ठाकुर, बामन और पिछड़े की त्रिवेणी चलाएगी उत्तर प्रदेश

पुनः संशोधित शनिवार, 18 मार्च 2017 (19:59 IST)
देश के सबसे बड़े राज्य में मुख्‍यमंत्री और उपमुख्‍यमंत्री के लिए नाम की घोषणा कर भाजपा ने 'मिशन 2019' की योजना को भी परोक्ष रूप से सामने रख दिया है। भाजपा ने कट्‍टर हिन्दुत्व की छवि के लिए पहचाने जाने वाले आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंपी है, साथ ही यूपी भाजपा के अध्यक्ष और पार्टी के दिनेश शर्मा को उपमुख्‍यमंत्री बनाकर उनका सहयोगी बनाया गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने इन तीनों के नाम सामने लाकर राज्य के जातीय समीकरणों को साधने की भरपूर कोशिश की है। उत्तराखंड के राजपूत परिवार में जन्मे आदित्यनाथ को मुख्‍यमंत्री बनाकर भाजपा ने राज्य के राजपूत समुदाय को साधने की कोशिश की है। चूंकि योगी की छवि हिन्दूवादी नेता की है इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव में हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करने में भी सफल होगी। 
 
योगी के पक्ष में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि वे गोरखपुर स्थित गोरखनाथ पीठ के महंत और पीठाधीश्वर हैं और नाथों का का प्रभाव हरियाणा, राजस्थान के साथ ही देश के अन्य राज्यों में भी है और नाथों का सवर्णों से ज्यादा दलितों पर ज्यादा प्रभाव है। गांव-गांव में नाथों के मठ हैं, जिनसे दलितों का एक बड़ा तबका जुड़ा हुआ है। आदित्यनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने से 2019 में दलितों का एक बड़ा भाजपा के समर्थन में आ सकता है। हालांकि विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को सवर्णों के अलावा दलितों के वोट भी अच्छी संख्या में मिले हैं।
 
उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्‍यमंत्री बनाकर भगवा दल ने राज्य के पिछड़े तबके को भी यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा के शासन में उनकी उपेक्षा नहीं होगी। हालांकि मौर्य मुख्यमंत्री पद की आस लगाए बैठे थे क्योंकि विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया था। केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेहरे पर निराशा के भाव साफ पढ़े जा सकते थे। 
 
यूपी में एक और उपमुख्‍यमंत्री बनाने की घोषणा की गई है। वे हैं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा। चूंकि शर्मा ब्राह्मण जाति से आते हैं इसलिए इस समुदाय को भी खुश करने की कोशिश की गई है। शर्मा और मौर्य के नाम मुख्‍यमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे। इस दौड़ में एक और नाम था मनोज सिन्हा का, जो कि इस दौड़ में सबसे आगे थे, लेकिन आखिरी समय में एकदम बाहर हो गए। जानकार यह भी मान रहे हैं आदित्यनाथ पर अंकुश लगाने के लिए ही पार्टी ने केशव मौर्य और दिनेश शर्मा को उनका सहयोगी बनाया है। ताकि वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएं, जिससे पार्टी मुश्किल में फंस जाए।



और भी पढ़ें :