ग्रहण वेबसीरिज रिव्यू : नफरत की बंजर भूमि पर खिली प्रेम की कोंपल

समय ताम्रकर| Last Updated: शनिवार, 26 जून 2021 (18:15 IST)
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद भारत के कई शहरों में दंगे भड़क गए थे। सिखों को निशाना बनाया गया था। उनकी दुकानों को लूट कर आग के हवाले कर दिया गया और कई लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के शिकार हुए कई लोगों के घाव अभी भी हरे हैं क्योंकि उन्हें न्याय नहीं मिला। दोषी खुली हवा में सांस लेकर मुंह चिढ़ा रहे हैं। इस कलंकित घटना को लेकर नामक वेबसीरिज का निर्माण किया गया है।

ग्रहण की कहानी दो अलग-अलग वर्षों में चलती है। वर्ष 1984 के समय में दिखाया गया है कि किस तरह सिखों के प्रति गैर सिखों में नफरत पैदा हो रही थी। इस आग को कुछ स्वार्थी नेता हवा दे रहे थे जिसके बूते पर वे फायदा ले सकें। बोकारो नामक शहर में युवाओं को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़का कर हथियार थमा दिए गए और उन्होंने मारकाट मचा दी। पुलिस ने आंखें मूंद ली।

वर्ष 2016 में इस घटना की फिर एक बार नए सिरे से जांच होती है। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि दो‍षी पकड़े जाएं। इस केस की जिम्मेदारी अमृता नामक पुलिस ऑफिसर को सौंपी जाती है जो रांची से बोकारो जाकर तहकीकात करती है। जो कुछ हुआ है उसे जान कर दहल जाती है। इस जांच की आंच उसके घर तक पहुंच जाती है क्योंकि सामने आया सच इस बात की ओर इशारा करता है कि बोकारो में हुए दंगे में उसके पिता भी शामिल थे। जैसे-जैसे वह मामले की तह में जाती है नए-नए राज उजागर होते हैं।

1984 में चल रही कहानी बताती है कि दंगे प्रायोजित थे। क्यों हुए? कैसे हुए? किस तरह कई सरकार आई और गई, लेकिन पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। ये सारी बातें आपके सामने प्रस्तुत करती हैं। साथ ही इस घटना के इर्दगिर्द जो ड्रामा रचा गया है वो कमाल का है।

सत्य दुबे के उपन्यास ‘चौरासी’ से यह सीरिज प्रेरित है। जो इस सीरिज का विरोध कर रहे हैं उनके सुर इसे देखने के बाद बदल जाएंगे क्योंकि कुछ भी विवादास्पद इसमें नहीं है बल्कि घटना को जस का तस दिखाने की कोशिश की गई है।

ग्रहण की कहानी बेहद ठोस है और आपको हिलने का मौका नहीं देती। प्यार, इमोशन, नफरत का जो ताना-बाना बुना गया है वो हर दर्शक को कहीं ना कहीं प्रभावित करता है। नफरत की बंजर भूमि पर प्रेम की खिली कोंपल एक अलग ही माहौल बनाती है। इस कोंपल को कुचले जाने का डर भी सताता रहता है।


अमृता के पिता ऋषि रंजन की युवा अवस्था की प्रेम कहानी मासूमियत से ओत-प्रोत है। एक साधारण सी प्रेम कहानी को इतने बढ़िया तरीके से पेश किया गया है कि दोनों प्रेमियों की भावनाओं से दर्शक सीधे जुड़ जाते हैं। इस प्रेम कहानी के बीच-बीच में दंगों को लेकर रची जा रही है साजिश और जांच के दृश्यों को पिरोया गया है। यह बुनावट इतने बढ़िया तरीके से की गई है कि कहीं कोई कन्फ्यूजन नहीं होता जबकि युवा अवस्था और वृद्धावस्था की भूमिकाएं अलग-अलग कलाकारों ने अदा की है।

ग्रहण की कहानी आठ एपिसोड में बंटी है और हर एपिसोड 45 मिनट या इससे ऊपर है। शुरुआती 5 एपिसोड अपनी गति से चलते हैं, लेकिन आखिरी तीन एपिसोड में कहानी को भगाया गया है। थोड़ी जल्दबाजी नजर आती है। यदि एक एपिसोड और बढ़ा लिया जाता तो कोई हर्ज नहीं था क्योंकि यह जल्दबाजी थोड़ी अखरती है। कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते। ऋषि और उसके दोस्त का अचानक मनमुटाव होना हजम नहीं होता, लेकिन ये छोटी कमियां हैं और इग्नोर की जा सकती हैं।

निर्देशक का काम बेहतरीन है। उनका निर्देशन सधा हुआ नजर आता है। कभी भी सीरिज से उनकी पकड़ नहीं छूटती। समय के अंतर को उन्होंने अच्छे से दिखाया है। ट्रांजिस्टर, दीवारों पर लिखे विज्ञापन, सिनेमाघर, फिल्म, चरित्रों के कास्ट्यूम्स और हेअर स्टाइल, घरों के फर्नीचर के जरिये उन्होंने 1984 को पकड़ा है। पीड़ितों का दर्द, नेताओं के स्वार्थ, व्यवस्था का निकम्मापन उभर कर आता है। साथ ही ऋषि, मनु और अमृता की कहानियां दर्शाती हैं कि इन दंगों का लोगों की जिंदगी पर कितना गहरा असर हुआ है।

ग्रहण में पवन मल्होत्रा को छोड़ दिया जाए तो कोई नामी या परिचित चेहरा नजर नहीं आता, लेकिन कुछ ही मिनटों में ये सभी अपने उम्दा अभिनय के बूते पर जाने-पहचाने लगते हैं। अंशुमन पुष्कर, वामिका गब्बी और ज़ोया हुसैन की अदाकारी दमदार है। इनके करियर के लिए ‘ग्रहण’ सुनहरा मोड़ साबित होगा।

ग्रहण के आखिर में दर्शाया गया है कि इन दंगों के पीछे छिपे कारणों पर अभी भी कई परतें जमा हैं, इसे और कुरेदने की जरूरत है, लेकिन राजनीति अभी भी जारी है।


निर्देशक : रंजन चंदेल
कलाकार : अंशुमन पुष्कर, वामिका गब्बी, ज़ोया हुसैन, पवन मल्होत्रा
* सीजन : 1 * एपिसोड : 8
* डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर उपलब्ध
रेटिंग : 3:5/5



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