भाजपा उम्मीदवार ने कहा- मुझे बीफ खाने से कोई नहीं रोक सकता

किशनगंज| अनिल जैन| पुनः संशोधित रविवार, 1 नवंबर 2015 (16:38 IST)
हमें फॉलो करें
किशनगंज। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जो 2 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं उनमें से एक हैं अब्दुल रहमान। सूबे के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज के कोचाधामन विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अब्दुल रहमान सीमांचल इलाके में भाजपा के इकलौते मुस्लिम उम्मीदवार हैं। यहां 5 नवंबर को मतदान होना है। 
 
किशनगंज में 70 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। इनमें से ज्यादातर मानना है कि रहमान का भाजपाई झंडा थामना ईशनिंदा या कुफ्र जैसा है, खासकर तब जब असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी यह प्रचार कर रही है कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा भाजपा को फायदा पहुंचाएगा।
 
रहमान कहते है कि मैं जहां भी जाता हूं, लोग मुझे रुला देते हैं। वे मेरी कॉलर पकड़कर मुझ पर सवालों की बौछार कर देते हैं। यहां तक कि मेरे वालिद भी कई सवाल पूछते हैं। मेरा भाजपा में जाना बहुत बड़ा और चुनौतियों से भरा फैसला था। 
 
चौक पर चाय की दुकान पर जमा ढेर लोगों से घिरे रहमान कहते हैं कि पहले लोग कुछ सुनने को तैयार नहीं होते थे, मगर अब मुझे लगता है कि वे मेरी बातों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। मैं पिछले साल भाजपा में जाने के बाद से ही लगातार अपने इस फैसले की वजह बताता रहा हूं। मैं पक्का मुसलमान हूं। भाजपा या नरेन्द्र मोदी से नहीं डरता। मैं नीतीश कुमार या लालू यादव से भी नहीं डरता। मैं डरता हूं तो सिर्फ अल्लाह से। मैं विकास चाहता हूं, खासकर किशनगंज के मुस्लिम बेल्ट में। 
 
कोचाधामन में रहमान का अपने विरोधियों से कड़ा मुकाबला है। उनके खिलाफ महागठबंधन की ओर से मुजाहिद आलम और ओवैसी की एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तर उल ईमान खड़े हैं। ये दोनों बहुसंख्यक सुरजापुरी मुसलमान हैं। रहमान शेरशाहबादी मुसलमान हैं। यहां मुसलमानों में शेरशाहबादियों की आबादी 20 फीसदी है। कोचाधामन में सुरजापुरी और शेरशाहबादी मुसलमान आपस में बंटे हुए हैं। शायद यही वजह है कि भाजपा ने रहमान को उम्मीदवार बनाया है। 
 
उसे उम्मीद है कि अख्तर उल ईमान महागठबंधन का वोट काटेंगे। वह बोलने में माहिर है और इलाके में उनकी लोकप्रियता भी है। कुछ खास वर्ग में ओवैसी की अपील का असर भी उनके हक में जा सकता है।
 
भाजपा को शेरशाहबादियों और हिन्दू अल्पसंख्यकों से उम्मीदें हैं। हालांकि जमीनी हकीकत इतनी सुलझी हुई नहीं दिखती। 2010 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर जीतने वाले ईमान कड़ी टक्कर देने की स्थिति में हैं। वे अपने भाषणों में कहते हैं कि अब्दुल रहमान हमारा भाई है। हमें नुकसान पहुंचाने के लिए दुश्मनों ने उसे अगवा कर लिया है। हमें उसे बचाने की जरूरत है। 
 
भाजपा में अपने शामिल होने की वजह बताते हुए रहमान कहते हैं कि मुसलमानों से सालों तक धोखा करने वालों के खिलाफ मैंने बगावत की है। अगर मैंने नहीं की होती तो मेरे जैसा कोई दूसरा ऐसे लोगों को चुनौती देने के लिए आगे आता। ये लोग लगातार चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन लोगों के लिए इन्होंने कुछ नहीं किया। 
 
उन्होंने सबसे बड़ा कारण बताया कि किशनगंज की जनता ने हमेशा भाजपा के खिलाफ वोट दिया है और बदले में लोगों को झूठी उम्मीदें मिलीं कि मुसलमानों का भला होगा। लेकिन जब सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमेटी की रिपोर्टें सामने आईं, तब हमें मालूम हुआ कि मुसलमानों की हालत तो दलितों और महादलितों से भी बदतर है। मेरा सवाल है कि जब बिहार में भाजपा कभी हुकूमत में नहीं रही तो फिर यहां के मुसलमानों की हालत ऐसी क्यों है? 
 
5 बच्चों के पिता रहमान राजनीति में आने से पहले कपड़े की दुकान चलाते थे। उन्होंने बताया कि अब मैं दीनी (धार्मिक) पब्लिक स्कूल चलाता हूं। भाजपा में आने से पहले मैं कांग्रेस का ब्लॉक प्रमुख था। कांग्रेस में रहते हुए कुछ करने का मौका मिलना मुमकिन नहीं था।
 
विवाद पर रहमान ने कहा कि मेरा मजहब मुझे इसे खाने की इजाजत देता है। मैं इसे खाता हूं और खाता रहूंगा। मुझे कोई नहीं रोक सकता। बिहार चुनाव होते ही बीफ विवाद भी खत्म हो जाएगा। सब सियासत का खेल है। 



और भी पढ़ें :