पंजाब की जनता 2017 में बदलाव चाहती है!

पुनः संशोधित मंगलवार, 10 जनवरी 2017 (19:26 IST)
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मोहम्मद आसिफ इकबाल
 
मौजूदा दौर में जिस तेजी के साथ समस्याएं सामने आती हैं, मसाइल पैदा किए जाते हैं और जनता प्रभावित होती है, उससे कहीं ज्यादा तेजी के साथ उन्हें भुला दिया जाता है। यह मुद्दों का सामने आना और भुला दिया जाना, एक औपचारिक योजना के तहत अंजाम दी जाने वाली प्रक्रिया है जिसके लिए न केवल धन का इस्तेमाल क्या जाता है बल्कि शायद कीमती दिमाग़ों का उपयोग भी किया जाता है।
दूसरी ओर, प्रभावित जनता वह होती है जो वास्तव में धन के आधार पर खाली हाथ, आर्थिक रूप से खस्ताहाल, मुद्दों की समझ और जागरूकता के मामले से अनभिज्ञ होते हैं। यही कारण है कि समस्याएं पैदा करने वाले, मुद्दों का रोना रोने वाले, मुद्दों का उल्लेख करने वाले, मुद्दों को पेश करने वाले, मुद्दों को बढ़ावा देने वाले, बहुमत को उलझाए रखने वाले, परिस्थितियों और घटनाओं से खूब-खूब फायदा उठाते हैं, इसके बावजूद वह मसीहा कहलाते हैं और जनता के शुभचिंतक।
 
मौजूदा दौर में जिसे हम सूचना प्रौद्योगिकी का युग कहते हैं, इस में यह काम अधिक संगठित, सुनियोजित और कारगर साबित हो रहा है। कारण बहुत सरल है कि प्रौद्योगिकी के युग में हमारे पास इतने बड़े पैमाने पर सूचना प्राप्त हो रही है कि हम इसे अवशोषित करने और समझने में असमर्थ हैं। घटनाएं और दुर्घटनाएं इस गति से हमारे सामने आ रही हैं कि हमें मौका ही नहीं मिलता कि किसी भी घटना या दुर्घटना में हम कुछ देर ठहर कर विचार कर सकें और इससे मुक्ति की रणनीति तैयार कर सकें। इस स्थिति का एक गंभीर पहलू यह है कि बड़ी से बड़ी घटना और दुर्घटना बहुमत के लिए मायने नहीं रखती, वह इसे नजरअंदाज करते हुए स्वयं पर ही आकर्षित होते हैं। तो वहीं दूसरा पहलू यह है कि इन हालात में और इस पृष्ठभूमि में सामूहिक संघर्ष समाप्त होता जा रहा है। इसकी साफ़ वजह यही है कह व्यक्ति अपने आप ही में मगन है, उसको ना दूसरों की फ़िक्र है, ना उसको इसका कोई मौक़ा मिलता है और ना ही वह दूसरों के लिए कुछ करने का इच्छुक है। आइए इस पृष्भूमि में पांच राज्यों में होने वाले इलेक्शन को समझने की कोशिश करते हैं।
 
4 जनवरी 2017 भारतीय चुनाव आयोग ने देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की, लेकिन इस घोषणा से पहले ही इन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में सभी राजनीतिक दल व्यस्त हो चुके थे। इन पांच में से दो राज्यों का चुनाव देशवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इन में पहले उत्तर प्रदेश है तो दूसरा पंजाब। इन पांच राज्यों में 690 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रक्रिया होनी है, जिसमें 16 करोड़ मतदाता भाग लेंगे और राजनीतिज्ञों की किस्मत का फैसला करेंगे।  इसके लिए 1,85,000 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जहां चुनाव आयोग की कोशिश है कि शांति के साथ वोट डाले जा सकें, राजनीतिक पार्टियां और राजनेता जिनके नाम पर वोट डाले जाएंगे, साथ ही NOTA (नोटा) का इख्तियार भी दिया गया है जहां किसी भी उम्मीदवार या पार्टी, पसंद न आने पर 'इनमें से कोई नहीं' चुनने का अधिकार मौजूद है।
 
गोवा और मणिपुर के उम्मीदवारों के खर्च की सीमा 20 लाख तय की है तो वहीं पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के लिए 28 लाख। इन पांच राज्यों की 690 विधानसभा क्षेत्रों में 403 उत्तर प्रदेश में हैं वहीं 117 पंजाब के अंतर्गत हैं, शेष 170 विधानसभा क्षेत्र तीन राज्यों में आते हैं। इस लिहाज़ से उत्तर प्रदेश के बाद पंजाब ही वह सबसे बड़ा राज्य है जिसके परिणाम निकट भविष्य में देश वासियों और मौजूदा सरकार, दोनों ही के लिए महत्वपूर्ण हैं। शायद यही कारण है कि जहां केंद्रीय सरकार उत्तर प्रदेश को विशेष महत्व देते हुए विशेष शैली में सक्रिय है वहीं पंजाब में कांग्रेस अपने सभी दांवपेंच खेलने को तैयार हैं। इसके बावजूद यह अजब संयोग है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती नजर नहीं आ रही है।
 
समाजवादी पार्टी जो सत्ता में है वह भविष्य में भी सरकार बनाने का सपना देख रही है, तो वहीं उसकी प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी उससे कहीं ज्यादा उम्मीद लगाए हुए है कि अब की बार राज्य में उसी की सरकार बनेगी। वहीं दूसरी ओर पंजाब में अगरचे कांग्रेस अंतिम दिनों में उभरती हुई महसूस हो रही है, इसके बावजूद आम आदमी पार्टी को पूरी उम्मीद है कि इस बार पंजाब में सरकार वही बनाएंगे। सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल और भाजपा की सरकार जाती हुई साफ दिखाई दे रही है। इस स्थिति में केंद्र में मौजूद भाजपा सरकार काफी चिंतित है, क्योंकि दोनों ही राज्य उसके लिए बहुत महत्व रखते हैं। 
 
2011 के आंकड़ों की रोशनी में फिलहाल पंजाब में 58 प्रतिशत सिख, 38.5% हिन्दू, 1.9% मुसलमान, 1.3% ईसाई और 0.60% अन्य हैं। वहीँ दूसरी ओर अगर जाति के आधार पर देखा जाए तो 22% ओबीसी, 31.94% अनुसूचित जाति (दलित), 41% अगड़े और 3.8% अन्य पाए जाते हैं। वहीं अगर पंजाब के राजनीतिक हालात पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2002 में भाजपा को केवल 3 विधानसभा सीटें मिली थीं। 2007 में भाजपा को पहले के मुकाबले बढ़ने का अवसर मिला और यह 3 से बढ़कर 19 पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस को 44 और शिरोमणि अकाली दल को 48 सीटें मिली थीं, लेकिन 2012 में भाजपा को कुछ सीटों का नुकसान हुआ और यह 19 से घटकर 12 पर आ गई, वहीं शिरोमणि अकाली दल को 56 और कांग्रेस को 46 सीटों पर सफलता मिली।
 
इसके बावजूद भाजपा और अकाली दल के मिलने से भाजपा-अकाली गठबंधन सरकार बनी और राज्य में भाजपा को फलने फूलने का अवसर प्राप्त होता रहा। लेकिन वर्तमान स्थिति, सत्ता में मौजूद दोनों ही पार्टियों के लिए अलार्मिंग है। वजह? राज्य में आम आदमी पार्टी का राजनीति में सक्रिय दाखिल होना है। इस वक़्त राज्य में जहां एक ओर कांग्रेस अपने सभी प्रयासों में प्रतिबद्ध है और उसे फिर सरकार बनाने का मौका मिल सकता है वहीं आम आदमी पार्टी भी अपनी पूरी ताक़त लगाए हुए है और उसे पूरी उम्मीद है कि इस बार उसी की सरकार बनेगी। ठीक उसी तरह जिस तरह दिल्ली में सरकार बनाई थी और अन्य तमाम पुराने राजनीतिक दलों को हार का मुंह देखना पड़ा था।
 
राज्य में चौथी बड़ी राजनीतिक पार्टी अपने मतदाताओं के आधार पर बहुजन समाज पार्टी है, जिसने 2012 में अपना वोट शेयर काफी बढ़ाया है। पार्टी ने 15 मार्च 2016 में नून शहर में एक विशाल रैली के दौरान जो दरअसल बसपा के संस्थापक कांशीराम के जन्म दिवस पर आयोजित की गई थी, में मायावती ने अकाली-भाजपा सरकार को दलित विरोधी कहते हुए 2017 के विधानसभा चुनाव की शुरुआत की थी।
 
मायावती ने सत्तारूढ़ सरकार पर आरोप लगाया था कि यह दलित विरोधी सरकार है वहीं राज्य में उभरती आम आदमी पार्टी को बनिया बताया था, और उन पर भी आरोप लगाया था कि केजरीवाल और उनकी पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने से पहले दलित और अनुसूचित जाति विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इसलिए यहां भी वे दलितों के लिए विश्वसनीय नहीं हो सकते। साथ ही मायावती ने उसी अवसर पर पंजाब की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने और सफलता हासिल करने का दावा किया था। लेकिन उन तमाम बयानात और दावों के बावजूद वह अपनी सभी गतिविधियों को उत्तर प्रदेश पर केंद्रित किए हुए हैं। क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि इस बार उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनने वाली है। यही कारण है कि वह आम आदमी पार्टी के खिलाफ पंजाब में बयानबाजी से परहेज करती नजर आ रही हैं।
 
दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने उत्तर प्रदेश को मायावती के लिए खाली छोड़ रखा है। बसपा और आम आदमी पार्टी की इस पूरी गतिविधि से लगता ऐसा ही है जैसे मानो दोनों में कोई समझौता हो गया है। एक पंजाब में सरकार बनाएगा तो दूसरा उत्तर प्रदेश में। वहीं मौजूदा हालात बता रहे हैं कि दोनों ही राज्य में जनता तब्दीली चाहती है, लेकिन इसका फैसला तो 11 मार्च को आने वाले रिजल्ट ही बताएंगे। फिलहाल तो यही लग रहा है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है। 



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