अफगानिस्तान में अमेरिका की 'हार' का पश्चिम एशिया पर क्या होगा असर

Last Updated: बुधवार, 18 अगस्त 2021 (16:11 IST)
19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों के बीच और पड़ोसी पश्चिम और दक्षिण एशिया क्षेत्रों पर प्रभुत्व और प्रभाव के लिए जो होड़ थी उसका वर्णन ‘द ग्रेट गेम’ के तौर पर किया जाता था। इस होड़ में कोई भी जीत नहीं पाया और इस महान खेल के खिलाड़ियों के लिए यह क्षेत्र ‘साम्राज्यों के कब्रिस्तान’ के रूप में जाना जाने लगा।

दो सदियों बाद, अमेरिकी महाशक्ति को एक बार फिर उसी हकीकत की याद दिला दी गई। अफगानिस्तान का पराभव, जिसमें अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित 3 लाख सैनिकों वाली मजबूत और सुसज्जित अफगान सेना घंटों में ढह गई, व्यापक पश्चिम एशिया में अमेरिकी ताकत की हैसियत की याद दिलाता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने की विनाशकारी योजना के लिए तीखी आलोचना की जा रही है। लेकिन हजारों वर्षों से बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करने वाले देश में ‘राष्ट्र निर्माण’ करने के मूल फैसले में ही बहुत सारे दोष हैं।
काबुल के पतन और उस देश से, जहां अमेरिका ने एक खरब डॉलर झौंक दिए थे, जल्दबाजी में अमेरिकी सेना के निकलने के बाद, यह सवाल जस का तस है कि पश्चिम एशिया में अब आगे क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसकी धमक पश्चिम में मोरक्को से लेकर पूर्व में पाकिस्तान तक, उत्तर में तुर्की से लेकर खाड़ी तक और अफ्रीका के हॉर्न तक फैली हुई है।

पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका का हर कोना किसी न किसी तरह से अफगानिस्तान के इतिहास के सबसे लंबे युद्ध में अमेरिकी सत्ता की विफलता से प्रभावित होगा। अमेरिका की इस हार में उसके नाटो सहयोगी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी बराबर के साझीदार हैं।
एक नया साइगॉन? : यह तय है कि काबुल से अमेरिका की डरावनी वापसी और 46 साल पहले साइगॉन में इसी तरह के दृश्यों के बीच तुलना की जा रही है। कुछ मामलों में, अफ़ग़ान स्थिति अधिक चिंताजनक है क्योंकि पश्चिम एशिया के इतने बड़े भाग में अराजकता फैलने का जोखिम है। 1975 में दक्षिण वियतनामी सेना की हार ने हो सकता है कि पड़ोसी राज्यों भारत-चीन में विकास को प्रभावित किया हो, लेकिन नतीजे काफी हद तक निहित थे।
क्या है साइगॉन? : दरअसल, वियतनाम में अमेरिका अपना प्रभुत्व जमाने और कम्युनिज्म खत्म करने के नाम पर आया था, लेकिन हालात ये हो गए थे कि अमेरिका को अपने राजनयिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए साइगॉन में अपने दूतावास के ऊपर हेलिकॉप्टर उतारने पड़े थे। ठीक ऐसे ही दृश्य अफगानिस्तान में भी दिखाई दिए। अमेरिकियों को निकालने के लिए बाइडन सरकार ने अपनी पूरी ताकत को झोंक दिया।
अफगानिस्तान इस मायने में अलग है कि जहां वियतनाम में अमेरिका की विश्वसनीयता और आत्मविश्वास को ठेस पहुंची थी, वहीं चीन के उदय से पहले वह पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख सैन्य बल बना रहा। पश्चिम एशिया में, एक कमजोर वॉशिंगटन - जिसका अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की क्षमता में विश्वास अगर बिखरा नहीं तो हिल जरूर गया है, के अधिकार पर बहुत सवाल उठाए जाएंगे।
यह ऐसे समय में आया है जब चीन और रूस वैश्विक स्तर पर अमेरिकी संकल्प की परीक्षा ले रहे हैं। इस क्षेत्र में, जहां तुर्की और ईरान पहले से ही एक अमेरिकी विफलता से पैदा हुई दरार भरने की कोशिश कर रहे हैं।

बीजिंग और मॉस्को, अपने-अपने कारणों से, अफगानिस्तान के भविष्य में रुचि रखते हैं। चीन के लिए, यह केवल एक सीमा साझा करने से आगे की बात है, जबकि रूस के लिए यह ऐतिहासिक चिंता है कि अफगान चरमपंथ अपनी मुस्लिम आबादी और इसकी परिधि में आने वाले ऐसे अन्य देशों तक अपनी जड़ें फैला सकता है।
चीन की तालिबानियों को शह : हाल ही में, चीन नेताओं को शह दे रहा है। इसके विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने अफगान तालिबान के राजनीतिक प्रमुख मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ एक बहुप्रचारित बैठक की। फिर पाकिस्तान है, जिसने वर्षों से तालिबान को कभी ढका-छिपा तो कभी खुलेआम समर्थन दिया है। इस्लामाबाद एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भूमिका निभाने के लिए अमेरिका से कुछ ऐसे अवसर चाहेगा जो उसके लिए सहज नहीं होंगे।
अफगानियों की घबराहट : हालांकि चीन के साथ पाकिस्तान के घनिष्ठ संबंधों और अमेरिका के साथ उसके टूटे संबंधों को भूलना नहीं चाहिए। अफगानिस्तान की बात करें तो तालिबान अपने इस वादे पर खरा उतर सकता है कि वह बदल गया है और वह खूनी जातीय और कबायली विभाजन से ग्रस्त देश में आम सहमति का शासन स्थापित करने की कोशिश करेगा। अपने दुश्मनों के खिलाफ तालिबान के क्रूर प्रतिशोध के शुरुआती संकेतों और मौजूदा घटनाक्रम से अफगान आबादी की घबराई हुई प्रतिक्रिया को देखते हुए इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होगा कि बहुत कुछ बदल गया है।
पश्चिम एशिया में इसके क्या प्रभाव होंगे? : क्या अल-कायदा और इसी तरह के संगठनों को तालिबान-नियंत्रित अफगानिस्तान में खुद को फिर से स्थापित करने की अनुमति दी जाएगी? क्या तालिबान आतंकवाद के राज्य प्रायोजक के रूप में फिर से उभरेगा? क्या यह अफगानिस्तान को अफीम के व्यापार के एक बड़े बाजार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देता रहेगा?

दूसरे शब्दों में, क्या तालिबान अपने तौर-तरीकों को बदलेगा और इस तरह से व्यवहार करेगा कि वह अपने पड़ोसियों और इस क्षेत्र के लिए आम तौर पर खतरा न बन जाए? अमेरिका के दृष्टिकोण से, अगर हम इसरायल-फिलिस्तीन विवाद को एक तरफ रख दें तो अफगानिस्तान से बाहर निकलने से ईरान के साथ परमाणु समझौते में प्राण फूंकने की उसकी कोशिशें अधूरी रह जाती हैं, जो कि पश्चिम एशिया के अधूरे काम का मुख्य हिस्सा है।
ईरान में एक नए कट्टरपंथी राष्ट्रपति का आना किसी समझौते पर पहुंचने की कोशिश को और जटिल बनाता है। इसके अलावा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा छोड़ी गई संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) को पुनर्जीवित करने में विफलता, पश्चिम एशिया की गणनाओं में अनिश्चितता और जोखिम की एक नई परत जोड़ देगी।

तेहरान नेतृत्व को पड़ोसी अफगानिस्तान के घटनाक्रम में जितनी दिलचस्पी है उतनी शायद और किसी को नहीं होगी। अफगानिस्तान की शिया आबादी के साथ दुर्व्यवहार को लेकर तेहरान में चिंता को देखते हुए, तालिबान के साथ ईरान के संबंध कई बार खराब रहे हैं।
मिस्र और जॉर्डन पर भी होगा असर : सऊदी अरब पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से परेशान रहेगा क्योंकि इस क्षेत्र में अमेरिकी सत्ता को कमजोर करना रियाद के हित में नहीं है, लेकिन तालिबान के साथ सउदी के अपने लंबे समय से संबंध हैं।
आम तौर पर, इस क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति पर प्रहार उसके उदारवादी अरब सहयोगियों के लिए चिंताजनक होगा। इसमें मिस्र और जॉर्डन शामिल हैं। दोनों के लिए, तालिबान के अपने स्वयं के संस्करण छाया में छिपे होने के कारण, अफगानिस्तान में घटनाएं अच्छी खबर नहीं हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान की सफलता का पश्चिम एशिया के सबसे ज्वलनशील कोने पर भी प्रभाव पड़ेगा। इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों में, जहां अमेरिका एक सैन्य उपस्थिति बनाए रखता है, अमेरिका का इस तरह निकलना परेशान करने वाला होगा। लेबनान में, जो तमाम कारणों से एक असफल राज्य बन गया है, अफगानिस्तान की पराजय निराशा में इजाफा करेगी।
अमेरिका के लिए चिंतन का समय : इसराइल अपने प्रमुख सहयोगी को लगे झटके के निहितार्थों की गणना करेगा। वैसे पश्चिम एशिया की बढ़ी हुई अस्थिरता से इसराइल को कोई लाभ नहीं होगा। इस अगले चरण में, अमेरिका निस्संदेह पश्चिम एशिया की अपनी सबसे अधिक दबाव वाली प्रतिबद्धताओं से पीछे हट जाएगा। यह उसके लिए इस बात पर चिंतन करने का समय होगा कि अफगानिस्तान के दर्दनाक अनुभव से क्या सबक सीखा जा सकता है।
एक सबक जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के संबंध में सर्वोपरि होना चाहिए- ‘हारे हुए देश’ की लड़ाई लड़ना मात देने वाली बाजी पर दॉव लगाना है। (द कन्वरसेशन)




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