14 महीनों तक 'किश्तों' में मिलता रहा बेटे का शव, एक कश्मीरी पिता की तलाश यूं बन गई 'दर्दनाक दास्तां'


एक पिता के लिए दुनिया में सबसे प्यारा क्या हो सकता है, ज़ाहिर तौर पर उसका जवान बेटा। अगर बेटा ज़िंदा न हो तो पिता चाहता है कि कम से कम बेटे का शव ही मिल जाए। हर आदमी दुनिया में किसी न किसी खूबसूरत उम्मीद का इंतज़ार करता है, लेकिन एक पिता अपने बेटे का शव ढूंढने के लिए एक बरस तक इंतज़ार करता है।

वो शहर की हर लाश टटोलता है, कश्मीर की झीलों के हर किनारे को खोजता है, सूबे में मरने वाले हर शख़्स की शिनाख़्त करने बदहवास सा पहुंच जाता है। कोई थाना नहीं, कोई मर्चुरी नहीं, जहां वो अपने बेटे को इस प्रार्थना के साथ न टटोलने न गया हो कि यह मेरे बेटे की डेडबॉडी न निकल जाए।

इससे बड़ा दर्द क्या होगा पिता के लिए की उसने बेटे की तलाश में कई कब्रें भी खोदकर देख ली।

यह दास्तां है दक्षिण कश्मीर के एक बेहद साधारण मुस्लिम परिवार के मंजूरअहमद वागे की।

कई मज़ारों के चक्कर, पीर फ़कीर, बाबाओं के सामने माथा रगड़ने और हज़ारों इबादतों के बाद भी मंजूर अहमद को अपना बेटा नहीं मिला। न जिंदा और न ही मृत।

24 साल का शकीर साल 2020 में 2 अगस्त की तारीख़ को ईद के दिन अपने घर से लापता हो गया था। उसी रात उसकी जली हुई गाड़ी उसके गांव से करीब 16 किलोमीटर दूर कुलगाम जिले के एक खेत में मिली थी।

उसकी गुमशुदगी के करीब 7 दिनों बाद सेब के बागानों में शाकिर के कपड़े घर से 3 किमी दूर एक खाई में पाए गए थे। इसमें एक पतलून और सूख चुके खून से सने और कीचड़ से लिपटी एक भूरे रंग की शर्ट मिली। उसका शव फिर भी नहीं मिला।

किश्तों में मिलते बेटे के सामान और अवशेषों के बीच पिता के इंतजार का सिलसिला जारी था।

क़रीब 14 महीनों तक एक पिता अपने मर चुके बेटे को उसके ज़िंदा होने के ख़्वाब के साथ खोज रहा था। 14 महीनों तक उसने कश्मीर की हर गुमशुदा लाश को कलेजे पर पत्थर रख कर निहारा।
एक बार पिता ने अपने बेटे के हत्यारों से यह भी प्रार्थना की थी कि इतना ही बता दो उसे कहां दफ़नाया है, मैं खोद कर कम से कम उसकी देह ही घर ले जा सकूंगा, लेकिन शायद पिता के नसीब में बेटे की लाश को पहचानने का इम्तिहान भी अभी बाक़ी था।

अब को पिता का बेटे के शव के लिए किया गया 14 महीनों इंतज़ार ख़त्म हो गया। शकीर की क्षत विक्षिप्त लाश मिली है। सड़ चुकी लाश के गले में लटके हुए ताबीज़ और पैर में सर्जरी के टांकों के निशान से पिता और उसके भाई शान ने शकीर के शव की पहचान की है। हालांकि जो शव परिवार को मिला है उसमें से देह से मलबा साफ करें या मलबे से देह यह कहना मुश्किल है।

उसकी 24 साल की उम्र और 14 महीने पुरानी लाश के दावे पर यक़ीन कर के परिवार उसे बेटा मान रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक शोपियां के बलपोरा में एक सेना इकाई में राइफलमैन के रूप में कार्यरत था। वह 2 अगस्त, 2020 को ईद पर लंच के बाद घर से लापता हो गया था। दरअसल, शाकिर जिस शिविर में तैनात था वहां लौटते समय संदिग्ध आतंकवादियों ने उसका अपहरण कर लिया था।
मंज़ूर अहमद को समझ नहीं आ रहा है कि 14 महीनों बाद बेटे की लाश मिलने ख़ुशी से झूमे या फूट फूटकर रोएं।

हालांकि एक रंज उन्हें रहेगा कि जब भी वो बेटे की गुमशुदगी की फरियाद लेकर अधिकारियों के पास गए तो उन्होंने शकीर को आतंकी होने के शक के साथ ही देखा और पिता को ताने मारे।

उन्होंने सोचा नहीं था कि देश के लिए अपना खून और बलिदान देने वाले उनके बेटे शकीर को शहीद घोषित करने बजाए ये सिला मिलेगा।

मंज़ूर अहमद को अब सिर्फ़ इस बात की तसल्ली है कि बेटे शकीर का शव मिलने से अब कोई उसे आतंकी तो नहीं कहेगा।



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