अभी तो बिहार के वोटरों को सलाम कीजिए

उमेश चतुर्वेदी|
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वैशाली के गणराज्य के चलते आदि लोकतंत्र की धरती कही जाने वाले बिहार ने सिर्फ डेढ़ साल में ही नया इतिहास रच दिया है। डेढ़ साल पहले जो बिहार की राजनीति में किनारे नजर आ रहे थे, वह फिर से वापसी कर चुके हैं। लेकिन उनसे कहीं ज्यादा ताकतवर और जबर्दस्त वापसी की है।  बेशक, उनके 1990 से लेकर 1995 तक के शासन को बिहार के सबसे बुरे दौर के तौर पर याद किया जाता है, जिसे पानी पी-पीकर कोसते हुए ठीक बीस साल पहले नीतीश कुमार ने अलग राह अख्तियार की थी, उसी नीतीश कुमार के साथ आते ही लालू यादव ने इतिहास रच दिया है।
 
उनकी पार्टी बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की धरती बिहार पर अपनी जीत का सिलसिला बनाए रखने की भाजपा की उम्मीद टूट गई है। लोकसभा चुनावों में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का जो तिलस्म बना था, वह लगातार दूसरी बार टूटा है। दिल्ली की हार के बाद बीजेपी में दिल्ली को नगर निगम जैसा राज्य बताकर अपनी हार को झुठलाने की कोशिश हुई। लेकिन बिहार को अब पार्टी छोटा राज्य नहीं बता सकती और यह भी सही है कि वह हार को अब बहानेबाजी से नहीं टाल सकेगी।
 
बिहार में लालू की वापसी में संघ प्रमुख मोहन राव भागवत के आरक्षण पर दिए बयान को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है। जिस समय बिहार में चुनाव चल रहे थे, उस समय बीफ विवाद पर बीजेपी और संघ परिवार के बड़बोले नेताओं ने जमकर बयानबाजी की। बिहार के चुनाव नतीजों ने साबित किया है कि अब ऐसी बयानबाजियां नहीं चलने वालीं।
 
बिहार के वोटरों ने अपने मताधिकार के साथ संकेत दे दिया है कि विकास की बात के साथ बिला वजह की बयानबाजी वह बर्दाश्त नहीं करेगा। याद कीजिए, ठीक बिहार चुनावों के दौरान ही एक खास खेमे में जमकर असहिष्णुता के मसले को उछाला, में इसका भी एक हद तक असर पड़ता नजर आ रहा है।   
भागवत के बयान के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने वोटरों की मंशा के मद्देनजर आरक्षण के समर्थन में बयान दिए थे। अब चूंकि भारतीय जनता पार्टी हार गई है, इसलिए आरक्षण पर भागवत के बयान के खिलाफ जाने की अपनी रणनीति पर उसके बने रहने का तुक नहीं है। इसलिए तय मानिए कि आरक्षण पर समीक्षा का दौर चलेगा और देर-सवेर केंद्र सरकार को इस मसले पर भागवत की राय से तालमेल बैठाना पड़ सकता है।
 
बीजेपी हार की वजहों में एक बड़ी वजह टिकटों का गलत बंटवारा भी रहा। जिस पर आरा से पार्टी के सांसद आरके सिंह ने सवाल उठाया। कभी बिहार में बीजेपी का चेहरा रहे शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पूरे चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी से नाराज बने रहे। इसलिए हार में उनकी भी भूमिका मानी ही जानी चाहिए। 
 
बिहार में बीजेपी की हार से उसका राज्यसभा में बहुमत पाने का सपना कुछ और दूर चला गया है। इससे जिन आर्थिक सुधारों की तरफ केंद्र सरकार आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, उसे झटका लग सकता है। पहले प्याज, फिर दाल और आखिर में तेल की महंगाई ने जिस तरह जनता को त्रस्त किया, उसकी तरफ केंद्र सरकार को गहराई से ध्यान देना होगा। बीजेपी को यह भी देखना होगा कि जिस बिहार की 29 फीसदी जनता ने नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनावों के दौरान समर्थन दिया, उस जनता के वोट बैंक में विधानसभा में करीब चार फीसदी की कमी क्यों आ गई। बीजेपी और उसके रणनीतिकारों को इसकी तरफ कही ज्यादा ध्यान देना होगा।
 
बिहार में बीजेपी की हार से एक बात तय है कि लोकसभा चुनावों से पस्त पड़े विपक्ष को गोलबंद होकर उत्साहित होने का मौका मिलेगा। इससे मोदी सरकार की नाक में दम हो सकता है। इसका असर संसद के शीतकालीन सत्र में भी नजर आएगा। हो सकता है कि तब विपक्ष एक बार फिर सत्र को न चलने दे और सरकार को बैकफुट पर आने के लिए मजबूर कर दे। 
 
लेकिन क्या इस जीत के बाद नीतीश की राह आसान होगी। चुनाव पूर्व गठबंधन के दावे और वादे के मुताबिक नीतीश की अगुआई में सरकार जरूर बनेगी। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि लालू यादव की पार्टी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है और सबसे बड़ा दल कितने दिनों तक दूसरे नंबर की भूमिका में रह पाएगा? इसलिए नीतीश कुमार के लिए आगे की चुनौती महत्वपूर्ण होनी ही है। यह बात और है कि शुरुआत में ऐसा नजर नहीं आएगा। क्योंकि जनादेश का सम्मान करने का दिखावा करने की हमारी राजनीति जैसी आदी रही है, वैसा ही बिहार में होगा। लेकिन बाद में जनता दल यू और राष्ट्रीय जनता दल में खींचतान होने की आशंका ज्यादा है।
 
जीत के मौके पर ऐसी आशंकाएं जताने की भारतीय परंपरा नहीं रही है। इसलिए इस पर ज्यादा गंभीर चर्चा नहीं ही करनी चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी के विकास मॉडल पर अपने जिस विकास मॉडल के जरिए नीतीश ने विजयश्री हासिल की है, उस पर वे आगे बढ़ेंगे। बिहार की जनता की उम्मीदों पर राष्ट्रीय जनता दल भी खरा उतरेगा। फिलहाल इसी उम्मीद में बिहार के वोटरों को कीजिए। (लेखक टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार हैं।)



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