फायर ब्रांड नेता संगीत सोम की हैट्रिक के बीच फंसे स्पीड ब्रेकर

हिमा अग्रवाल| पुनः संशोधित मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022 (00:12 IST)
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिन 58 सीटों पर पहले चरण का होना है, उसमें कुछ सीटें ऐसी हैं जिन पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। इनमें से ही एक सीट है मेरठ जिले की सरधना विधानसभा सीट। इस सीट पर 1977 से पहले कांग्रेस का कब्जा था लेकिन उसके बाद सिर्फ एक बार कांग्रेस के खाते में गई जबकि सबसे ज्यादा बार यहां भाजपा ने अपना परचम लहराया।
भाजपा नेता ने यहां से लगातार तीन बार जीतकर हैट्रिक लगाई थी जबकि यहां से वर्तमान विधायक दो बार लगातार चुनाव जीते हैं और इस बार उनके पास हैट्रिक लगाने का स्वर्णिम अवसर है। पर क्या उनका और भाजपा का यह स्वप्न पूरा होगा। इसका सही उत्तर तो परिणाम आने पर मिलेगा लेकिन सरधना के इतिहास और वर्तमान के साथ चुनावी गणित को समझना रोचक भी है और महत्वपूर्ण भी।

सरधना वो ऐतिहासिक नगर है जहां की बेगम समरू ने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और आज भी उनके नाम पर बना ऐतिहासिक चर्च देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करता है। सरधना आम के बागान और टेक्सटाइल उद्योग के लिए मशहूर है। यहां हैंडलूम और पावरलूम पर बुनकर दिन-रात जुटे रहते हैं। यहां समृद्ध व्यापारी भी हैं और असरदार नेता भी लेकिन जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए भी आस लगाए बैठी रहती है।

आपको सुनकर हैरानी हो सकती है कि यहां बस अड्डा तक नहीं है लेकिन बसों का आवागमन होता है। यहां लड़कों की उच्च शिक्षा के लिए डिग्री कॉलेज भी नहीं है जबकि यहां से दो बार जीत चुके विधायक संगीत सोम फायर ब्रांड नेता हैं। हमेशा चर्चा में रहते हैं और दबंगई में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है। इन स्थितियों में दबंग हिंदू नेता की छवि वाले संगीत सोम क्या प्रोफेसर रवींद्र पुंडीर के रिकॉर्ड की इस बार बराबरी कर पाएंगे। उनके लिए निश्चय ही यह एक चुनौती है।

चुनौती तो यह संगीत सोम के लिए है लेकिन पहले हम इस सीट के चुनावी गणित को समझ लेते हैं। मुजफ्फरनगर और मेरठ के बीच की इस सीट पर पिछली बार संगीत सोम ने करीब 20 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी। तब उनका मुकाबला तेजतर्रार छात्र नेता रहे अतुल प्रधान से हुआ था जो लगातार दूसरे नंबर पर रहकर चुनाव हारे। यहां मुकाबला त्रिकोणीय था जिसमें चर्चित मुस्लिम नेता याकूब कुरैशी और दूसरी बार उनके पुत्र इमरान बसपा के प्रत्याशी थे। दोनों बार समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोटों का थोड़ा हिस्सा ही मिल पाया था।

सरधना विधानसभा पर 2022 के आंकड़ों के मुताबिक तीन लाख 57 हजार 36 मतदाता हैं। जिनमें से एक लाख 63 हजार 104 मतदाता महिला हैं, जबकि एक लाख 93 हजार 857 मतदाता पुरुष हैं। अनुमान है कि इस सीट पर 75 हजार मतदाता मुस्लिम, 50 हजार ठाकुर, 65 हजार दलित, 35 हजार गुर्जर, 30 हजार सैनी, 10 से 15 हजार ब्राह्मण और 15 हजार जाट वोट हैं।

यहां यह गौरतलब है कि संगीत सोम ठाकुर हैं तो अतुल प्रधान गुर्जर समुदाय से आते हैं, जबकि बसपा से संजीव धामा चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस ने पूर्व विधायक सैयद जकीउद्दीन के सुपुत्र रिहानुद्दीन को अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा एआईएमआईएम से ज़ीशान आलम प्रत्याशी हैं। यहां यह गौरतलब है कि इस बार बसपा ने जाट प्रत्याशी को टिकट दिया है जिनकी संख्या इस सीट पर बहुत कम है।

ऐसे में गठबंधन प्रत्याशी अतुल प्रधान को मिलने वाले जाट वोटों का बंटवारा हो सकता है लेकिन 75 हजार मुस्लिम मतदाता अहम हैं। अगर कांग्रेस और एआईएमआईएम के प्रत्याशी उसमें से बड़ा शेयर खींच पाते हैं तो भाजपा की जीत का रास्ता आगे बढ़ सकता है। काफी जाट मतदाताओं की किसान आंदोलन के चलते भाजपा से नाराजगी है लेकिन अगर बसपा उसमें सेंध लगाती है तो यह वोट तीन जगह बंट सकता है लेकिन वैसे भी इस सीट पर जाट बिरादरी इतनी प्रभावी नहीं है।

सवाल है कि क्या मुस्लिमों का वोट इस बार एआईएमआईएम या कांग्रेस को भी जाएगा और जाएगा तो कितना? यही वह असली पेंच है जिस पर आकर संगीत सोम की हैट्रिक निर्भर करती है। महंगाई, किसान आंदोलन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी स्पीड ब्रेकर बनकर भाजपा के रास्ते में खड़े हैं। ऐसे में परिणाम आने का इंतजार ही करना होगा। देखते हैं कि अतुल प्रधान की बेदाग छवि और निरंतर जनता के बीच बने रहना उनके लिए एक्सीलेटर का काम करता है या स्पीड ब्रेकर प्रभावी होते हैं।



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