143 वर्ष पूर्व स्थापित हुई इंदौर जनरल लाइब्रेरी

इंदौर नगर में 1841 में 'इंदौर मदरसा' स्‍थापित हुआ। नगर में हिन्दी, व मराठी पढ़ने वालों की संस्‍था में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। स्कूली पुस्तकों के अलावा साहित्य का अध्ययन करने की अभिरुचि लोगों में जागृत होने लगी। कुछ बुद्धि‍जीवियों ने महाराजा से मिलकर नगर में एक सार्वजनिक वाचनालय की स्थापना का अनुरोध किया, जिसे महाराजा ने सहर्ष स्वीकार किया। होलकर राज्य में पहली लाइब्रेरी 1854 में इंदौर नगर में स्‍थापित हुई।

यह लाइब्रेरी राजबाड़े के समीप में खोली गई, इसका कोई किराया नहीं लिया जाता था। प्रारंभ में इस संस्‍था को राज्य की ओर से 12 रु. प्रतिमाह का अनुदान दिया था। शेष व्यय की पूर्ति सदस्यों से शुल्क आदि लेकर की जाती थी।

इंदौर मदरसे के भवन में ही उस समय एक छापखाना भी स्थापित किया गया था। इस प्रेस से द्विभाषी साप्ताहिक 'मालवा अखबार' का प्रकाशन किया जाता था। इसका प्रकाशन उक्त लीथो प्रेस से श्रीराम शास्त्री के द्वारा किया जाता था। इस प्रेस को बाद में मोती बंगले (वर्तमान कमिश्नर ऑफिस) में स्थानांतरित कर दिया गया और श्रीराम शास्त्री के निरीक्षण में मार्च 1873 से साप्ताहिक राजकीय गजट का प्रकाशन होने लगा।
इंदौर जनरल लाइब्रेरी की प्रगति में राज्य के साथ-साथ इसके पाठक सदस्यों ने काफी सक्रिय सहयोग दिया। 1926 ई. तक इस लाइब्रेरी में एक समृद्धशाली ग्रंथ संग्रह हो गया था। इस संस्था को राजकीय अनुदान भी काफी बढ़ा दिया गया था। इसकी व्यवस्था के लिए 19 सदस्यों की एक समिति गठित की गई थी। दो उपसमितियां भी थीं, जो क्रमश: वित्तीय मामलों की देखभाल व पुस्तकों के चयन एवं क्रय का कार्य करती थीं।

ग्रंथालय को चार भागों में विभाजित किया गया था- पुस्तक विभाग, संदर्भ विभाग, वाचनालय व सार्वजनिक अध्ययन कक्षा। 1926 ई. के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि उस वर्ष इस ग्रंथालय में 6851 पुस्तकें थीं तथा 465 व्यक्ति इसके सदस्य थे। इस वाचनालय में उस समय 17 दैनिक, 18 साप्ताहिक पत्र तथा 38 मासिक पत्रिकाएं पाठकों के अध्ययन हेतु बुलाई जाती थीं।
एक सदी पुरानी इंदौर की विक्टोरिया लाइब्रेरी
इंदौर रेसीडेंसी व छावनी क्षेत्र के शिक्षित-प्रबुद्ध वर्ग की ज्ञान पिपासा शांत करने के लिए 1881 ई. में एक सार्वजनिक संस्‍था की स्थापना का विचार मूर्तरूप लेने लगा था, तब एक छोटा वाचनालय यहां स्‍थापित किया गया था। यह एक संयोग ही था। इसकी स्थापना के कुछ वर्षों बाद ही इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की जुबली मनाई जाने की घोषणा की गई। तभी इस वाचनालय को 'विक्टोरिया लाइब्रेरी' का स्वरूप देने का निश्चय किया गया।
संयोगितागंज हाईस्कूल के परिसर में लगी हुई प्राचीन इमारत जिसके द्वार पर 'महादेवी वर्मा ग्रंथालय' का नामपट्ट लगा हुआ है। अभी कुछ वर्षों पूर्व तक विक्टोरिया लाइब्रेरी के नाम से जानी जाती थी।

इंदौर रेसीडेंसी व छावनी क्षेत्र के शिक्षित-प्रबुद्ध वर्ग की ज्ञान पिपासा शांत करने के लिए 1881 ई. में एक सार्वजनिक संस्‍था की स्थापना का विचार मूर्तरूप लेने लगा था, तब एक छोटा वाचनालय यहां स्‍थापित किया गया था। यह एक संयोग ही था। इसकी स्थापना के कुछ वर्षों बाद ही इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की जुबली मनाई जाने की घोषणा की गई। तभी इस वाचनालय को 'विक्टोरिया लाइब्रेरी' का स्वरूप देने का निश्चय किया गया।

ग्रंथालय भवन के निर्माण के लिए समिति ने 4000 रु. का संकलन कर लिया तो रेसीडेंसी अधिकारियों ने ग्रंथालय भवन के निर्माण हेतु भूमि प्रदान कर दी। देखते ही देखते वर्तमान भवन निर्मित हुआ और 17 नवंबर 1887 को एक समारोह में सेंट्रल इंडिया के लिए भारत सरकार के गवर्नर जनरल के एजेंट सर लिपल ग्रिफिन ने इस ग्रंथालय को विधिवत उद्घाटित घोषित किया।
ग्रंथालय भवन के निर्माण पर अनुमानित व्यय से अधिक धन लग गया था और भवन निर्माण समिति पर 1200 रु. का कर्ज हो गया था। 1889 की बात है, जब यह समस्या कार्यवाहक ए.जी.जी. मिस्टर हेनवी के समक्ष रखी गई तो उन्होंने तत्काल 1000 रु. का अनुदान ग्रंथालय के लिए स्वीकृत कर दिया।

1905 ई. में इस ग्रंथालय के पुराने नियमों को संशोधित किया गया और इसका प्रबंध संभ्रांत नागरिकों की समिति को सौंप दिया गया, जिसमें सभी वर्ग के नागरिक थे। उस समय इसके सदस्यों की कुल संख्या 81 थी, जिनमें 41 हिन्दू, 23 पारसी, 8 मुस्लिम व 9 ईसाई थे। इनमें 39 शासकीय कर्मचारी थे और शेष इंदौर रेसीडेंसी व होलकर राज्य के अधिकारी थे। उस वर्ष ग्रंथालय की आय 40 रु. थी और 15 रु. मासिक अनुदान रेसीडेंसी से प्राप्त होता था। उसी वर्ष प्रथम सहायक मिस्टर रेनॉल्ड ने विक्टोरिया लाइब्रेरी का अवलोकन किया व प्रभावित होकर 1000 रु. का अनुदान दिया।
1911 ई. में इस लाइब्रेरी के अध्यक्ष श्री पी. नंदलाल थे, जिन्होंने ए.जी.जी. को एक विस्तृत आवेदन पत्र प्रस्तुत करते हुए ग्रंथालय भवन की दुरुस्ती, पुस्तकों के क्रय व कर्मचारियों के वेतन हेतु अधिक अनुदान की मांग की थी। उन्होंने भवन की उपयोगिता बताते हुए इस बात को भी रेखांकित किया था कि रेसीडेंसी के कर्मचारियों के यहां सार्वजनिक कार्यक्रम भी आयोजित होते रहते हैं।

आजादी के बाद भी यह ग्रंथालय उपेक्षा का शिकार बना रहा। भवन जीर्ण-शीर्ण हो गया है और अतिक्रमण का शिकार हो रहा है। रोटरी क्लब ने इसकी सुध ली है और वर्तमान रख-रखाव व संचालन का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है, फिर भी बहुमूल्य भूमि, भवन व ग्रंथों की सुरक्षा के लिए बड़ी निधि की आवश्यकता है। शासन, नगर निगम, विश्वविद्यालय, नागरिक व उद्योगपतियों का समूह मिलकर इसकी रक्षा कर सकता है।



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