कही-अनकही 19 : एलाइनमेंट


मानो या न मानो, आपको ये दुनिया आपका आंकलन आपकी शक्ल-सूरत से ही करेगी, आप कैसे दिखते हैं, क्या पहनते हैं, और कितने मोटे या दुबले हैं। महिलाओं के लिए ये आम बात है कि उनका गोरा रंग, सुडौल बदन और ख़ूबसूरती ही मायने रखती है। अक्लमंद और स्वाभिमानी नारी तो किसी को पसंद ही नहीं आती। पढ़िए हर लड़की पर बीती एक ऐसी ही कहानी, एना और उसके दोस्तों की जुबानी...


‘राधिका, सगाई तो हो गई तुम्हारी हमारे हैंडसम बेटे से। हम उसके लिए एक परफेक्ट वाइफ चाहते थे, लेकिन अब क्या करें... खैर, तुम ठीक-ठाक दिखती हो, वो तो काम चला लेंगे। लेकिन अपने ये दांत थोड़े अन्दर करवा लो तुम। हंसती हो तो बुरा लगता है।’

‘ऋतू, तुम्हारा ये एक्स्ट्रा इंसाइज़र दांत क्यों है? निकलवाया नहीं तुम्हारे पेरेंट्स ने बचपन में ही? तुम्हारे घर में सबका तो नहीं है ऐसा? हम नहीं चाहते कि हमारे पोते-पोतियों के दांत भी ऐसे हों। हंसती हो तो अजीब दिखता है... ’

‘प्रीति, हंसते समय तुम हाथ से अपना मुंह क्यों नहीं ढांकती हो? तुम्हारा एक दांत थोड़ा टूटा है। हां,हम जानते हैं कि बचपन में तुम गिर गई थीं वगैरह-वगैरह... लेकिन अब शादी के बाद यह हमें अच्छा नहीं लगता। हाथ से ढंक लिया करो हंसते समय।’

‘एना, हमको बात करनी है तुमसे। देखो अब अगर हमने हमारी पसंद से शादी की होती, तो हम हमारे लड़के के लिए एकदम परफेक्ट बीवी ले कर आते क्योंकि हमको तो हर चीज़ परफेक्ट चाहिए होती है। हमने तुम्हारा फोटो पहली बार
देखा था जब आदि ने दिखाया था, तभी सोच लिया था कि हमको तुम्हारा ये एक टेढ़ा दांत सही कराना पड़ेगा। अब तुम तो आ गई हो शादी कर के और हम परफेक्ट बहू तो ला ना सके, लेकिन हमने ये दो डेंटिस्ट से अपॉइंटमेंट ले लिए हैं। उनका कहना है कि बस 2 साल लगेंगे और दांत सही हो जाएंगे। अब ब्रेसेस लगवाना है या क्राउनिंग करनी है ये तुम देख लो। वैसे भी तुम हंसते हुए अच्छी नहीं लगती। तो अब परफेक्ट न सही, हमारे लिए इतना तो कर ही सकती हो कम से कम...

‘आप मजाक कर रहे हैं न? मैं ब्रेसेस क्यों लगवाउंगी? इतना भी टेढ़ा नहीं है दांत। आदि को भी तो मैं ऐसे ही पसंद हूं...’

‘हमें तो आश्चर्य है कि हमारे लड़के को तुम कैसे पसंद आ गई। खैर अब तो उसकी मजबूरी है। वो थोड़ी न बोलेगा की तुम अच्छी नहीं दिखती हंसते हुए। दो साल की तो बात है। अच्छा दिखने में तुम्हें क्या दिक्कत है? दांत अलाइन करा लो ...’

‘लेकिन आपने तो शादी के पहले भी देखा था न? तब मना क्यों नहीं किया शादी के लिए अगर परफेक्ट बहू चाहिए थी?’

‘हमारे घर आ गई हो तो अब हमारे हिसाब से रह लो, या हंसना और मुस्कुराना बंद कर दो ...’

‘हम्म.. ये कोई वजह है भी नहीं मुस्काने की... खैर, मैंने एक कोटेशन पढ़ी थी –‘उस व्यक्ति से बुरा कोई व्यक्ति नहीं इस दुनिया में, जो किसी की मुस्कान या हंसी पर नकारात्मक टिप्पणी कर उसकी मुस्कान ही छीन ले। इतना बुरा कोई कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति से उसकी ख़ुशी ज़ाहिर करने पर रोक लगा दे?’ अलाइनमेंट की ज़रूरत किसी और को है शायद, है न?’

एना जैसी लाखों लड़कियां हैं जो अपने ससुराल में ‘अपनाई’ नहीं जातीं क्योंकि वे उनकी नज़र में ‘परफेक्ट’ नहीं हैं। यह मायने नहीं रखता कि एना कितनी समर्पित है, कितने सेवा भाव से ससुराल में सभी का ख्याल रखती है, कितने अच्छे से घर संभालती है, कितनी पढ़ी-लिखी है, कितने हुनर हैं... मायने रखता है सिर्फ ये कि ऐसी कौनसी कमी खोजी जा सकती है एना में जो ससुराल वालों की गिरी हुई मानसिकता को सुकून दे सके। ये सब ‘कही-अनकही’ बातें हैं, लेकिन एक समय आएगा जब शक्ल-सूरत से बढ़ कर ये समाज अपनी सूरत सुधारेगा, और हर लड़की दिल खोल कर मुस्कुराएगी, हंसेगी और खिलखिलाएगी।
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