पुष्कर सिंह धामी भी नहीं तोड़ पाए उत्तराखंड का मिथक, BJP के सामने यक्षप्रश्न- कौन होगा अगला CM?

एन. पांडेय| Last Updated: गुरुवार, 10 मार्च 2022 (19:55 IST)
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में आज हुई विधानसभा 2022 की मतगणना में एक बार फिर भाजपा सरकार बनने की ओर अग्रसर है। इस चुनाव में जनता ने जहां सीएम पुष्कर सिंह धामी को बाहर का रास्ता दिखा दिया, वहीं कांग्रेस की ओर से सीएम के दावेदार पूर्व सीएम हरीश रावत एवं आप पार्टी के सीएम दावेदार कर्नल अजय कोठियाल को भी नकार दिया।

यह तय है कि सत्ताधारी भाजपा फिर से सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में आती दिखाई दे रही है। हालांकि सत्तारूढ़ भाजपा के पास अभी यह यक्षप्रश्न खड़ा है कि प्रदेश का अगला सीएम कौन होगा, क्योंकि निवर्तमान मुख्यमंत्री चुनाव हार गए।
उत्तराखंड में सियासत से जुड़े कई मिथक जुड़े हुए हैं। ऐसा ही एक मिथक उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों से भी जुड़ा हुआ है। दरअसल, जो भी मुख्यमंत्री रहते हुए लड़ता है, वह चुनाव जीत नहीं पाया है। 2012, 17 के बाद 2022 के चुनाव में यह मिथक कायम रहा। पिछले 3 विधानसभा चुनावों से यह सिलसिला चला आ रहा है।

2012 में भुवनचन्द्र खंडूरी मुख्यमंत्री रहते हुए कोटद्वार विधानसभा से कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी से चुनाव हार गए थे। इसके बाद वर्ष 2017 में हुए चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री कांग्रेस के हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते हुए हरिद्वार जनपद की हरिद्वार ग्रामीण और उधमसिंह नगर की किच्छा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे, लेकिन ये दोनों ही सीटों पर चुनाव हार गए।


2022 के चुनाव में भी ऐसा ही सामने आया है। मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव में न जीतने का यह मिथक कायम रहा। इस बार के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्करसिंह धामी उधमसिंह नगर की खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे।
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Chief Minister faces bite the dust in ##ElectionResults #Election2022 #UttarakhandElections2022 - IANS (@IANS) 10 Mar 2022
हालांकि यहां से मुख्यमंत्री पूर्व के दो चुनाव जीते भी। यह उनकी परंपरागत सीट रही है। इससे पहले हुए 2012 और 17 में इसी विधानसभा से चुनाव जीते थे और तीसरी बार में बतौर मुख्यमंत्री चुनाव मैदान में थे,
लेकिन कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भुवन कापड़ी से चुनाव हार गए।

कुल मिलाकर पिछले तीन विधानसभा चुनावों से उत्तराखंड राज्य में यह मिथक चल ही रहा है कि जो भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव मैदान में उतरता है वह चुनाव नहीं जीत पाता है। इस बार भी यह सच ही साबित हुआ।



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