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दीपावली कविता : दीपों की माला

गुरुवार,अक्टूबर 28, 2021
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दीवारें सज जाती पूरे गांव की और संजा बन जाती जैसे दुल्हन प्रकृति के प्रति स्नेह को दीवारों पर जब बांटती बेटियां
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बीच सड़क पर थूक दिया तो, नगर पालिका वाले आ गए। दादाजी को बिठा कार में, तुरत फुरत थाने पहुंचा गए।
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पूरब के पर्वत पर किसने, बिठा दिया सूरज का गोला। 'बड़ी भोर में बांग लगाना,' किसने यह मुर्गे से बोला।
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डांट रहे थे बच्चाजी को, मिस्टर टीचरराम। पढ़ने में तुम बहुत गधे हो, नालायक, नाकाम।
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एक दिन घर पर गाय आ गई। बोली हमको चाय पिलाओ। दूध दिया है, तुमको मैंने,चाय पिलाकर कर्ज चुकाओ।
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पुस्तक और किताबें महंगी। जूते और जुराबें महंगी। शाला के परिधान कीमती। शिक्षा का सामान कीमती
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हाथ बढ़ाकर मक्खी दीदी, पीस रही थी चक्की। तभी कहीं से आया मच्छर,जो था पूरा झक्की।
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सुर्रा सत्तू सुर्रा सत्तू, सुर्रम सूडा ताल, नहीं जमा इंदौर तो दद्दू, पहुंच गए भोपाल।
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ताधिक ताधिक ता ता धिन्ना। हाथी दादा चूसो गन्ना। फिर थोड़े से केले खाना। केले खाकर मेले जाना।
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मौज-मटरगस्ती करने में सारा समय गंवाया, माता-पिता ने समझाया था, पर मैं समझ न पाया।
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किरणों के गमछे से, सबके सब पूंछने हैं। सूरज पर कोहरे के, दाग लगे जितने हैं।
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अब जहां देखो वहां छाया अंधेरा, धूप कब की जा चुकी। रोशनी के लेख सूरज लिख रहा
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मम्मी पापा से कहिएगा, वोट डालने जाएं जी, घर में यूं ही पड़े-पड़े वे, व्यर्थ न समय गवाएं जी।
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पेड़ पत्ते डालियों का मुस्कराना गुनगुनाना, रूप धर बहुरूपिया का फिर सजा मौसम सुहाना।
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सूर्योदय से पहले उठकर, निपटे नित्य क्रिया। सदा निरोगी काया जिसकी, जीवन वही जिया।। उदाहरण कोई बन जाए, वह उद्योग करें।। आओ योग करें। आओ योग करें।।
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चि‍ड़िया चहक-चहक कहती, सुबह-शाम मैं गगन में रहती
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बहुत लुभाता है गर्मी में, अगर कहीं हो बड़ का पेड़। निकट बुलाता पास बिठाता, ठंडी छाया वाला पेड़।
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मार-मार कर लगा नचाने, पर भालू न नाचा। जड़ा मदारी ने गुस्से में, उसके गाल तमाचा।
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दो के एकम दो होते हैं, दो के दूनी चार। काम शुरू करने से पहले, करना सोच विचार।
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