समकालीन कहानी का स्त्री पक्ष : छह दशकों की स्त्री रचनाधर्मिता की शिनाख्त


प्रो. स्मृति शुक्ल

'समकालीन कहानी का स्त्री पक्ष' 'लमही' के संपादक विजयराय के संपादन में अनन्य प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित 471 पृष्ठों की एक वृहद आलोचनात्मक पुस्तक है। इस पुस्तक में चित्रा मुद्‌गल, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मंजुल भगत और सूर्यबाला से लेकर पंखुरी सिन्हा, गीताश्री, प्रज्ञा पांडेय, भूमिका द्विवेदी अश्क, प्रज्ञा तथा सोनी पांडेय तक कुल तिरेपन महिला कथाकारों के रचनात्मक योगदान का गहराई से मूल्यांकन करने वाले स्वतंत्र आलोचनात्मक लेख संकलित हैं।

हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों से लेकर संभावनाशील 51 युवा आलोचकों ने अपनी समर्थ लेखनी और आलोचकीय विवेक से साठोत्तरी महिला कथालेखन तथा भूमंडलीकरण के बाद के कथालेखन के साथ इक्कीसवीं सदी के युवा कथालेखन का विस्तृत मूल्यांकन किया है।

विजयराय ने अपने संपादकीय लेख में स्त्री लेखन के इतिहास को समेकित करते हुए लिखा है कि- ''हिन्दी में स्त्री-लेखन के विकास को अगर संक्षेप में समझना हो तो अभिव्यक्ति, अस्मिता और अभियान ये तीन सूत्र पर्याप्त हैं। विशेषकर कहानी के परिदृश्य में तो ये सूत्र और भी सटीक साबित होते हैं।

विजयराय ने अपने संपादकीय में स्त्री अधिकारों के लिये पश्चिमी और भारतीय आंदोलनों तथा विमर्शों की बात करते हुए लिखा है कि- 'दुनिया भर के अस्मितामूलक विमर्शो का आरंभ समानता की आवश्यकता के कारण हुआ है। उन्होंने स्त्री और पुरुष लेखन में जो दृष्टिगत अंतर है उसका बड़ा बारीक विश्लेषण किया है। वर्तमान महिला कथा लेखन की उपलब्धियों के साथ महिला कथालेखन की सीमाओं को भी स्पष्ट करते हुए विजयराय ने महिला कथालेखन में अपार संभावनाएं देखी हैं।

इस पुस्तक में प्रांजल धर ने 'प्रवासी महिला लेखन का विस्तृत क्षितिज' शीर्षक से अनीता कपूर,सुषम बेदी, सुधाओम ढींगरा, दिव्या माथुर, नीना पॉल, अनिल प्रभा कुमार, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, कविता वाचक्वनी और ज़ाकिया जुबेरी जैसी महत्वपूर्ण प्रवासी कथा लेखिकाओं के व्यक्तित्व उनके रचना संसार और उनकी रचनात्मक दृष्टि का सम्यक मूल्यांकन किया है।

मुक्ता टंडन ने हिन्दी के वृहद कथा संसार में अपनी जगह बनाती बारह नवोदित कहानीकारों की रचनाओं में निहित मानवीय संवेदनाओं और वर्तमान परिवेश में इन संवेदनाओं पर छाए संकट के घटाटोप को पहचानने की कोद्गिाद्गा की है। इस पुस्तक में 'स्त्री कथा और अनुभवजन्य आख्यान ' शीर्षक से प्रसिद्ध आलोचक पंकज पाराशर का अत्यंत गंभीर और विश्लेषणात्मक लेख है जिसमें स्त्री कथाकारों की कहानियों में निहित आज के आधुनिक जीवन की जटिलताओं के साथ ही स्त्री जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं एवं स्त्री और पुरुष लेखन के नजरिये की भिन्नता को स्पष्ट किया गया है ।

उन्होंने अनेक कहानियों के उदाहरण देते हुए लिखा है कि स्त्री जीवन के समकालीन यथार्थ को अधिक प्रमाणिक और वास्तविक रूप में स्त्री की नजरों से ही देखा जाना संभव है। स्त्री लेखन की वैचारिकी प्रथमतः स्त्री-अनुभव से निर्धारित होती है लेकिन यह भी सच है कि हर स्त्री का अनुभव संसार अलग-अलग है। प्रख्यात कथाकार पंखुरी सिन्हा का आलोचनात्मक लेख ''प्रवासी कथा के भावनात्मक मानचित्र' और वैश्विक साहित्य में हस्तक्षेप'' प्रवासी कथाकार उषाराजे सक्सेना, इला नरेन और अर्चना पेन्युली के कथा संसार का गहराई से विश्लेषण करता है। पंखुरी सिन्हा ने रचनाकारों के रचना-जगत्‌ में आलोचनात्मक विवेक के आलोक में आभ्यन्तर तक प्रवेश कर कहानियों के मर्म तक पहुंचने का सफल प्रयास किया है । उन्होंने प्रवासी महिला कथाकारों के लेखन में अन्तर्निहित बहुआयामी सरोकारों की गहराई से पड़ताल की है।
पुनीता जैन ने अपने गंभीर और विस्तृत आलोचनात्मक आलेख में दलित और आदिवासी स्त्री कथाकारों में सुशीला टाकभौरे, रजनी दिसोदिया, अनीता भारती, पूनम तुषामड़, एलिस एक्का, रोज केरकेट्‌टा फ्रांसिस्का कुजूर, सुशीला धुर्वे की कहानियों में अतीत में हुए उत्पीड़न, दलन, शोषण और अन्याय के यथार्थ चित्रण के बाद समतापूर्ण समाज की स्थापना के सूत्र तलाशे हैं । आदिवासी जीवन के कठिन और संघर्षशील जीवन, उनकी संस्कृति तथा उनके भोले और निष्कपट व्यक्तित्व की तलाश इस लेख में है।
पुस्तक का पहला लेख वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्‌गल की कहानियों को केन्द्र में रखकर लिखा गया डॉ. हेमराज कोशिक का विस्तृत लेख है जिसमें उन्होंने लिखा है कि - ''पिवृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के अनेक पक्षों को अनावृत करते हुए चित्रा मुद्‌गल ने नारी चेतना और परिवर्तित परिवेश में नारी की विद्रोह मुद्रा को अभिव्यक्ति दी है।

ओमप्रकाश मिश्र ने ममता कालिया की कहानियों के कथ्य और शिल्प की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए उनकी कहानियों को मानवीय संवेदनाओं से भरी हुई और पूर्णता का अहसास देने वाली कहानी निरूपित किया है। प्रज्ञा पांडेय जो स्वयं एक स्थापित कहानीकार हैं उन्होंने मृदुला गर्ग और उषा किरण खान कहानियों का सम्यक विश्लेषण करके अपने आलोचकीय कौशल का प्रकटीकरण किया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने सूर्यबाला की कहानियों की शिनाख्त की है। विजय शर्मा ने नासिरा शर्मा और डॉ. लक्ष्मी पांडेय ने मेहरुन्निसा परवेज की कहानियों के मर्म को पूरी गंभीरता से अभिव्यक्त किया है। वरिष्ठ कथाकार दीपक शर्मा की कहानियों की अन्तर्आत्मा में पैठकर मधु बी. जोशी का एक उम्दा लेख पुस्तक में संकलित है।
स्मृति आदित्य ने निर्मला भुराड़िया की कहानियों की सूक्ष्म पड़ताल की है। स्मृति आदित्य ने एक आलोचक के रूप में निर्मला भुराड़िया की कहानियों में अन्तर्निहित जीवन सत्यों की खोज के साथ पात्रों के मनोजगत की भी गहरी पड़ताल की है।

प्रतिष्ठित कवि आनंद कुमार सिंह गंभीर पाठक होने के साथ तलस्पर्शी मेघा सम्पन्न आलोचक भी हैं जिन्होंने तीन दशकों से लगातार सृजन कर रही उर्मिला शिरीष की कहानियों की पृष्ठभूमि, पात्रों की मनोभूमि की गहन पड़ताल करते हुए उन्हें निर्वासित यथार्थ की कहानियां माना है। हिन्दी के वरिष्ठ और समर्थ आलोचक ओम निश्चल ने दूर्वा सहाय की कहानियों के कथ्य और शिल्प के प्रत्येक आयाम पर अत्यंत गहन विश्लेषणात्मक दृष्टि से लिखा है उनका यह लेख दूर्वा सहाय की कहानियों की मुकम्मल पड़ताल करता है।

रजनी गुप्त की कहानियों पर हिन्दी के युवा और समर्थ आलोचक शशिभूषण मिश्र ने एकाग्र सघनता और पूरी पारदर्शिता तथा ताजगी युक्त स्वअर्जित सशक्त भाषा में समग्रता से लिखा है।

पंकज सुबीर ने किरण सिंह और आकांक्षा पारे काशिव की कहानियों पर तथा हिन्दी के शंभु गुप्त ने सारा राय और गीतांजलिश्री की कहानियों के मर्म को सामने रख दिया है। प्रसिद्ध आलोचक अरुण होता ने पंखुरी सिन्हा की कहानियों को 'वैश्विक सोच और संवेदना की कहानी' कहा है। मृत्यंजय पांडेय, शंभुनाथ मिश्र, नीरज खरे, आदित्य विक्रम सिंह, भरत प्रसाद, सुधांशु गुप्ता, ज्योतिष जोशी, संजय कृष्ण, सौरभ शेखर जैसे अनेक आलोचकों ने महिला कथाकारों पर लिखकर हिन्दी आलोचना को सार्थक दिशा दी है।
'लमही' के संपादक विजयराय ने 'समकालीन हिन्दी कहानी का स्त्री पक्ष' पुस्तक संपादित करके स्त्री कथा लेखिकाओं के लगभग साठ वर्षों के कथासृजन को इस आलोचनात्मक पुस्तक में सहेज कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है ।

यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। चन्द्रकांता, सुधा अरोड़ा, नमिता सिंह, शीला रोहेकर, सुमित सक्सेना लाल, मैत्रयी पुष्पा, मधु कांकरिया, रोहिणी अग्रवाल, आशा प्रभात, सुषमा मुनीन्द्र, अलका सरावगी लवलीन, मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, महुआ माजी, जयश्री राय, जया जादवानी, वंदना शुक्ल, अल्पना मिश्र, नीलाक्षी सिंह, प्रत्यक्षा, कविता, ज्योति चावला, गीताश्री, योगिता यादव, शर्मिला जालान, प्रज्ञा पांडेय, दिव्या शुक्ल, दया दीक्षित, अंजलि काजल, भूमिका द्विवेदी, इंदिरा दांगी और सोनी पांडेय समेत कुल तिरेपन महिला कथाकारों की सृजनधर्मिता का मूल्यांकन करने वाले आलोचनात्मक लेखों को पुस्तक में समाहित किया गया है।

हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों से लेकर युवा आलोचकों ने अपनी आलोचकीय प्रतिभा का परिचय देकर ये लेख लिखे हैं। विजयराय जी की एक खास बात यह है कि संपादक के रूप में उन्होंने जिस तरह से अनेक कथा लेखिकाओं को लमही में प्रकाशित करके उन्हें एक मंच प्रदान किया तथा उनका आत्मविश्वास बढ़ाया उसी तरह महिला आलोचकों की भी एक पीढ़ी तैयार की है।

'समकालीन कहानी का स्त्री पक्ष' में अनेक स्त्री आलोचकों ने समकालीन कहानी के स्त्री पक्ष को कई कोणों से देखा-परखा है। स्त्री की समस्याओं के साथ उसकी आकांक्षाओं और भावनाओं को तिरेपन कथा लेखिकाओं ने अपने साहित्य में वाणी दी है। भारतीय समाज में अलग-अलग वर्गों की और आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर और आर्थिक रूप से सक्षम स्त्रियां भी किस तरह अनेक समस्याओं से जूझ रही हैं और अपने अस्तित्व तथा अस्मिता को तलाशने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

'समकालीन हिन्दी कहानी का स्त्री-पक्ष' स्त्री के सृजन के माध्यम से तमाम प्रश्नों का उत्तर देती एक आलोचनात्मक पुस्तक है। भूमंडलीकरण के कारण आज स्त्रियां घर की चारदीवारी से निकलकर बाहर आई हैं लेकिन यहां भी बाजारवाद ने कुछ स्त्रियों को बहला फुसलाकर स्वतंत्रता के नाम पर उनके छलावा ही किया है। स्त्री कहानीकारों की लगभग तीन-चार पीढ़ियों का लेखन यह दर्शाता है कि स्त्री ने अपनी संवेदना और बौद्धिकता के साथ परिवर्तित समय और समाज की चुनौतियों को पहचाना है। निःसंदेह समकालीन हिन्दी कहानी का 'स्त्री पक्ष' लगभग छह दशकों के महिला सृजन का सार्थक दस्तावेज है।
'समकालीन हिन्दी कहानी का स्त्री पक्ष'
संपादक-विजय राय
अनन्य प्रकाशन नई दिल्ली
सन्‌ - 2021
मूल्य : 995 रुपए
पृष्ठ-471

समीक्षक : प्रो. स्मृति शुक्ल
ए-16, पंचशील नगर
नर्मदा रोड, जबलपुर-482001



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