Bangladesh: हिंदुओं को बचाने के लिए आगे आए विश्व समुदाय

भारत सहित पूरी दुनिया में इस्कॉन के बैनर से बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध जारी हिंसा का विरोध किया जाना बिलकुल स्वाभाविक है। सभी समुदाय के लोगों को विश्वभर में इस हिंसा के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए।

लेकिन हिंदुओं के विरुद्ध कुछ भी हो जाए दुनिया के लिए यह तभी चिंता का कारण बनती है, जब भारत की कूटनीति सक्रिय होती है। भारत में स्वयं को सेकुलर मानने वाला खेमा ऐसे खामोश है मानो बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध हमला स्वाभाविक घटना हो।

बांग्लादेश में 13 अक्टूबर, 2021 को कोमिल्ला के नानुआर दिधी के दुर्गा मंडप से आरंभ हमले ने देशव्यापी एकपक्षीय दंगे का रूप ले लिया।

एक तस्वीर फेसबुक पर वायरल हो रही थी जिसमें कहा गया था कि पवित्र कुरान को दुर्गा के पैरों के नीचे रख अपवित्र किया गया। सात दर्जन से ज्यादा पूजा पंडाल तहस-नहस किए गए,

पूजा में लगे लोग घायल हुए और कोमिल्ला से तब दो शव बरामद हुए। धीरे -धीरे चांदपुर, नोआखाली, रंगपुर, चटगांव, कॉक्स बाजार, मौलवी बाजार, गाजीपुर, फेनी जैसे क्षेत्र भयानक हिंसा की चपेट में आ गए।

आज 64 में से 22 प्रशासकीय जिलों में दंगा रोधी पुलिस तैनात है। हालांकि हिंदुओं के विरुद्ध हमलों के काफी मामले दर्ज हुए, गिरफ्तारियां भी हुई है। बावजूद हिंदुओं और हिंदू धर्म स्थलों पर हमले नहीं होने की स्थिति नहीं बनी। हिंसा में वे सारे जघन्य कांड हुए जिसके विवरण पुस्तकों में पढ़ते हैं। महिलायें व बच्चियों से दुराचार से लेकर जघन्य हत्या तक।

रंगपुर के पीरगंज से 16 वर्ष के उस किशोर परितोष राय को गिरफ्तार किया गया जिस पर फेसबुक तस्वीर डालने का आरोप था। गिरफ्तारी के बावजूद रंगपुर में शांति स्थापित नहीं हुई। एक तरफ गिरफ्तारी तो दूसरी ओर हमलावरों ने उस क्षेत्र के दो दर्जन से ज्यादा घरों को आग लगा दी और करीब 100 जगहों पर लूटपाट की।

नोआखाली के इस्कॉन मंदिर पर बर्बर हमला हुआ। अबुल अला मौदुदी द्वारा स्थापित कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी सहित अन्य मुस्लिम संगठनों का हाथ इसके पीछे माना जा रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा था कि जमात वही स्थिति लाना चाहती है जिसमें खुलेआम कत्लेआम हो।

जमात और ऐसे दूसरे संगठन हिंदुओं पर हमले करते रहे हैं, मंदिर और हिंदू घर तोड़े और जलाए जाते रहे हैं। शेख हसीना उदारवादी हैं किंतु इन कट्टरपंथियों के सामने वह भी कमजोर नजर आई हैं।

बांग्लादेश के अखबार ब्लिट्ज ने आबादी का विश्लेषण कर बताया है कि 1947 में पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में 30 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू थे। 2011 की जनगणना में हिंदुओं की आबादी 8 प्रतिशत रह गई। बांग्लादेश की मीडिया पर नजर रखें तो साफ दिखाई देगा कि हिंदुओं को अपमानित तथा हिन्दू महिलाओं के साथ बदतमीजी की घटनाएं आम हैं।

बांग्लादेश की ही संस्था ऐन ओ सालिश सेंटर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है 2013 के आरंभ से इस वर्ष सितंबर तक हिंदुओं पर 3679 हमले हो चुके हैं। नोआखाली में स्थिति भयावह है। बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल ने चांदपुर एवं नोआखाली हमलों में जान-माल की क्षति की भयावह तस्वीर पेश की है।

नोआखाली और कोमिल्ला दोनों महत्वपूर्ण जगह है। नोआखाली वह स्थान है, जहां 15 अगस्त, 1947 के पूर्व और बाद में हुए भीषण दंगों के बाद महात्मा गांधी को जाना पड़ा था। कोमिल्ला वह जगह है जहां आठवीं सदी में त्रिपुरा के देव राजवंश का शासन था।

1400 के बाद माणिक वंशी राजाओं ने शासन किया। किंतु 16 वीं सदी से स्थितियां बदलने लगी। 1764 में शमशेर गाजी के नेतृत्व में वह बड़ा आंदोलन हुआ और राजवंश का अंत हो गया। कुछ लोग उसे काजी नज़रुल इस्लाम की कर्मभूमि के रूप में याद करते हैं जहां उन्होंने प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने के विरुद्ध अपनी चर्चित कविता की रचना की थी।

वहां 1931 मालगुजारी के खिलाफ भी किसान आंदोलन हुआ था और उसमें भी कुछ मजहबी अंश थे। तब महात्मा गांधी और रविन्द्रनाथ टैगोर दोनों वहां गए थे। नोआखाली का दंगा कोई भूल नहीं सकता। 1946 का यही अक्टूबर महीना था जब वहां हिन्दुओं पर हमले आरंभ हुए थे। गांधीजी वहां नवंबर 1946 में पहुंचे थे। उस समय के बंगाल के कांग्रेस के नेता डॉ बिधान चंद्र राय ने गांधी जी को हिंसा का जो विवरण दिया था वह दिल दहलाने वाला था।

उन्होंने कहा था कि हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है और हिंदू महिलाओं के साथ लगातार दुष्कर्म किया जा रहा है। मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के बाद कोलकाता से लेकर बंगाल की कई जगहों पर
खुलेआम कत्लेआम हुआ था। उसकी चपेट में नोआखाली था। गांधी जी के साथ प्यारेलाल नैयर, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, उनकी सहयोगी आभा, मनु आदि गए थे।

उन्होंने सात सप्ताह तक पैदल क्षेत्र का यात्रा की। रिकॉर्ड बताते हैं कि वे करीब 115- 16 मील चलकर 47-48 गांव तक पहुंचे। उस समय 10 अक्टूबर, 1946 का दिन था, जिसे कोजागरा पूर्णिमा कहा जाता है। हिन्दुओं की सामूहिक हत्याओं के साथ हजारों को मुसलमान बनाया गया था। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी ने गांधीजी को नोआखाली छोड़ने की चेतावनी दी थी। उनके रास्ते अनेक बाधाएं मुस्लिम लीग और उनके कट्टरपंथियों ने खड़ी की। गांधी गांव-गांव घूमते रहे।

काफी लोग इस समय नोआखाली और गांधी को याद कर रहे हैं। क्या आज वही स्थिति बांग्लादेश या पाकिस्तान में है कि कोई गांधी जैसा व्यक्ति वहां जाए, यात्राएं करें और हमलों को शांत करे? कतई नहीं।
बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों को देखते हुए देश के विरुद्ध कुछ बोलना राजनयिक दृष्टि से विपरीत परिणामों वाला माना जा रहा है।

मरणासन्न हो चुकी पार्टी बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट सक्रिय हो गई। उसने दंगों की जांच के लिए दो समानांतर कमेटियों का गठन कर दिया। सब जानते हैं कि बेगम खालिदा जिया के शासन में किस तरह हिंदुओं पर हमले हुए, कट्टरपंथ और आतंकवाद तेजी से फैला। उन्हें लगता है कि मजहबी उन्मादियों के साथ खड़े होकर वोअपना समर्थन वापस पा सकती हैं। इसलिए भारत सरकार अंदर भले सक्रिय हो स्पष्ट बोलने से बच रही है।

वास्तव में इस प्रकार की हिंसा अपने आप नहीं होती। इसकी जड़ें गहरी हैं। लंबे समय से हिंदुओं और अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध पैदा की गई घृणा तथा बांग्लादेश को सम्पूर्ण इस्लामिक राज बनाने का प्रचार चलता रहा हूं। यह इन सबकी परिणति तो है ही, पाकिस्तान की भूमिका से भी इनकार करना कठिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी साल में 26 27 मार्च को बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे और उन्होंने हिंदू मंदिरों में पूजा-पाठ की थी जिससे बेहतर वातावरण बना था। तब शेख मुजीबुर रहमान यानी बंगबंधु की याद में भारत-बांग्लादेश के संबंधों में भावुकता और संवेदनशीलता देखी गई था।

पाकिस्तान को यह स्वीकार नहीं हो सकता था। शेख हसीना ने भारत के हिंदुत्ववादी शक्तियों से संयम बरतने की कुछ दिनों पहले अपील की थी। ऐसी घटनाओं में संयम बनाए रखना कठिन है। बांग्लादेश के 4096 किलोमीटर सीमा से लगने वाले पूर्वोत्तर के 5 राज्यों असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय और पश्चिम बंगाल में इसका असर है। अक्टूबर के नोआखाली तथा मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन को पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के कट्टरपंथी हमेशा याद करते हैं। यानी यह छिटपुट हिंसा या अचानक हो गई वारदात नहीं है।

इसके पीछे एक विचार और योजना है। यह यूंही खत्म नहीं होगी। अमेरिका में हिन्दुओं की सक्रियता के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी संज्ञान लिया और शेख हसीना सरकार से रोकने को कहा। अमेरिका ने भी निंदा की। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि धर्म चुनने की आजादी मानवाधिकार है।

दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी धर्म या पंथ को मानने वाला है उसको अपने महत्वपूर्ण पर्व बनाने के लिए विश्वास दिलाना जरूरी है कि वह सुरक्षित है। लेकिन हिंसा रुकी नहीं। वास्तव में इसके लिए बांग्लादेश सरकार को तो जो कुछ संभव हो सकता है करना ही चाहिए, भारत सहित संपूर्ण दुनिया के हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई यहां तक कि मुसलमानों को भी प्रतिरोध करना चाहिए अन्यथा एक दिन वहां से गैर मुस्लिमों का नामोनिशान खत्म हो जाएगा।

(आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)



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