इंदौर में चिकित्सा शिक्षा व चिकित्सालय

नगर में पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली अधिक लोकप्रिय नहीं थी। वर्ष 1857 में जब इंदौर में भी विद्रोह भड़का तो क्रांतिकारियों ने पाश्चात्य चिकित्सालय भवन को ही जला डाला था।

हकीमों और वैद्यों के इलाज ही सामान्यतः प्रचलित थे। योरपीय पद्धति को लोग शंकापूर्ण नजरिए से देखते थे। तरह-तरह की दंत-कथाएं जोड़कर हकीमों और वैद्यों ने भी इस प्रणाली के विरुद्ध प्रचार किया था। नई-नई प्रणाली होने के कारण लोगों में योरपीय चिकित्सा का अध्ययन करने केप्रति भी रुचि नहीं थी।

ऐसी परिस्थितियों में वर्ष 1870 में चिकित्सा शिक्षा देने के लिए सर्वप्रथम रेसीडेंसी में एक कक्षा प्रारंभ की गई। राज्य की ओर से उस समय जनता का इलाज करने के लिए वैद्यों व हकीमों को नियुक्त किया जाता था। अतः पहले छात्र-समूह के रूप में वैद्यों व हकीमों को ही इस क्लास में भर्ती किया गया।
आगे चलकर इसी क्लास को वर्ष 1878 में सेंट्रल इंडिया मेडिकल स्कूल का स्वरूप दे दिया गया। कर्नल ब्यूमांट जो अंगरेज अधिकारी थे, के प्रयासों से उसी वर्ष इंदौर में किंग एडवर्ड हॉस्पिटल के नाम से एक चिकित्सालय भी स्थापित हुआ। उक्त मेडिकल स्कूल के लिए सेंट्रल इंडिया की तमाम देशी रियासतों से आर्थिक सहायता मिलती थी। उन दिनों होलकर राज्य की ओर से इस मेडिकल स्कूल के लिए प्रतिमाह 249 रु. दिए जाते थे।
प्रारंभ में इस स्कूल में केवल 4 छात्रों ने प्रवेश लिया। उन छात्रों की प्रगति पर संतोष व्यक्त करते हुए कर्नल ब्यूमांट ने लिखा है- 'छात्रों के पहले दल को शरीर विज्ञान का पूर्ण प्रशिक्षण दिया जा चुका है। उनका विशेष ध्यान ऐसे अवयवों पर आकर्षित किया गया है, जो शल्य चिकित्सा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। शरीर के सभी मुख्य भागों की बीमारियोंसे संबंधित औषधियों का उन्होंने पूरी तरह अध्ययन कर परीक्षा उत्तीर्ण की है।
मेडिकल स्कूल के छात्रों को औषधि तथा शल्यक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए चिकित्सालय ले जाया जाता था। वहां भर्ती रोगियों में से कुछ की बीमारियों के विषय में उन्हें विशेष निर्देश दिए जाते थे। छात्र उन बीमारियों का पूर्व वृत्तांत लिखकर तैयार करते थे तथा रोग के लक्षण, उनकी प्रगति तथा औषधियों के प्रभाव के संबंध में भी सूचनाएं एकत्रित करते थे।

मानव-शरीर की अस्थियों की संरचना आदि की शिक्षा कक्षा में देने में बड़ी असुविधा होती थी। इस कमी को दूर करने के लिए 1880 में शरीर विज्ञान के कुछ मॉडल पेरिस से बुलाकर यहां रखे गए।
चिकित्सा विज्ञान का अध्ययन कर 4 छात्रों का पहला दल 1880-81 में निकला। इनमें सभी चिकित्सालय सहायक के पद के लिए योग्य घोषित किए गए। इन्हीं 4 छात्रों में से एक श्री गोपाल परसुराम को इंदौर नगर चिकित्सालय में सहायक का पद उनकी शिक्षा समाप्त होते ही दे दिया गया था।

इंदौर चिकित्सालय का निरीक्षण करने भारत सरकार के प्रमुख शल्य चिकित्सक डॉ. कनिंघम दिसंबर 1881 में इंदौर आए। उन्होंने इंदौर मेडिकल स्कूल का भीअवलोकन किया। इस स्कूल में छात्रों को दिए जाने वाले प्रत्यक्ष प्रशिक्षण पर हार्दिक प्रसन्नाता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि इस प्रकार की उन्नात चिकित्सा शिक्षा का प्रबंध तो लाहौर या कलकत्ता में भी उपलब्ध नहीं है।
यह जानना कम रोचक न होगा कि चिकित्सा शिक्षा में महिला विद्यार्थी का प्रवेश आज से एक सदी पूर्व हमारे नगर में हुआ। शांतिबाई खोत पहली महिला थीं जिन्होंने 1891 में इस स्कूल में प्रवेश लिया था। उस समय सभी मेडिकल छात्रों को राज्य की ओर से 6 रु. प्रतिमाह की छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। मेडिकल स्कूल के छात्रों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई। इस स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 1886 में 13, 1910 में 70, 1920 में 139 तथा 1930 में बढ़कर 260 हो गई।
सेंट्रल इंडिया मेडिकल स्कूल ही आगे चलकर किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल तथा बाद में वर्तमान महात्मा गांधी स्मृति मेडिकल कॉलेज बना।

अम्बारीखाने में खुला था पहला चिकित्सालय

इंदौर नगर में पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली पर आधारित चिकित्सालयों का अभाव था। वैद्य और हकीमों द्वारा चिकित्सा की जाती थी। राज्य की ओर से कुछ वैद्यों व हकीमों को नियुक्त किया गया था। कुछ निजी रूप से औषधियांदेते व इलाज करते थे। नगर में प्रसिद्ध वैद्य श्री ठाकुरलाल व्यास, गणेश शास्त्री भागवत, गणेश शास्त्री केलकर तथा कन्हैयालालजी आदि थे। यूनानी चिकित्सा में विशेषज्ञ मोहम्मद आजम खान, हकीम सा. तथा मघरअली सा. थे। महाराजा तुकोजीराव (द्वितीय) का विश्वास भी पाश्चात्य चिकित्सा की अपेक्षा देशी प्रणाली पर अधिक था। फिर भी उन्होंने योरपीय पद्धति का कतई विरोध नहीं किया। नगर में निर्धन व्यक्तियों की चिकित्सा करने के लिए 1944 में एक चेरिटेबल हॉस्पिटल प्रारंभ किया गया था, जिसे आमतौर पर लोग 'गरीबखाने का अस्पताल' कहते थे।
पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली पर आधारित पहला चिकित्सालय राजवाड़े के पास स्थित गोपाल मंदिर के समीप अम्बारीखाने में खोला गया। श्री विनायक राव को इसमें सर्वप्रथम चिकित्सालय सहायक के रूप में नियुक्त किया गया। जनता के अविश्वास और वैद्यों व हकीमों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों के कारण इस चिकित्सालय में कोई अपना उपचार करवाने के लिए तैयार ही न था। 1 जुलाई 1857 को जब इंदौर में अंगरेजी हुकूमत के विरुद्ध जय-घोष गूंजा तो अंगरेजी पद्धति वाला यह चिकित्सालय भी जलाकर राख कर दिया गया।
विद्रोह शांत हो जाने पर पुनः इस चिकित्सालयकी गतिविधियों को संचालित किया गया किंतु इस बार इसे इंदौर मुसाफिरखाने के एक हिस्से में चलाया गया। 1860 तक यह उसी भवन में चला इसके बाद कैम्प स्थित नए भवन में इसे स्थानांतरित किया गया। धीरे-धीरे यह औषधालय शल्य चिकित्सा के कारण सर्व-साधारण में लोकप्रिय होने लगा। यद्यपि ग्रामीण लोग तो 1908 तक भी यहां आने से घबराते थे क्योंकि शल्यक्रिया के पूर्व अचेत करने के लिए दिए जाने वाले क्लोरोफार्म को वे भय और आशंका की दृष्टि से देखते थे। श्री विनायक के बाद 100 रु. प्रतिमाह के वेतन पर श्री वामनराव की नियुक्ति इस चिकित्सालय में हुई। 1865-66 तक नगर में पाश्चात्य प्रणाली के दो चिकित्सालय थे। पहला नगर में दूसरा रेसीडेंसी क्षेत्र में। इन दोनों के संचालन हेतु महाराजा और नगर के धनिक व्यक्तियों से आर्थिक अनुदान मिला करता था।
इनका निरीक्षण रेसीडेंसी सर्जन द्वारा किया जाता था। इंदौर चेरिटेबल हॉस्पिटल ने मालवा की समस्त चिकित्सा संस्थाओं में अग्रणी स्थान पा लिया था। 1873 में बंबई से एक प्रशिक्षित महिला परिचारिका को लाकर नियुक्ति दी गई। वह पहली महिला थी जिसने परिचारिका कार्य प्रारंभ किया। महिला विभाग में विशेषकर प्रसव-कार्योंमें उनकी सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

नगर व बाहर से आने वाले गंभीर रोगियों को चिकित्सालय में भर्ती करना पड़ता था और उनका दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा था। स्थानाभाव के कारण समस्याएं उत्पन्ना होने लगी थीं। 1873 के अंतिम माह में इस चिकित्सालय में 100 आंतरिक रोगी भर्ती थे।
डॉ. ब्यूमांट के सफल निर्देशन में यह चिकित्सालय विकसित होता रहा। स्थानाभाव दूर करने के लिए महाराजा ने नवीन भवन निर्मित करने का आदेश दिया और इसके लिए 1875 में 10,000 रु. की राशि भी स्वीकृत की। एक वर्ष में ही नया भवन बनकर तैयार हो गया और 1876 में चिकित्सालय उसमें स्थानांतरित कर दिया गया। उस वर्ष 7654 रोगियों की चिकित्सा उसमें की गई।

डॉ. चुन्नीलाल दास की सेवाएं भारत सरकार से प्राप्त की गई और इस चिकित्सालय को उनके नियंत्रण में दे दिया गया।
नगर के पश्चिमी क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों को इलाज के लिए लंबा रास्ता तय करना होता था। अतः 1882 में मल्हारगंज में एक डिस्पेंसरी कायम की गई और उसका वार्षिक व्यय 2,000 रु. आवंटित किया गया। इसका प्रभार श्री गोविंद सदाशिव को सौंपा गया।

1891 में गरीबखाना अस्पताल का और विस्तार किया गया। उसके भवन निर्माण पर 55,000 रु. का व्यय किया गया व उसका नाम 'होलकर चिकित्सालय' रखा। इस चिकित्सालय को उन्नात उपकरणों से सुसज्जित किया गया। इसमें शल्यक्रिया कक्ष, रोगी परीक्षण कक्ष, परिचारिका प्रशिक्षण कक्ष तथा 100 रोगियों को रखने की व्यवस्था थी।
चिकित्सा के मामले में अग्रणी हुआ इंदौर

रोगियों को अधिकाधिक सुविधाएं प्रदान करने हेतु महाराजा तुकोजीराव हॉस्पिटल (एम.टी.एच.) स्थापित किया गया। इसका उद्‌घाटन तत्कालीन रेजीडेंट कर्नल आर.एच. जेनिंग्स ने 30 नवंबर 1901 को किया था। उसी चिकित्सालय में इंदौर मेडिकल स्कूल की प्रथम महिला विद्यार्थी डॉ. शांतिबाई खोत को चिकित्सक के रूप में नियुक्त किया गया। यहां बाह्य रोगियों का परीक्षण प्रतिदिन डॉ. म्हालास तथा आंतरिक रोगियों की चिकित्सा डॉ. वाघ तथा डॉ. सारंगपाणी द्वारा की जाती थी।
मल्हारगंज में उन दिनों डॉ. जी.एस. चासकर नियुक्त थे। वर्ष 1912 में डॉ. जी.आर. तांबे राज्य के प्रमुख चिकित्सक पद पर कार्य कर रहे थे।

वर्ष 1925-26 तक महाराजा तुकोजीराव चिकित्सालय अग्रणी चिकित्सालय बन चुका था, जिसमें एक्स-रे, रेडियम विभाग, विद्युत विभाग, दंत चिकित्सा विभाग, प्रसूति-गृह, शल्यक्रिया कक्षआदि संचालित हो रहे थे। चिकित्सालय के विस्तार में स्थानीय बोहरा समाज तथा राज्य भूषण सर सेठ हुकुमचंदजी ने भी पर्याप्त आर्थिक अनुदान दिया था।
यहां मेडिको लीगल केसेस का परीक्षण होता था। वर्ष 1913 से यहां की प्रयोगशाला में उन अपराधियों के नाखूनों के नमूनों का परीक्षण प्रारंभ हुआ, जिन पर हत्या आदि का अभियोग होता था। अन्य पैथालॉजीकल टेस्ट भी यहां किए जाते थे। यहीं एक औषधि विक्रय केंद्र भी खोला गया, जहां महत्वपूर्ण व दुर्लभ औषधियां उपलब्ध रहती थीं। क्षयरोगियों की चिकित्सा हेतु राऊ में एक सेनेटोरियम बनवाया गया था। जनवरी 1914 में महाराजा तुकोजीराव ने इसका उद्‌घाटन किया था। प्रारंभ में इसमें केवल 20 रोगियों को रखने की व्यवस्था थी, किंतु राज्यभर से आने वाले रोगियों के दबाव के कारण बाद में इसका और विस्तार किया गया। 1921 में यहां 43 रोगी इलाज के लिए भर्ती थे।
विभिन्ना रोगों से बच्चों को बचाने के लिए उन्हें टीके लगाने का कार्य 1872-73 में ही प्रारंभ कर दिया गया था। घर-घर जाकर वैक्सीनेटर टीके लगाते थे। इस कार्य के लिए इंदौर मेडिकल स्कूल के प्रशिक्षित लोगों को नियुक्तियां दी गई थीं। 1875-76 में ऐसे 14लोग व एक निरीक्षक नियुक्त था। उसी एक वर्ष में 3925 बच्चों को टीके लगाए गए थे।
नगर में मानसिक रोगियों की चिकित्सा व आवास के लिए पृथक से प्रबंध था। 6 जून 1879 को बाणगंगा के समीप बने मानसिक चिकित्सालय में चिकित्सा व आवास व्यवस्था स्थानांतरित की गई। यह स्थान नगर की घनी आबादी से काफी दूर था और आस-पास का क्षेत्र लगभग निर्जन-सा था।
1879 में इस चिकित्सालय में 25 मानसिक रोगी भर्ती किए गए थे। जिनमें से 15 ठीक हो गए थे। मानसिक चिकित्सालय के समीप ही एक कुष्ठ रोग निवारण आश्रम था जिसमें कुष्ठ पीड़ित व्यक्तियों की चिकित्सा की जाती थी। महाराजा तुकोजीराव चिकित्सालय में भी एक पृथक विभाग कुष्ठ निवारण हेतु स्थापित किया गया था। निर्धन व अनाथ व्यक्तियों की राजकीय चिकित्सालयों में न केवल निःशुल्क चिकित्सा की जाती थी अपितु उन्हें भोजन भी निःशुल्क दिया जाता था।
यह एक स्थापित सत्य है कि इंदौर में स्थापित महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय आज भी प्रदेश का सबसे बड़ा शासकीय चिकित्सालय है।

शल्य-चिकित्सा में तब भी अग्रणी था इंदौर नगर

इंदौर रेसीडेंसी परिसर में कर्मचारी आवास व एक चिकित्सालय भवन का निर्माण करवाया गया था। यहइंदौर नगर में अपने किस्म का पहला चिकित्सालय था, जिसमें पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली अपनाई जाकर शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की जाती थी। इस चिकित्सा प्रणाली को नगरवासी बड़े अविश्वास व कौतूहल की नजर से देखते थे। खासकर सर्जरी पर उनका विश्वास न था। आम नागरिक की बात तो समझी जा सकती है, किंतु तत्कालीन होलकर नरेश महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) का भी विश्वास इस चिकित्सा पद्धति में नहीं था।
इन अविश्वासी भावनाओं के रहते हुए भी रेसीडेंसी का चिकित्सालय इस बात के लिए नगर व आसपास के इलाकों में विख्यात हो गया था कि यहां कटी हुई नाक को जोड़ दिया जाता था। हिंदुस्तान में संभवतः प्रथम गजेटियर के संपादन का श्रेय अंगरेजी विद्वान डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर को जाता है, जिसने इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया की सीरिज को संपादित कर वर्ष 1886 में प्रकाशित करवाया था। इस श्रृंखला की 7वीं जिल्द के पृष्ठ 9-10 पर इंदौर रेसीडेंसी चिकित्सालय के विषय में वे लिखते हैं- 'इंदौर रेसीडेंसी चिकित्सालय अपने ढंग की अत्यंत उपयोगी तथा सफल संस्थाओं में से एक है। बड़े ऑपरेशनों के लिए इसकी अपनी ख्याति है। ऐसे ऑपरेशनों की संख्या 500 प्रतिवर्ष है। शल्यचिकित्सा के क्षेत्र में इसकी विशेषता महिलाओं की कटी नाक का पुनर्रोपण है। रियासतों में पति ऐसी पत्नियों की नाक काट लिया करते हैं, जिनके चरित्र पर उन्हें संदेह होता है। महिलाएं तब अपनी नाक को सुधारने के लिए इंदौर चिकित्सालय की ओर दौड़ती थीं। कभी-कभी तो वे कटी हुई नाक को रूमाल में सावधानीपूर्वक लपेटकर ले आती थीं। नाक का पुनर्रोपण प्रायः सफल हो जाया करता था। इसके अतिरिक्त शल्यक्रिया में भी इस चिकित्सालय ने पूरे सेंट्रल इंडिया एवं राजपूताना में काफी ख्याति पाई थी।'
श्री हंटर द्वारा किया गया यह उल्लेख जहां तत्कालीन समय में महिलाओं की दयनीय स्थिति को दर्शाता है, वहीं नगर के लिए यह गौरव की बात थी कि आज से एक सदी पूर्व भी इंदौर शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में संपूर्ण सेंट्रल इंडिया का प्रमुख केंद्र था। चिकित्सा सुविधाओं के मामले में यह परंपरा आज भी कायम है।

वर्ष 1940 में इंदौर मेडिकल कॉलेज स्थापित हो जाता

इंदौर में चिकित्सा शिक्षा की कक्षा 1870 में रेसीडेंसी में प्रारंभ की गई। 1878 में कर्नल ब्यूमांट के प्रयासों से किंग एडवर्ड चिकित्सालय व मेडिकल स्कूल की स्थापना हुई। इनकी स्थापना के लिए मध्यभारत कीअनेक रियासतों ने आर्थिक सहयोग प्रदान किया था। समूचे सेंट्रल इंडिया से छात्रगण इस स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने आते थे। वर्ष 1930 में ऐसे 260 विद्यार्थी यहां अध्ययनरत थे।
वर्ष 1938 में दिल्ली में देशभर के मेडिकल स्कूल की एक कांफ्रेंस आयोजित की गई, जिसमें यह प्रस्ताव पारित किया गया कि भविष्य में मेडिकल स्नातक शिक्षा पाने वाले डॉक्टरों की श्रेणी में शामिल किए जाएंगे। अतः मेडिकल स्कूलों का दर्जा बढ़ाकर महाविद्यालय किया जाए। यह भी प्रस्ताव था कि चिकित्सा स्नातक का कोर्स 4 वर्ष की अपेक्षा 5 वर्षों का कर दिया जाए। इस महाविद्यालय की डिग्री को ब्रिटेन की जनरल मेडिकल कौंसिल द्वारा विश्वभर के चिकित्सकों के समकक्ष माना जाता था।
उक्त प्रस्तावों के परिप्रेक्ष्य में ही इंदौर के किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल का दर्जा भी बढ़ाया जाना था। दिल्ली के मेडिकल कॉलेज के समान ही इंदौर का मेडिकल कॉलेज भी प्रस्तावित किया गया था। इस कॉलेज भवन की अनुमानित लागत 55 लाख रु. आंकी गई थी। इनमें से 6 लाख रु. उपकरणों पर व 2 लाख रु. विद्युत फिटिंग पर खर्च होने थे। प्रतिवर्ष इस महाविद्यालय के संचालन पर 4.19 लाख रु. खर्च होना थे।

प्रस्तावित महाविद्यालय में प्रतिवर्ष70 विद्यार्थियों को 5 वर्षीय कोर्स के प्रथम वर्ष की कक्षा में प्रवेश दिया जाता था। कुल 400 विद्यार्थियों की अध्यापन व्यवस्था विभिन्ना कक्षाओं के अंतर्गत यहां होनी थी। सेंट्रल इंडिया की विभिन्ना रियासतों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए 35 स्थान सुरक्षित थे। एक स्थान सुरक्षित करवाने के लिए राज्य को 7000 रु. देने थे। इस अनुपात में स्थान किसी राज्य विशेष के लिए आरक्षित किए जाने थे। यह राशि पूंजीगत निवेश में जोड़ी जानी थी। ऐसे आरक्षित स्थानों पर भर्ती विद्यार्थियों से केपिटेशन फीस नहीं ली जाना थी और शिक्षण शुल्क में रियायत भी थी। शेष 35 स्थानों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर लिखित प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जाकर गुणानुक्रमानुसार छात्रों को भर्ती किया जाना था। ऐसी परीक्षा से भर्ती होने वाले छात्रों से केपिटेशन फीस ली जानी थी। मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थी इस परीक्षा में सम्मिलित होने के पात्र थे।
यह प्रस्ताव मूर्त रूप लेता इसके पूर्व ही द्वितीय विश्व युद्ध (1939) प्रारंभ हो गया और तत्काल मेडिकल कॉलेज नहीं बना।

एम.वाय. के निर्माण के पूर्व 500 शैयाओं का अस्पताल प्रस्तावित था

पश्चिमी चिकित्सापद्धति का चिकित्सालय इंदौर में सर्वप्रथम वर्ष 1852 में गोपाल मंदिर के समीप अम्बारीखाने में खोला गया था। इसे वर्ष 1857 के महान विद्रोह के समय क्रांतिकारियों ने स्वाहा कर दिया था। इसके बाद वह औषधालय इंदौर मुसाफिरखाने के एक भाग में चलता रहा। 1865-66 तक नगर में दो चिकित्सालय कार्य करने लगे- पहला नगर में व दूसरा रेसीडेंसी क्षेत्र में।
इंदौर मेडिकल स्कूल के 8 विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रारंभ में इंदौर चेरिटेबल हॉस्पिटल के साथ जोड़ा गया था और बाद में उन्हें किंग एडवर्ड हॉस्पिटल से संबद्ध कर दिया गया।

वर्ष 1938 में जब अखिल भारतीय स्तर पर यह निर्णय दिल्ली कांफ्रेंस में लिया गया कि मेडिकल स्कूलों का दर्जा बढ़ाकर मेडिकल कॉलेज किया जाए, जिसमें स्नातक उपाधि तक अध्यापन व्यवस्था हो तो यह सवाल भी उठा कि ऐसे स्कूलों से संबद्ध चिकित्सालयों का दर्जा भी बढ़ाया जाए।
इस मुद्दे पर विचार करने हेतु रेजीडेंट की अध्यक्षता में इंदौर रेसीडेंसी में 21 अक्टूबर 1940 को किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल व हॉस्पिटल की संचालन समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में तय किया गया कि किंग एडवर्ड हॉस्पिटल को 500 शैयाओंवाला किया जाए। इसके लिए 14 लाख रु. की लागत से नया भवन बनाया जाना प्रस्तावित था।

इस भवन में प्रत्येक वार्ड के कोनों पर विद्यार्थियों के लिए पृथक कक्ष बनाए जाने थे। शल्य कक्ष में ऐसी व्यवस्था की जानी थी, जहां ऊंचाई पर बैठकर विद्यार्थी शल्य क्रिया को देख पाते। प्रशिक्षु चिकित्सकों को चिकित्सालय भवन में ही रहने की व्यवस्था की जानी थी। बाह्य चिकित्सा विभाग, प्रयोगशालाओं व शव-परीक्षण कक्षों में भी विद्यार्थियों के लिए पृथक व्यवस्थाओं का प्रावधान रखा गया था। इस प्रस्तावित चिकित्सालय की स्थापना में भी सेंट्रल इंडिया की रियासतों से अनुपातिक आर्थिक अनुदान लिया जाना था।
इस चिकित्सालय के निर्माण हेतु होलकर राज्य द्वारा भूमि व आर्थिक सहयोग दिया जाना था किंतु वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो जाने के कारण सारी योजना ठप हो गई। बाद में किंग एडवर्ड हॉस्पिटल के पूर्व में वर्तमान महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय की स्थापना का संकल्प होलकर महाराजा ने लिया और प्रतिवर्ष राज्य ने अलग धन बचाया। वर्ष 1948 तक राशि 30 लाख रु. हो गई। मध्यभारत की स्थापना के समय ब्याज सहित यह धन 31.2 लाख रु. था। 18 फरवरी 1950 को इसका निर्माण प्रारंभ हुआ और 66 लाख रु. की लागत से 4 लाख वर्गफीट का यह निर्माण कार्य वर्ष 1955 में पूरा हुआ, जिसकी 7 मंजिलों में 730 पलंग रखने की क्षमता थी। अब इंदौर में जिला चिकित्सालय भी है और निजी क्षेत्र के अनेक साधन संपन्न चिकित्सालय भी।



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