उत्तर प्रदेश चुनाव: पूर्वांचल में आख़िर क्या है जो पीएम मोदी ने केवल डेढ़ महीने में किए 6 दौरे

BBC Hindi| पुनः संशोधित मंगलवार, 14 दिसंबर 2021 (08:39 IST)
अनंत झणाणे, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के लिए दो दिनों का वक़्त निकाला। पिछले दो महीनों में प्रधानमंत्री का (पूर्वी उत्तर प्रदेश) का यह छठा दौरा है।
 
बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदुओं की आस्था का एक बड़ा केंद्र रहा है। उस नज़रिए से कॉरिडोर के शिलान्यास और लोकार्पण दोनों ही भाजपा के शासनकाल में होने को योगी सरकार एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है।
 
हालांकि प्रधानमंत्री जिस तरह से बार-बार पूर्वांचल के दौरे कर रहे हैं, वो इस इलाक़े की लगातार बढ़ती राजनीतिक अहमियत को दर्शाता है। वैसे प्रदेश के चार मुख्य राजनीतिक इलाक़ों (पूर्वांचल के अलावा बुंदेलखंड, अवध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में सीटों के लिहाज से पूर्वांचल काफ़ी अहम है।
 
पीएम मोदी के पूर्वांचल के ताबड़तोड़ 6 दौरे
 
पिछले दो महीनों में बीजेपी ने पूर्वांचल में पूरी प्रशासनिक और राजनीतिक ताक़त झोंक दी है। 2022 के विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लगने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
 
इस बीच प्रदेश बीजेपी अपनी तमाम बड़ी परियोजनाओं का लोकार्पण ख़ुद पीएम नरेंद्र मोदी से करवा रही है। ऐसी परियोजनाओं की फ़ेहरिश्त काफ़ी लंबी है।
 
सबसे पहले, प्रधानमंत्री ने 20 अक्टूबर को गोरखपुर से सटे कुशीनगर ज़िले में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का लोकार्पण किया। उसके बाद 25 अक्टूबर को उन्होंने पूर्वांचल के नौ ज़िलों में मेडिकल कॉलेजों का लोकार्पण किया।
 
पीएम मोदी ने फिर 16 नवंबर को सुल्तानपुर में लखनऊ से गाज़ीपुर को जोड़ने वाले 341 किलोमीटर लंबे और 22,500 करोड़ की लागत से बने पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया। फिर उन्होंने 7 दिसंबर को 9,600 करोड़ रुपये की कई परियोजनाओं का लोकार्पण किया। इसमें गोरखपुर के एम्स के अलावा एक बड़ा फ़र्टिलाइज़र प्लांट भी शामिल है।
 
11 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोंडा, बलरामपुर और बहराइच ज़िलों में 9,600 करोड़ रुपये की लागत से बने सरयू कनाल प्रोजेक्ट का लोकार्पण किया, और सबसे ताज़ा कार्यक्रम सोमवार का रहा, जब नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में 339 करोड़ रुपये से बनाये गए काशी कॉरिडोर का लोकार्पण करते हुए इस मौक़े को एक त्योहार के रूप में मनाया।
 
परियोजनाओं के लोकार्पण की लगी इस झड़ी के बारे में उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता का मानना है कि बीजेपी अपने पक्ष में माहौल बरक़रार रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है। तो क्या पूर्वांचल में कमज़ोर प्रदर्शन योगी-मोदी की राजनीतिक शख़्सियत के लिए हानिकारक हो सकता है?
 
इस बारे में सुमन गुप्ता कहती हैं, "मोदी और योगी दोनों की जो निजी छवि है, उस छवि को बरक़रार रखना एक बड़ा सवाल है। आपको याद होगा कि 2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते बीजेपी जब वो सीट हार गयी थी, तब जगह-जगह उनकी आलोचना होती थी और उन पर सवाल खड़े होने लगे थे। इसलिए वे किसी भी स्थिति में इस दांव को गंवाने देना नहीं चाहते।"
 
क्या है पूर्वांचल का चुनावी गणित?
उत्तर प्रदेश के चुनावी विश्लेषण और सर्वे में पूर्वांचल के ज़िलों और सीटों की संख्या अक्सर अलग-अलग मिलती है।
 
जुलाई में ज़ी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के लगभग 26 ज़िले पूर्वांचल में आते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां की 156 में से 106 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी।
 
इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2019 के लोकसभा चुनावों में पूर्वांचल की 30 में से 21 सीटों पर बीजेपी के सांसद चुने गए। साथ ही पार्टी के सहयोगी अपना दल के भी दो सांसद चुने गए। 2022 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी की कोशिश होगी कि वो किसी भी तरह से इस इलाक़े में अपना वर्चस्व क़ायम रखे।
 
हाल ही में, एबीपी न्यूज़ और सी वोटर के चुनावी सर्वे में पूर्वांचल की सीटों का आकलन किया गया। इसमें संकेत दिए गए कि मौजूदा हालात में पूर्वांचल में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 40 फ़ीसदी, सपा और उसके सहयोगियों को 34 फ़ीसदी और बसपा को 17 फ़ीसदी वोट मिलने का अनुमान है।
 
इस सर्वे में पूर्वांचल में विधानसभा सीटों की संख्या 130 बतायी गई। इस लिहाज़ से इस इलाक़े को पश्चिमी उत्तर प्रदेश (136 सीट) के बाद दूसरा सबसे बड़ा बताया गया।
 
सर्वे के अनुसार, इस बार पूर्वांचल में बीजेपी को 61-65, सपा को 51-55 और बसपा को 4-8 सीटें दी गई हैं। इसी सर्वे में यह भी बताया गया कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैस बीजेपी और सपा के बीच फ़ासला कम हो रहा है। ज़ाहिर है इन रुझानों से बीजेपी ख़ेमे में ख़तरे की घंटियां बजने लग गई होंगी।
 
क्या सपा के चलते बैकफ़ुट पर है बीजेपी?
 
अखिलेश यादव ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, महान दल, अपना दल (कृष्णा पटेल), जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन कर पूर्वांचल में अपने गठबंधन को मज़बूती देने की कोशिश की है।
 
इन गठबंधनों पर नज़र बनाए रखने वाले पत्रकार ओमर रशीद कहते हैं, "अपने आप को सीएम पद के दावेदार के रूप में पेश कर रहे अखिलेश यादव ने एक को छोड़कर अब तक छोटे-छोटे जितने भी जातिगत गठबंधन किए हैं, वे सभी पूर्वांचल में है। एक जो अलग है, वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी का गठबंधन है।''
 
रशीद आगे बताते हैं, ''ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का बीजेपी से अलग होकर सपा के साथ चले जाना बीजेपी के लिए बड़ा झटका है। चार विधायकों वाली इस पार्टी पर भाजपा की निर्भरता थी। पूर्वांचल में बीजेपी को अब भी राजभर, चौहान, कुर्मी, कुशवाहा, मौर्या और सैनी जैसी जातियों के वोटों की ज़रूरत है। यदि कोई बड़ी पार्टी चार-पांच छोटे दलों के साथ गठबंधन करती है, तो कभी-कभी उसमें एक बड़ा इलाक़ा आ जाता है। इससे माहौल बनाया जाता है।"
 
हाल में सपा से पूर्वांचल के कई नेता जुड़े हैं। रविवार को बसपा में दो दशक से रहे गोरखपुर के ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी, अपने विधायक पुत्र विनय शंकर तिवारी और ख़लीलाबाद से बीजेपी के विधायक जय चौबे के साथ सपा में शामिल हो गए।
 
बसपा के कद्दावर नेता और कटेहरी से विधायक लालजी वर्मा और अकबरपुर से बसपा विधायक राम अचल राजभर ने अखिलेश यादव की मौजूदगी में अकबरपुर में जनसभा कर अपने समर्थकों के साथ सपा की सदस्यता ले ली।
 
टिकट की उम्मीद पाले ये स्थानीय नेता अपनी बिरादरी के वोट सपा को दिलवाने की कोशिश करेंगे। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के भव्य लोकार्पण के ठीक बाद अखिलेश यादव का चुनावी रथ इस एक्सप्रेसवे से गुज़रा। उन्हें देखने और उनका भाषण सुनने के लिए लोग देर रात तक सड़कों पर डटे रहे। उसके बाद चर्चा होने लगी कि प्रधानमंत्री के इतने बड़े कार्यक्रम के बावजूद अखिलेश ''अच्छी भीड़'' जुटा रहे हैं।
 
बीजेपी भी कर रही पुरज़ोर कोशिश
हालांकि भाजपा और जातिगत राजनीति पर आधारित उसके सहयोगी दल भी माहौल बनाने में लगे हैं। सोमवार को निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद ने कहा कि वो लखनऊ में "सरकार बनाओ और अधिकार पाओ संयुक्त विशाल रैली" करने जा रहे हैं। इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी रहेंगे।
 
समाजवादी की पूर्वांचल राजनीति में इस बार अपना सामाजिक बेस बढ़ाने की कोशिशें साफ़ नज़र आ रही हैं।
 
इस बारे में पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं, "सपा चाहेगी कि वो बिना मुस्लिम कार्ड खेले वहां के दूसरे वर्गों में थोड़ी पकड़ बना ले। इस चुनाव में आप पाएंगे कि कोई भी दल मुसलमानों का वोट नहीं मांग रहा है। सब हिंदू-हिंदू कर रहे हैं।''
 
रतनमणि लाल का मानना है, ''सपा के भीतर भी एक सोच है कि यदि वो ब्राह्मण, राजभर, कुर्मी, पटेल, इत्यादि के साथ मिलकर राजनीति करे तो फिर जनाधार बनाना आसान होगा। इन गठबंधनों से शायद वो मुस्लिम समर्थक की अपनी छवि से भी बाहर निकलने की कोशिश कर रही है।"
 
क्या बीजेपी पश्चिम की भरपाई करेगी पूर्वांचल से?
किसान आंदोलन ख़त्म होने के बाद दिल्ली की सीमाओं से किसानों का लौटना अभी शुरू हुआ है। ऐसे में पश्चिम उत्तर प्रदेश में बीजेपी के पक्ष में माहौल बदलने में अभी थोड़ा वक़्त लग सकता है। लेकिन चुनावों का एलान होने में अब सिर्फ़ चंद दिन रह गए हैं।
 
पत्रकार ओमर रशीद का मानना है कि किसान आंदोलन से होने वाले नुक़सान की भरपाई बीजेपी पूर्वांचल से करने की कोशिश कर रही है।
 
ओमर कहते हैं, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए कोई भी प्रचार कार्य ज़्यादा कारगर नहीं हो रहा है। वहां पर बीजेपी के ख़िलाफ़ किसानों की नाराज़गी साल भर से फैल ही रही है। वहां होने वाले संभावित नुक़सान की भरपाई पूर्वांचल से करने की कोशिश होगी।''
 
उनके अनुसार, सीएम का इलाक़ा गोरखपुर और पीएम का बनारस, दोनों पूर्वांचल में ही हैं। योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर और उसके आसपास के इलाक़ों पर काफ़ी प्रभाव है। पूर्वांचल से पूरे प्रदेश में योगी मॉडल का प्रचार-प्रसार करना बीजेपी के लिए आसान है।"
 
वहीं वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "2017 में भाजपा को पूरब में सबसे अधिक सीटें मिली थीं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन भले ख़त्म हो गया है, पर किसान और आम जनता के जीवन के जो संकट हैं, शायद वे इन चीज़ों से काफ़ी आगे बढ़ गए हैं। किसी आम आदमी के लिए जीना अब बहुत कठिन हो गया है।''
 
पीएम की सक्रियता पर पक्ष-विपक्ष की राय
सुमन गुप्ता बताती हैं, ''अब देखना है कि धर्म की घुट्टी और मुफ़्त राशन से लोगों को अपनी ओर कितना खींचा जा सकता है। इस बात को अब बीजेपी भी समझ रही है। ये सब जानते हुए वो सारे प्रयास कर रही है ताकि एक बार फिर उसकी सरकार बन जाए और विपक्ष उसे कोई बड़ी चुनौती न दे पाए।"
 
प्रधानमंत्री के पूर्वांचल के लगातार हो रहे दौरों पर सपा प्रवक्ता अब्दुल हाफ़िज़ गांधी कहते हैं, "पीएम की जो सक्रियता है, वो यही बताती है कि बीजेपी आज डरी हुई है। काम के नाम पर इन्होंने कुछ किया नहीं और जब आचार संहिता लगने वाली है, तो लोकार्पण पर लोकार्पण किए जा रहे हैं। ये जनता को भरमाने का काम है। यहां प्रधानमंत्री के ओहदे का भी इस्तेमाल हो रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री ने पहले पूरे पूर्वांचल की सुध ली नहीं और आज वो राजनीतिक कारणों से यहां आ रहे हैं।"
 
विपक्ष के इन आरोपों पर पूर्वांचल के बीजेपी के प्रवक्ता अशोक पांडेय कहते हैं, "जब कभी कोई भी निर्माण होता है तो किसी न किसी राज्य में चुनाव होता है। ऐसे में लोग आरोप लगाते रहते हैं। विपक्ष का काम ही है आलोचना करना। वो इस तरह आलोचना करते ही रहेंगे। सपा हमारे लिए कोई ख़तरा नहीं है। हमने विकास के कई काम किए हैं। ये लोग जातियों को जोड़ने और मुस्लिम-यादव की राजनीति करने वाले लोग हैं। इनसे हमें कोई ख़तरा नहीं है।"

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