कृषि क़ानून: पहले क्या कहते रहे मोदी, क्या हैं प्रावधान, क्यों हुआ विरोध?

BBC Hindi| Last Updated: शुक्रवार, 19 नवंबर 2021 (14:24 IST)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन तीन विवादित कृषि क़ानूनों को लेने की घोषणा की है जिनका किसान लगभग एक साल से कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत देश के कई और हिस्सों से आए किसान कृषि से जुड़े तीन क़ानूनों को लेकर दिल्ली की यूपी-हरियाणा से लगी सीमाओं पर डटकर विरोध कर रहे हैं।
 
इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया और विपक्ष इसे लेकर लगातार सरकार पर निशाना साधती रही। मगर जिन क़ानूनों को लेकर ये विरोध हो रहा है उनमें आख़िर क्या है? आइए समझते हैं क्या हैं वो क़ानून जिन्हें अब वापस ले लिया गया है, और क्यों हो रहा है इनका विरोध? और पहले प्रधानमंत्री मोदी इन्हें लेकर क्या कहते रहे थे?
 
कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्द्धन और सरलीकरण) क़ानून, 2020
 
इस क़ानून में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रावधान है जहां किसानों और व्यापारियों को राज्य की एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) की रजिस्टर्ड मंडियों से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी। इसमें किसानों की फ़सल को एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना किसी रोक-टोक के बेचने को बढ़ावा दिया गया है।
 
बिल में मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टेशन पर ख़र्च कम करने की बात कही गई है ताकि किसानों को अच्छा दाम मिल सके।
इसमें इलेक्ट्रोनिक व्यापार के लिए एक सुविधाजनक ढांचा मुहैया कराने की भी बात कही गई है।
 
विपक्ष का तर्क
 
राज्य को राजस्व का नुक़सान होगा, क्योंकि अगर किसान एपीएमसी मंडियों के बाहर फ़सल बेचेंगे तो वे 'मंडी फ़ीस' नहीं वसूल पाएंगे। कृषि व्यापार अगर मंडियों के बाहर चला गया तो 'कमीशन एजेंटों' का क्या होगा? इसके बाद धीरे-धीरे एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के ज़रिए फ़सल ख़रीद बंद कर दी जाएगी। मंडियों में व्यापार बंद होने के बाद मंडी ढांचे के तरह बनी ई-नेम जैसी इलेक्ट्रोनिक व्यापार प्रणाली का आख़िर क्या होगा?
 
कृषक (सशक्‍तीकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार क़ानून, 2020
 
इस क़ानून में कृषि क़रारों (कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग) को उल्लिखित किया गया है। इसमें कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिग के लिए एक राष्ट्रीय फ्ऱेमवर्क बनाने का प्रावधान किया गया है।
 
इस क़ानून के तहत किसान कृषि व्यापार करने वाली फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक व्यापारी, निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ कॉन्ट्रेक्ट करके पहले से तय एक दाम पर भविष्य में अपनी फ़सल बेच सकते हैं।
 
5 हैक्टेयर से कम ज़मीन वाले छोटे किसान कॉन्ट्रेक्ट से लाभ कमा पाएंगे।
 
बाज़ार की अनिश्चितता के ख़तरे को किसान की जगह कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग करवाने वाले प्रायोजकों पर डाला गया है।
 
अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फ़सल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फ़सल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
 
इसके तहत किसान मध्यस्थ को दरकिनार कर पूरे दाम के लिए सीधे बाज़ार में जा सकता है।
 
किसी विवाद की सूरत में एक तय समय में एक तंत्र को स्थापित करने की भी बात कही गई है।
 
विपक्ष का तर्क
 
कॉन्ट्रेक्ट फ़ार्मिंग के दौरान किसान प्रायोजक से ख़रीद-फ़रोख़्त पर चर्चा करने के मामले में कमज़ोर होगा।
 
छोटे किसानों की भीड़ होने से शायद प्रायोजक उनसे सौदा करना पसंद न करे।
 
किसी विवाद की स्थिति में एक बड़ी निजी कंपनी, निर्यातक, थोक व्यापारी या प्रोसेसर जो प्रायोजक होगा उसे बढ़त होगी।
 
आवश्यक वस्तु (संशोधन) क़ानून 2020
 
इस क़ानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ और आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ़ युद्ध जैसी 'असाधारण परिस्थितियों' को छोड़कर अब जितना चाहे इनका भंडारण किया जा सकता है।
 
इस क़ानून से निजी सेक्टर का कृषि क्षेत्र में डर कम होगा, क्योंकि अब तक अत्यधिक क़ानूनी हस्तक्षेप के कारण निजी निवेशक आने से डरते थे।
 
कृषि इन्फ़्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ेगा, कोल्ड स्टोरेज और फ़ूड स्प्लाई चेन का आधुनिकीकरण होगा।
 
यह किसी सामान के मूल्य की स्थिरता लाने में किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को मदद करेगा।
 
प्रतिस्पर्धी बाज़ार का वातावरण बनेगा और किसी फ़सल के नुक़सान में कमी आएगी।

 
विपक्ष का तर्क
 
'असाधारण परिस्थितियों' में क़ीमतों में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा होगा जिसे बाद में नियंत्रित करना मुश्किल होगा।
 
बड़ी कंपनियों को किसी फ़सल को अधिक भंडार करने की क्षमता होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि फिर वे कंपनियां किसानों को दाम तय करने पर मजबूर करेंगी।
 
विरोध के और भी हैं कारण?
 
किसान संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून की वजह से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुक़सान किसानों को होगा।
 
कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा के मुताबिक़ किसानों की चिंता जायज़ है। बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'किसानों को अगर बाज़ार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वो बाहर क्यों जाते।'
 
उनका कहना है कि जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी नहीं मिलती, उन्हें वो कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं।
 
पंजाब में होने वाले गेहूं और चावल का सबसे बड़ा हिस्सा या तो पैदा ही एफ़सीआई द्वारा किया जाता है, या फिर एफ़सीआई उसे ख़रीदता है। साल 2019-2020 के दौरान रबी के मार्केटिंग सीज़न में, केंद्र द्वारा ख़रीदे गए क़रीब 341 लाख मीट्रिक टन गेहूं में से 130 लाख मीट्रिक टन गेहूं की आपूर्ति पंजाब ने की थी।
 
प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफ़सीआई अब राज्य की मंडियों से ख़रीद नहीं कर पाएगा, जिससे एजेंटों और आढ़तियों को क़रीब 2.5% के कमीशन का घाटा होगा। साथ ही राज्य भी अपना छह प्रतिशत कमीशन खो देगा, जो वो एजेंसी की ख़रीद पर लगाता आया है।
 
देवेंद्र कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा नुक़सान आने वाले समय में ये होगा कि धीरे-धीरे मंडियां ख़त्म होने लगेंगी।
 
प्रदर्शनकारी मानते हैं कि यह क़ानून जो किसानों को अपनी उपज खुले बाज़ार में बेचने की अनुमति देता है, वो क़रीब 20 लाख किसानों, ख़ासकर जाटों के लिए तो एक झटका है ही।
 
साथ ही मुख्य तौर पर शहरी कमीशन एजेंटों जिनकी संख्या 30 हज़ार बताई जाती है, उनके लिए और क़रीब तीन लाख मंडी मज़दूरों के साथ-साथ क़रीब 30 लाख भूमिहीन खेत मज़दूरों के लिए भी यह बड़ा झटका साबित होगा।
 
बाज़ार के लिए है यह क़ानून?
 
दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के प्रावधान पर देवेंद्र कहते हैं, '86 प्रतिशत छोटे किसान एक ज़िले से दूसरे ज़िले में नहीं जा पाते, किसी दूसरे राज्य में जाने का सवाल ही नहीं उठता। ये बाज़ार के लिए बना है, किसान के लिए नहीं।'
 
क़ानून के मुताबिक़ इससे किसान नई तकनीक से जुड़ पाएंगे, 5 एकड़ से कम ज़मीन वाले किसानों को कॉन्ट्रेक्टर्स से फ़ायदा मिलेगा।
 
हालांकि देवेंद्र कहते हैं कि इस प्रावधान से किसान 'अपनी ही ज़मीन पर मज़दूर हो जाएगा।'
 
आवश्यक वस्तु संशोधन क़ानून पर देवेंद्र कहते हैं कि इससे कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिल सकता है। वो कहते हैं, 'हमने जमाख़ोरी को वैधता दे दी है, इन चीज़ों पर अब कंट्रोल नहीं रहेगा।'
 
सरकार के साथी भी पीछे हटे
 
जब इन क़ानूनों से जुड़े विधेयक आए थे तब हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देकर अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के कड़े रुख़ का संकेत दिया था।
 
केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट किया था, 'मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया है। किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है।'
 
अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का कहना था कि उनकी पार्टी से इन अध्यादेशों को लेकर संपर्क नहीं किया गया, जबकि हरसिमरत कौर ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि 'पंजाब और हरियाणा के किसान इससे ख़ुश नहीं हैं।'
 
सरकार का क्या है तर्क?
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'आज़ादी के बाद किसानों को किसानी में एक नई आज़ादी' देने वाला क़ानून बताया था।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौक़ों पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते रहे कि राजनीतिक पार्टियां इन क़ानूनों को लेकर दुष्प्रचार कर रही हैं।
 
वो कहते रहे कि किसानों को एमएसपी का फ़ायदा नहीं मिलने की बात ग़लत है।
 
बिहार चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने कहा था, 'जो लोग दशकों तक देश में शासन करते रहें हैं, सत्ता में रहे हैं, देश पर राज किया है, वो लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रहे हैं।'
 
मोदी ने कहा था कि विधेयक में वही चीज़ें हैं जो देश में दशकों तक राज करने वालों ने अपने घोषणापत्र में लिखी थीं। मोदी ने कहा कि यहां 'विरोध करने के लिए विरोध' हो रहा है।
 
उन्होंने कहा बिचौलिए जो किसानों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा खा जाते थे, उनसे बचने के लिए ये विधेयक लाना ज़रूरी था। केंद्र सरकार के कई मंत्री इन क़ानूनों की प्रशंसा करते रहे हैं।
 
(ये लेख सबसे पहले 30 नवंबर 2020 को प्रकाशित किया गया था।)

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