भगवान जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद से जुड़ी अनोखी कथा और 8 चमत्कार

jagannath prasad
अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: गुरुवार, 9 जुलाई 2020 (14:01 IST)
कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ का ‍दुनिया के सभी मंदिरों के प्रसाद से भिन्न और चमत्कारिक है। इस मंदिर के प्रसाद को अनोखे तरीके से बनाया जाता है और इस संबंध में एक कथा भी प्रचलित है। आओ जानते हैं जगन्नाथ के प्रसाद के बारे में खास बातें।

1. : किसी भी तीर्थ स्थान पर मिलने वाले प्रसाद को सामान्यतया प्रसाद ही कहा जाता है, परंतु उड़ीसा स्थित जगन्नाथ मंदिर में मिलने वाले प्रसाद को 'महाप्रसाद' माना जाता है। कहते हैं कि एक बार महाप्रभु वल्लभाचार्य एकादशी व्रत के दिन जगन्नाथ मंदिर पहुंचे। व्रत के दिन वहां वल्लभाचार्य को किसी ने प्रसाद दिया। वल्लभाचार्य ने वो प्रसाद लिया और उन्होंने स्तवन करते हुए दिन के बाद रात भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन समाप्त होने पर उन्होंने प्रसाद को ग्रहण किया। जिसके बाद 'प्रसाद' को 'महाप्रसाद' का गौरव प्राप्त हुआ।


2. दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर : 500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन। बताया जाता है कि रसोई में जो भी भोग तैयार किया जाता है वह सब मां लक्ष्मी की देखरेख में होता है।

3. 56 भोग का होता है प्रसाद : भोग के लिए रोजाना 56 तरह के भोग तैयार किए जाते हैं। ये सारे व्यंजन मिट्टी के बर्तनों में तैयार किए जाते हैं।

4. अजीब तरह से बनता है प्रसाद : मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार!

5. हजारों के लिए बनता प्रसाद और लाखों खा जाते हैं : कहा जाता है कि मंदिर में प्रतिदिन प्रसाद 20 हजार लोगों के लिए ही बनाया जाता है लेकिन त्योहार वाले दिन 50 हजार लोगों के लिए बनाया जाता है लेकिन कहा जाता है कि यदि किसी दिन लाखों लोग भी आ जाए तो भी वह प्रसाद ग्रहण करके ही जाते हैं।

6. भरपूर होती है खाद्य सामग्री : मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

7. सबसे पहले लगता माता पार्वती को भोग : यहां पर विमलादेवी नाम से माता पार्वती का एक मंदिर है। महाप्रसाद बनने के बाद सबसे पहले माता पार्वतीजी को भोग लगाया जाता है इसी के बाद भगवान जगन्नाथ को भोग चढ़ता है।

8. भगवान के विग्रह के समक्ष बैठकर नहीं करते हैं प्रसाद ग्रहण : ऐसी मान्यता है कि एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान की इच्‍छा से ही नारदमुनि को यह प्रासाद भगवान की अनुपस्थि में दे दिया था। तभी से यह परंपरा है कि भगवान के समक्ष भोग ग्रहण नहीं किया जाए।

महाप्रसाद कथा : यह महाप्रदास कैसे इस सांसर में आया इस संबंध में चैतन्य मंगल में एक कथा आती है। एक दिन नारदमुनि कैलाश पर्वत पर शिवजी के दर्शन करने पहुंचे और उन्होंने श्रीकृष्ण एवं उद्धवजी के बीच की वार्तालाप कर वर्णन उनके समक्ष किया। इस प्रसंग में उद्धव जी भगवान के महाप्रसाद की महिमा गान करते हुए कहते हैं– 'हे भगवन! आपकी महाप्रसादी माला, सुगन्धित तेल, वस्त्रों और आभूषणों और आपके उच्छिष्ठ भोजन को स्वीकार करने से आपके भक्त आपकी मायाशक्ति पर विजय प्राप्त कर लेते हैं।'

यह सुनकर नारदमुनि कहते हैं- हे कैलाशपति यह सुनकर मेरे ह्रदय में भगवान् विष्णु का महाप्रसाद चखने की तीव्र उत्कंठा जागृत हुई है। इस आशा से मैं वैकुण्ठ गया और पूर्ण भक्ति भाव से माता लक्ष्मी की सेवा करने लगा। बारह वर्षों तक सेवा करने के पश्चात् एक दिन माता लक्ष्मी ने मुझसे पूछा, ‘नारद! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम मनचाहा वर मांग लो।'

यह सुनकर नादरजी ने विनय भाव से कहा, हे माता ! अनंतकाल से मेरे हृदय में इस बात को लेकर पीड़ा है कि मैंने आज तक कभी भगवान विष्णु के महाप्रसाद का अस्वादन नहीं किया है। कृपया मेरी यह अभिलाषा पूरी कर दीजिये।'

यह सुनकर माता लक्ष्मी देवी दुविधा में पड़ गई कहने लगी परंतु नारदजी, मेरे स्वामी ने मुझे कठोर निर्देश दिए हैं कि उनका महाप्रसाद किसी को भी न दिया जाए। मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकती हूं, परन्तु तुम्हारे लिए मैं अवश्य कुछ व्यवस्था करूंगी।'

कुछ समय पश्चात् माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से अपने ह्रदय की बात कही और बताया कि कि तरह उन्होंने भूलवश नारदमुनि को भगवान का महाप्रसाद देने का वचन दे दिया है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने कहा, 'हे प्रिये! तुमने बड़ी भारी भूल की है परन्तु अब क्या किया जा सकता है। तुम नारदमुनि को मेरी अनुपस्थिति में मेरा महाप्रसाद दे सकती हो।

नारदमुनि ने आगे कहा, 'हे महादेव, आप विश्वास नहीं करेंगे, महाप्रसाद के मात्र स्पर्श से मेरा तेज और अध्यात्मिक शक्ति सौ गुना बढ़ गईं। मैं दिव्य भाव का अनुभव करने लगा और सुनाने यहां आया हूं।'

यह सुनकर कैलाशपति महादेव कहते हैं- “हे नारद! निश्चित ही तुम्हारा तेज अलौकिक है परन्तु तुमने ऐसे दुर्लभ महाप्रसाद का एक कण भी मेरे लिए नहीं रखा?...यह सुनकर नारदमुनि लज्जित हो जाते हैं परन्तु तभी उन्हें स्मरण हुआ की उनके पास अभी भी थोड़ा महाप्रसाद बचा हुआ है। उन्होंने तुरंत उसे महादेव को दिया जिसे उन्होंने अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लिया।

उसे ग्रहण करते ही श्रीकृष्ण प्रेम में मस्त होकर भगवान नृत्य करने लगे। उनके नृत्य की थिरकन से हिलने लगी और भूकंप सा महसूस होने लगा तब भयभीत होकर माता पृथ्वी ने माता पार्वती से महादेव को शांत करने का निवेदन किया। बामुश्किल माता पार्वती ने शिवजी को शांत किया और फिर उनसे इस उन्मत नृत्य करने का कारण पूछा तो शिवजी ने इसका कारण बताया। यह सुनकर माता पर्वती रुष्ठ होकर बोलीं– स्वामी आपको महाप्रसाद मुझे भी देना चाहिए था क्या आप नहीं जानते मेरा नाम वैष्णवी है आज मैं प्रतिज्ञा लेती हूं कि यदि भगवान श्रीहरि मुझ पर अपनी करुणा दिखाएंगे तो मैं प्रयास करुंगी की उनका महाप्रसाद ब्रह्मांड के प्रत्येक व्यक्ति, देवता और यहां तक की सभी प्राणियों को भी प्राप्त होगा।

तभी आश्चर्य जनक रूप से उसी क्षण भगवान विष्णु माता पर्वती के वचन की रक्षा हेतु वहां प्रकट हुए और बोले– 'हे देवी पर्वती! मैं आपको वचन देता हूं कि मैं स्वयं तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूर्ण करूंगा और पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पुरी में प्रकट होऊंगा और ब्रह्मांड में प्रत्येक जीव को अपना महाप्रसाद प्रदान करूंगा।

इसीलिए आज भी जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने के पश्चात सर्वप्रथम प्रसाद विमलादेवी (माता पार्वती) के मंदिर में अर्पित किया जाता है और यही कारण है कि कोई भी भक्त प्रसाद कभी भी अर्चा विग्रह के सामने बैठकर ग्रहण नहीं करता है।




और भी पढ़ें :