सावन का आखिरी सोमवार : उज्जैन महाकाल सवारी के बारे में 10 खास बातें

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: सोमवार, 16 अगस्त 2021 (13:43 IST)
उज्जैन में विश्व प्रसिद्ध महाकाल ज्योतिर्लिंग स्थित है, जहां हर श्रावण और भाद्रपद में बाबा महाकाल की सवारी निकाली जाती है। इस बार 7 वर्ष बाद यह संयोग बन रहा है कि दोनों माह में 7 सोमवार रहेंगे तो बाबा की सवारी भी 7 सोमवार को निकाली जा रही है। आओ जानते हैं इस सवारी के बारे में 10 खास बातें।


1. श्रावण माह का पहला सोमवार 26 जुलाई, दूसरा 2 अगस्त, तीसरा 9 अगस्त को था अब चौथा 16 अगस्त, पांचवां 23 अगस्त को रहेगा। छठा सोमवार 23 अगस्त को रहेगा। 23 अगस्त से भौदो माह अतर्थात भाद्रपद प्रारंभ हो जाएगा। फिर 30 अगस्त श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी के दिन सोमवार रहेगा और फिर 6 सितंबर को अंतिम शाही सवारी के दिन सोमवती अमावस्या का महासंयोग बन रहा है। इसे कुशग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं।

2. हालांकि कोरोना वायरस की महामारी के चलते पिछले साल श्रावण मास में केवल परंपराओं का निर्वहन किया जा रहा है। श्रावण महोत्सव लगातार दूसरे साल स्थगित रहा। इस बार भी प्रशासन पारंपरिक मार्ग छोड़कर बीते वर्ष की तरह बड़े गणेश मंदिर के सामने नए मार्ग से सवारी निकाल रहा है।
3. शाही सवारी पर सोमवती अमावस्या का संयोग होने से शिप्रा स्नान व सवारी में भाग लेने का खासा महत्व रहेगा। प्रशासन ने शिप्रा व सोमकुंड में स्नान तथा शाही सवारी में लोगों के आने पर सख्ती कर रखी है।

4. महाकाल की हर सवारी में बाबा का स्वरूप अलग-अलग होता है। जैसे चंद्रमौलेश्वर रूप, रुद्र रूप, भैरव रूप आदि।

5. श्रावण माह में महाकाल बाबा नगर भ्रमण को निकलत हैं और यह परंपरा वर्षों पुरानी है। पहले श्रावण मास के आरंभ में सवारी नहीं निकलती थी, सिर्फ सिंधिया वंशजों के सौजन्य से महाराष्ट्रीयन पंचाग के अनुसार दो या तीन सवारी ही निकलती थी। विशेषकर अमावस्या के बाद ही यह निकलती थी।
6. बाद में उस समय के कलेक्टर श्री एमएन बुच साहब ने कांड ज्योतिषाचार्य पद्मभूषण स्व. पं. सूर्यनारायण व्यास और पुजारी सुरेन्द्र पुजारी के पिता के साथ मिलकर सवारी को भव्य रूप दिया और यह भी तय किया कि सवारी श्रावण के प्रथम सोमवार से ही प्रारंभ होगी।

7. सवारी का पूजन-स्वागत-अभिनंदन शहर के बीचोबीच स्थित गोपाल मंदिर में सिंधिया परिवार की और से किया जाता रहा है जो आज भी जारी है। पहले महाराज स्वयं शामिल होते थे। बाद में राजमाता नियमित रूप से आती रहीं। आज भी उनका कोई ना कोई प्रतिनिधित्व सम्मिलित रहता है।
8. सवारी के दौरराम बाबा महाकाल चांदी की पालकी में भ्रमण करते हैं। सवारी निकलने के पूर्व श्री महाकालेश्वर मंदिर के सभामंडप में भगवान के श्री मनमहेश स्वरुप का पूजन-अर्चन मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष, पुजारी एवं कलेक्टर द्वारा संपन्न कराया जाता है। तब बाबा की राजसी ठाट बाट के साथ सवारी निकलती है।

9. महाकाल बाबा को उज्जैन का राजा माना जाता है। अत: इस सवारी में कलेक्टर का शामिल होना जरूरी होता है। मंदिर के द्वार पर राजाधिराज को सशस्त्र बल की टुकड़ी द्वारा सलामी दी जाती है। इसके बाद ही सवारी रामघाट की ओर रवाना होती है।
10. मान्यता है कि महाकाल सवारी के जरिए अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं क्योंकि महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है। पालकी मुख्य द्वार से निकलती है। जहां पर बाबा महाकाल को गॉड ऑफ ऑनर दिया जाता है। इसके बाद महाकाल प्रमुख मार्गों से होते हुए शिप्रा नदी के तट रामघाट पहुंचते हैं। वहां पर मां शिप्रा के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है। इसके बाद सवारी वापस मंदिर लौट जाती है।



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