सबको चाहिए आइटम नंबर

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आजकल युवाओं की दिलों की धड़कन बन चुकी हैं। बने भी क्यों न उन पर फिल्माया गया 'चिकनी चमेली चुपके अकेली'... ने सबका दिल जीत लिया है। चिकनी चमेली अकेला ऐसा आइटम नंबर नहीं है जो युवाओं बल्कि सभी आयु वर्ग को मोहित करता है बल्कि आज आइटम नंबर ने फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है।


अगर हम कहें कि अब निर्माता-निर्देशक बिना आइटम नंबर के फिल्म की कल्पना ही नहीं कर रहे तो, तो गलत न होगा। इस पर दिलचस्प बात यह है कि आइटम नंबर पर वे अच्छा खासा खर्च भी कर रहे हैं। गौरतलब है कि 'चिकनी चमेली' पर पूरे 3 करोड़ रुपए लागत आई थी।

बहरहाल, आइटम नंबर हिट हों या फ्लॉप, यह तय करना जनता के हाथ में है। सवाल यह उठता है कि आखिर आइटम नंबर इतने लोकप्रिय क्यों हो रहे हैं? क्या इसकी असली वजह गाना है, डांसर के ठुमके हैं या फिर यह सब फिल्मांकन का कमाल है? जाहिर है अगर गाना कर्णप्रिय होता तो आइटम नंबर महज कुछ दिनों के मेहमान न होते।
'दबंग' के 'मुन्नी बदनाम हुई'... गाने ने भी अपने समय में खूब धूम मचाई, लेकिन जब 'शीला की जवानी'... ने ऑनस्क्रीन अपना लजवा बिखेरा तब लगने लगा जैसे मुन्नी फिकी होती जा रही है। यही हश्र तमाम आइटम नंबरों का है। कब आते हैं, कब जाते हैं, ठीक-ठीक इसका पता ही नहीं चलता।

अगर हम आइटम नंबरों को जरा गौर से देखें तो पाएँगे कि ये कुछ कैबरे की माफिक लगते हैं। लेकिन असली बात यह है कि कैबरे की तरह न इनमें भव्यता है और न ही सौम्यता। 60 और 70 के दशक में हुए कैबरे यकायक किसी को भी याद आते हैं तो पाँव थिरकने लगते हैं, मन मस्ती से झूम उठता है। यही नहीं, कैबरे की मल्लिका हेलन की छवि आज भी हमारे जेहन में ज्यों की त्यों बरकरार है।
अगर आज के आइटम नंबर की बात करें तो न तो कर्णप्रिय संगीत इनमें शामिल हैं न अच्छा डांस इसमें नजर आता है। यहाँ सवाल कौंधता है कि आखिर दर्शक किस चीज के दीवाने हैं?

दरअसल आइटम नंबर के हिट होने की एक बड़ी वजह फिल्मांकन को माना जा सकता है। कोरियोग्राफर वैभवी मर्चेंट के अनुसार, 'कैबरे और आइटम नंबर दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। कैबरे गाने का संपूर्ण पैकेज हुआ करता था। भव्य गाने से लेकर डांस की लोच लचक तक में बारीकी नजर आती थी। लेकिन इन दिनों किस्सा उल्टा है। आइटम नंबरों की जान फिल्मांकन में बसी है।' आज आइटम नंबर इस हद तक लोकप्रियता हासिल कर चुका है कि तमाम निर्माता-निर्देशक इस पर दाँव लगाने को तैयार रहते हैं।
तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि अब दर्शक मनोरंजन का दीवाना है। यही वजह है कि जैसी अभिनेत्रियों के भी आइटम नंबर 'नाम जलेबी बाई...' या फिर 'रजिया गुंडों में फँस गई...' दर्शकों के मन में अपनी खास जगह बना पाने में सक्षम है।
कुछ साल पहले तक आइटम नंबर करने के लिए मलाइका अरोड़ा खान और राखी सावंत जैसी आइटम को ही साइन किया जाता था, लेकिन आज शायद ही कोई बड़ी हीरोइन हो जिसने आइटम नंबर करने से इंकार कर दिया हो।



विशेषज्ञ यह कहने से नहीं चूकते कि आइटम नंबर चंद दिनों के मेहमान होते हैं। एक समय के बाद दर्शक इन्हें न देखना पसंद करते हैं और न ही सुनना। इन पर दाँव इसलिए खेला जा रहा है कि तमाम आइटम नंबर कुछ ही देर के लिए सही लेकिन हिट होते हैं और अपनी लागत वसूल कर लेते हैं।
हम यह तो नहीं बता सकते कि आइटम नंबरों का भविष्य कितना बेहतरीन है लेकिन यह तय है कि इन दिनों आइटम नंबर की उम्र बहुत छोटी है। इसकी वजह कई है। लेकिन वजहों को गिनाने से बेहतर है कि आइटम नंबरों में थोड़ी मधुरता और सौम्यता को भी प्राथमिकता दी जाए। इस बात को भी हम नकार नहीं सकते कि इन दिनों आइटम नंबर सबसे ज्यादा कमाऊ प्रोडक्ट के रूप में उभर रहा है जिसे निर्माता-निर्देशक खूब भुना रहे हैं।

- डीजेनंदन




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