एक नजर बनारस की 8 विधानसभा सीटों पर

संदीप श्रीवास्तव| पुनः संशोधित मंगलवार, 7 मार्च 2017 (14:54 IST)
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जिला : बनारस 
विधानसभा : 8 सीटें
कुल मतदाता : 27,79,103
पुरुष मतदाता : 15,34,284
महिला मतदाता : 12,44,695
अन्य : 124
 
वाराणसी वो जिला है जिसकी मिट्‍टी व पानी से सींची गई कई विभूतियां भारत भर में नाम कमा कर रही हैं। ये वो जनपद है जिसने देश को दो प्रधानमंत्री दिए। एक स्व. लालबहादुर शास्त्री और दूसरे नरेंद्र मोदी। की सभी आठों विधानसभा सीटों पर पूरे देश के राजनीतिज्ञों की निगाह लगी है, क्योंकि नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट होने के नाते मोदी की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। 
पिछली विधानसभा के चुनाव परिणामों को देखें तो बनारस की 8 विधानसभा सीटों में से 3 भाजपा, 2 बसपा, 2 सपा व एक कांग्रेस को मिली थी। अब इस बार के चुनाव में उत्तरी विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रवीन्द्र जायसवाल, कांग्रेस से अब्दुल समद व बसपा से सुजीत मौर्य चुनाव मैदान में हैं। कैंटोमेंट सीट पर सोरभ श्रीवास्तव को भाजपा, तो कांग्रेस ने अनिल श्रीवास्तव व बसपा ने मुस्लिम कैंडिडेट के रूप में रिजवान अहमद को टिकट दिया है। 
 
रोहनिया विधानसभा सीट पर सपा ने विधायक महेंद्र पटेल को प्रत्याशी बनाया, भाजपा ने सुरेंद्र नारायणसिंह, बसपा ने प्रमोद सिंह व अपना दल कृष्णा गुट की मुखिया कृष्णा पटेल चुनाव मैदान में हैं। शिवपुरी सीट पर भाजपा के अनिल राजभर, बसपा के वीरेन्द्रसिंह व सपा से आनंद मोहन मैदान में है, जबकि सबरी विधानसभा से सपा के सुरेंद्र पटेल, अपना दल के नीलरतनसिंह पटेल व बसपा से महेंद्र कुमार पांडेय हैं। पिंडरा सीट पर कांग्रेस ने अजय राय को उम्मीदवार बनाया है, जो कि लोकसभा चुनाव में मोदी के विरुद्ध मैदान में थे। इस सीट पर भाजपा से अवधेशसिंह तो बसपा से बाबूलाल पटेल चुनाव मैदान में हैं। 
 
अजगरा आरक्षित सीट पर बसपा ने विधायक त्रिभुवन राम को टिकट दिया है। भाजपा ने कैलाशनाथ को व सपा और कांग्रेस के संयुक्त प्रत्याशी लालजी सोनकर मैदान में हैं। दक्षिणी सीट पर पर भाजपा के लगातार सात बार से विधायक रहे श्यामदेव राय चौधरी का टिकट पार्टी ने काटकर नीलकंठ तिवारी को टिकट दिया, जिसका विरोध अभी तक शांत नहीं किया जा सका है। कांग्रेस ने पूर्व सांसद डॉ. राजेश मिश्रा को प्रत्याशी बनाया है, बसपा के राकेश त्रिपाठी चुनाव मैदान में हैं।  वाराणसी की सभी 8 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है, जबकि भाजपा को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि फैसला तो मतदाता ही करेंगे कि कौन कितने पानी में है।



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