सियागंज में वस्तुएं सस्ती क्यों थीं?

का बनता जा रहा था। संपूर्ण सेंट्रल इंडिया के व्यापारी यहां क्रय-विक्रय हेतु आते थे। बाहर से आने वाली वस्तुओं पर होलकर राज्य द्वारा कर वसूला जाता था।

से तक माल लाने-ले जाने पर होलकर सरकार द्वारा कर वसूला जाता था क्योंकि दोनों स्थानों के मध्य होलकर सीमा थी। इस व्यवस्था पर अंगरेज अधिकारियों ने आपत्ति उठाई और मामला भारत के गवर्नर जनरल तक पहुंचा। रेलवे से मुख्य रूप से अफीम रेसीडेंसी लाई-ले जाई जाती थी, जिससे चुंगी के रूप में राज्य को काफी आय होती थी।
होलकर महाराजा ने ए.जी.जी. के विरोध की परवाह न करते हुए अपने पत्र में लिखा 'दरबार को उसकी सीमा में प्रवेश करने वाली या भेजी जाने वाली वस्तुओं पर आयात-निर्यात कर या संक्रमण (ट्रांजिट) कर लगाने का पूरा-पूरा अधिकार है। जनवरी 1, 1857 के दिन दोनों सरकारों के मध्य जो समझौता हुआ था, उसके अंतर्गत कुछ विशेष स्थानों पर शुल्क की माफी दी गई है। यह स्वतंत्रता केवल बंबई-आगरा मार्ग से गुजरने वाली वस्तुओं के लिए ही है। किंतु, जैसे ही उक्त मार्ग को छोड़कर राज्य की सीमा में प्रवेश किया जाएगा, सीमा शुल्क देना होगा। इंदौर रेसीडेंसी इंदौर राज्य की सीमा में स्थित है और वह बंबई-आगरा मार्ग व रेलवे दोनों की सीमा से बाहर है।'
यदि अंगरेज व्यापारियों को ही रेलवेस्टेशन से रेसीडेंसी तक माल ले जाने व लाने पर कर मुक्त सुविधा दी जाती तो इससे नगर का व्यापार संतुलन गड़बड़ा जाता। अत: होलकर महाराजा ने रेलवे से व्यापार बढ़ाने के लिए नई योजना क्रियान्वित की। 1891 में रेलवे स्टेशन के समीप महाराजा शिवाजीराव के आदेश पर 'मंडी' का निर्माण कर-मुक्त क्षेत्र के रूप में करवाया गया। उस क्षेत्र विशेष में जो भी माल आता व जाता था, उस पर कर नहीं लगाया जाता था, किंतु निर्धारित क्षेत्र के बाहर माल लाने पर शुल्क वसूला जाता था। इस कर-मुक्ति की सुविधा के कारण ही सियागंज अल्पावधि में ही राज्य का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया। बाहर से आने वाले व्यापारी रेल से अपना माल लाते और इस बाजार में बेचते थे। यहीं से वे अपने लिए आवश्यक माल की खरीदी करते थे। इंदौर के व्यापारी भी रेलवे से माल मंगाकर सियागंज मंडी में ही उसे बेच देते थे। इस व्यापार पर उन्हें कोई शुल्क नहीं देना होता था। उक्त व्यापारियों के अतिरिक्त इंदौर के नागरिक भी अपने लिए आवश्यक वस्तुएं इसी बाजार से क्रय करते थे, क्योंकि शहर के अन्य भागों में स्थित दुकानों की अपेक्षा सियागंज में प्रत्येक वस्तु के दाम कम हुआ करते थे और इसकाकारण यहां प्राप्त कर-मुक्ति की सुविधा थी।
यह एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य है कि इसी प्रकार की मंडी की व्यवस्था सिंधिया शासक ने उज्जैन में की थी। उज्जैन रेलवे स्टेशन के समीप विकसित 'फ्रीगंज' सियागंज के समान ही था।

देश की आजादी के बाद होलकर राज्य का अस्तित्व समाप्त हुआ और उसके साथ ही यह सुविधा भी समाप्त हो गई लेकिन एक सदी पूर्व स्थापित सियागंज मंडी आज भी किराना, क्रॉकरी, हार्डवेअर व कई अन्य वस्तुओं के थोक व्यापार का प्रमुख केंद्र है। संपूर्ण मालवा और निमाड़ के कुछ हिस्सों में भी यह मंडी आज भी व्यापार संचार कर रही है।
'शिव विलास' का तलघर

इंदौर के कोषालय के इतिहास से पता लगता है कि होलकर राज्य के संस्थापक मल्हारराव होलकर द्वारा (1728-66) वर्ष 1761 में चांदी के सिक्के बनवाए गए थे जो अब दुर्लभ हैं। देवी अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में भी वर्ष 1767 ई. में मल्हारनगर (इंदौर) की टकसाल में सिक्के ढाले गए, जो अब लंदन संग्रहालय में संरक्षित हैं। इसके पश्चात में भी मल्हारगंज की टकसाल भवन में यशवंतराव होलकर के शासनकाल में सिक्के ढाले जाते रहे।
शिव विलास पैलेस में नीचे तलघर में जवाहर खाना भवन कास्ट्रांग रूम था। उस जवाहरखाने में हीरे जवाहरात व अन्य मूल्यवान रत्नों के पारखी बाबू हरकचंदजी जौहरी साहब को बनारस से बुलवाकर महाराजा तुकोजीराव होलकर (तृतीय) ने नियुक्त किया था और एक कमेटी बनाई गई थी जिसके प्रमुख खजांची साहब ही रहते थे। उस कमेटी में श्री माधवराव खुटाल, राणा बमजंग, ठाकुर रघुनाथसिंह बक्षी, श्री मतकर व होलकर साहब थे और जौहरी साहब की देखरेख में सारे आभूषण व अन्य मूल्यवान बर्तनों व हीरे, जवाहरात रखे जाते थे। स्व. बाबू लाभचंदजी छजलानी, स्व. बाबू हरकचंदजी जौहरी के ही पुत्र थे।
प्रस्तुति : प्रकाश चंद्रसिंह



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