जो अपने रंग में रंग ले वही दोस्ती

प्रसंगवश

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दक्षिण अफ्रीका के संस्थापक वास्तुविद् हरमन कालेनबेक (1871-1945) और गाँधीजी मित्रता की मिसाल बन गए। यह 'फ्रैंडशिप डे' से उपजी बाहरी दोस्ती नहीं थी बल्कि पहली मुलाकात में ही अपने भीतर के रंग में रंग लेने वाली दोस्ती थी।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के नागरिक अधिकारों को लेकर चल रहे संघर्ष को एक नैतिक रूप से सशक्त नेता की जरूरत थी और गाँधी में उन्हें वे तमाम संभावनाएँ दिखीं और गाँधी उनके नेता बने। गाँधी के इस संघर्ष के कानूनी रक्षक उनके वकील श्री खान थे और उनकेदोस्त थे हरमन कालेनबेक। बस! गाँधी और हरमन की मित्रता का यह अद्भुत संयोग कराने वाले श्री खान ही थे।

हरमन कालेनबेक गाँधीजी की सादगी, जीवटता, सत्य के प्रति आग्रह पर फिदा थे। गाँधी से संपर्क में आने के बाद हरमन पूरी तरह बदल गए। मांसाहार त्यागकर शाकाहारी बन गए। नौकर-चाकरों की छुट्टी कर दी। अपने जूतों की पॉलिश से लेकर अपना हर काम खुद करने लगे।सादगी तक पहुँचने में कुछ देर लगी लेकिन वह भी अंततः अपना ली। हरमन का मासिक जेब खर्च 75 पौंड से 8 पौंड हो गया। वे महसूस करने लगे कि पहले से ज्यादा चरित्रवान, आत्मिक रूप से बलवान, मानसिक रूप से ज्यादा पुष्ट हो गए हैं। उनका झक्की स्वभाव तो चला ही गया।
दक्षिण अफ्रीका के संस्थापक वास्तुविद् हरमन कालेनबेक (1871-1945) और गाँधीजी मित्रता की मिसाल बन गए। यह 'फ्रैंडशिप डे' से उपजी बाहरी दोस्ती नहीं थी बल्कि पहली मुलाकात में ही अपने भीतर के रंग में रंग लेने वाली दोस्ती थी।


1908 में कालेनबेक ने एक कार खरीदी और गाँधीजी को चकित करने के लिए वे जोहानसबर्ग जेल गए। गाँधी जेल से छूटे थे और नई कार में बैठकर घर आए। रास्तेभर कुछ नहीं बोले। हरमन ने कहा- नई कार के बारे में, गाँधी ने सिर्फ यही कहा कि यह 'अनावश्यक खर्चा' है। हरमन ने कहा- मेरी कार सालभर बगैर उपयोग के गैरेज में पड़ी रही, फिर मैंने उसे बेच दिया।

एक दिन गाँधीजी को जनरल स्मट्स से साक्षात्कार के लिए जाना था। वे तैयारी में व्यस्त थे और साथ ही हरमन को कई छोटी-छोटी घरेलू लापरवाहियों के लिए सीख भी दे रहे थे। हरमन ने कहा- आप बड़े काम से जाने वाले हैं, घरेलू छोटे कामों में अपना समय क्यों बिगाड़रहे हैं, यह सब तो हो जाएगा।

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- डॉ. राकेश त्रिवेद
हरमन कहते हैं- गाँधी में बदलाव की कतई गुंजाइश नहीं थी, बदलना सिर्फ हमें ही था। उनके रंग में रंग जाओ बस। रंग पक्के थे, लग जाएँ तो मिटें नहीं। कई योरपीय दोस्त गाँधी के संपर्क में आकर उनके ही रंग में रंग गए। 1945 में हरमन चल बसे। गाँधी ने जेल से हरमन कालेनबेक को कई पत्र लिखे। गाँधीजी हरमन के प्रशंसक थे और अंतरंग मित्र भी। हरमन की भतीजी इशा सरीद ने अपनी पुस्तक 'हरमन कालेनबेक, महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीकी दोस्त' नामक पुस्तक में हरमन और गाँधीजी की मित्रता को मित्रता की एक अद्भुत मिसाल कहाहै। इंदौर के प्रोफेसर महेंद्र नागर को इसराइल में इशा ने यह पुस्तक भेंट की थी।



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