, बेटी हर्षित व्यथाएँ हैं।
लू-लपट को दूर करती हैं, बेटियाँ जल की घटाएँ हैं।
दुर्दिनों के दौर में देखा, बेटियाँ संवेदनाएँ हैं।
गर्म झोंके बने रहे बेटे, बेटियाँ ठण्डी हवाएँ हैं।
- अजहर हाशमी



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