पीएम मोदी की छवि और भारत के कृषि सुधार को कितना बड़ा धक्का लगा है?

BBC Hindi| पुनः संशोधित सोमवार, 22 नवंबर 2021 (08:06 IST)
एक ओर प्रदर्शनकारी किसान पीएम मोदी के तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने पर जश्न मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर के अंदर और विदेश में सुधार समर्थक अर्थशास्त्री उनके फ़ैसले से बेहद निराश हैं।
सुधार समर्थक अर्थशास्त्री गुरचरण दास ने बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "इस फ़ैसले से मैं बहुत हैरान हूं, दुखी हूं। मायूस हूं। मुझे दुख हुआ क्योंकि ये पंजाब के किसान की जीत नहीं, हार है। देश की भी हार है।"

उन्होंने अपनी निराशा जताते हुए कहा, "मेरे ख़याल में सियासत की जीत हो गयी है और अर्थव्यवस्था की हार हुई है। यूपी में चुनाव आ रहा है तो सरकार के लोग डर गए कि किसान नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने यह फ़ैसला ले लिया।"
विदेश में वो लोग जो भारत में आर्थिक सुधार की मांग कर रहे थे वो भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री का निर्णय किसानों की जीत है, लेकिन वो ये भी कहते हैं कि इस क़दम ने कृषि क्षेत्र के सुधारों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

हॉलैंड में वैगनिंगन विश्वविद्यालय और अनुसंधान केंद्र में कृषि साइंटिस्ट प्रोफ़ेसर एलेग्जेंडर हेज़ेल ने बीबीसी से कहा, "हम भारत में भूमि और श्रम में सुधार देखना चाहते थे। कृषि क्षेत्र में और सुधार देखना चाहते थे, आर्थिक सुधार की उम्मीद थी लेकिन यह फ़ैसला मोदी सरकार पर भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।"
'इंडिया अनबाउंड' नाम की चर्चित किताब के लेखक गुरचरण दास के मुताबिक़ अब कृषि क्षेत्र में सुधार का मुद्दा और भी पीछे चला गया है। वो कहते हैं, "यह प्रधानमंत्री मोदी की बहुत बड़ी नाकामी है। उनकी सुधारवाद छवि को धक्का लगा है। कई लोगों को अब वे एक कमज़ोर प्रधानमंत्री लगेंगे।"

पीएम मोदी संदेश देने में नाकाम रहे?
गुरचरण दास के मुताबिक अब इस देश में कृषि क्षेत्र में रिफ़ॉर्म लाना मुश्किल हो गया है। उनके मुताबिक, "प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं। नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे।"
गुरचरण दास के मुताबिक रिफ़ॉर्म को बेचना पड़ता है जो एक मुश्किल काम है और इसमें समय लगता है। "लोगों को समझाना पड़ता है क्योंकि ये आसान नहीं है। मोदी लोगों को समझाने में नाकाम रहे।" प्रधानमंत्री ने ख़ुद शुक्रवार की सुबह के अपने भाषण में स्वीकार किया को वो किसानों को ये क़ानून समझाने में नाकाम रहे। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि किसान भी समझने में नाकाम रहे।"

गुरचरण दास ने ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के हवाले से बताया कि 'वह हमेशा कहा करती थीं कि वह 20 प्रतिशत समय लेती हैं सुधार के लिए क़दम उठाने में और 80 प्रतिशत उस सुधार को बेचने में। तो हम ने नहीं किया यह।'
जिनेवा भू-राजनीतिक अध्ययन संस्थान (जीआईजीएस) के निदेशक एलेक्जेंडर लैम्बर्ट बताते हैं, "भारत सरकार यह दावा कर रही थी कि नए क़ानूनों से कृषि क्षेत्र में एक बड़ा सुधार आता जिससे इसे आधुनिक बनाने और इसकी क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती। इससे भारत में कृषि क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा बढ़ती और इसका फ़ायदा सबको मिलता। सुधार निवेश को आकर्षित करता और संभावित रूप से टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र में मदद मिलती। यह सरकार का दावा था लेकिन वास्तविकता यह कि इन क़ानूनों के लागू होने से कृषि का बाज़ार छोटे किसानों के हाथों से निकलकर बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों और चंद उद्योगपतियों के हाथ में चला जाता।"
जब पिछले साल तीन विवादास्पद कृषि विधेयक लाए गए तो कई सुधारवादियों ने सरकार के इस क़दम का स्वागत किया। वैसे कई सुधार समर्थकों को लग रहा था इन क़ानूनों को लाने से पहले सरकार किसानों और राज्य सरकारों के साथ परामर्श करना चाहिए था। जिस तरह से इन क़ानूनों को अचानक पेश किया गया था, उसका समर्थन कई सुधारवादियों ने नहीं किया था।

विपक्ष के नेताओं ने भी कड़ा विरोध किया था। इन तमाम आलोचनाओं में यही कहा जा रहा था कि यह क़दम असल में कृषि क्षेत्र को बड़े उद्योगपतियों के हवाले करने की एक कोशिश है।
भारत की आबादी के लगभग 60 प्रतिशत लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। किसान अनाजों की निजी बिक्री के पक्ष में सरकारी थोक बाज़ारों की दशकों पुरानी व्यवस्था को ख़त्म करने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क यह है कि ये क़ानून बड़े उद्योगों के हाथों में बहुत अधिक शक्ति देगा और चावल और गेहूं जैसी प्रमुख फ़सलों पर न्यूनतम मूल्य गारंटी को जोख़िम में डाल देगा।

सरकार ने क़ानून का विरोध कर रहे लोगों को यह समझाने की कोशिश की और ये दलील दी कि फ़सलों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा से किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है और भारत को और अधिक आत्मनिर्भर देश बनाया जा सकता है।
सरकार और किसानों के नेताओं के बीच कई बार हुई बातचीत के दौरान किसानों ने मांग की कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी को क़ानून में शामिल करे ताकि उन्हें एमएसपी की गारंटी मिले। सरकार ने ऐसा नहीं किया और इसी वजह से किसानों का आंदोलन आज भी जारी है।

कैसा सिस्टम है एमएसपी?
प्रोफ़ेसर एलेग्जेंडर हेज़ेल का तर्क है कि कृषि क्षेत्र में भारत को सालों से रिफ़ॉर्म की ज़रूरत है और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लाए गए तीन क़ानून कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ़ एक क़दम था। उनका कहना था कि एमएसपी का सिस्टम पुराना हो चुका है और इसे कब तक चलाया जा सकता था? "सरकार ने एमएसपी को जारी रखने का वादा किया है लेकिन मैं कृषि मार्किट को समझता हूँ और मैं कहूंगा कि एमएसपी एक ख़राब सिस्टम है।"
इन क़ानूनों के पक्ष में जो विशेषज्ञ हैं वो एमएसपी को एक बीमारी मानते हैं, जैसा कि गुरचरण दास कहते हैं, "पंजाब जो एमएसपी सिस्टम में फंसा हुआ है ये एक क़िस्म की बीमारी में फंसा हुआ है, क्योंकि इससे एक तरह की सुरक्षा मिलती है। किसान सोचता है जितना चावल या गेहूं मैं उगाऊंगा सरकार उसे ख़रीद लेगी। सवाल ये है कि देश को इतने अनाज की ज़रूरत नहीं है। गोदामों में अनाज सड़ रहे हैं, उन्हें चूहे खा रहे हैं।"
हालांकि विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा का लगातार कहना है कि एमएसपी से किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है। लेकिन सुधारवादी क़दमों को हिमायती गुरचरण दास कहते हैं, "पंजाब के किसान मेहनती हैं और उद्यमी हैं। दूसरे राज्यों के किसान फल, मसाले, जड़ी बूटी, सब्जियां इत्यादि उगाते हैं। इनमें मुनाफ़ा बहुत है और इनमें कोई एमएएसपी नहीं है। तो पंजाब का बेचारा किसान इसमें क्यों फंसा हुआ है?"
गुरचरण दास और रिफार्म के हामी दूसरे कई अर्थशास्त्री इन तीनों कृषि क़ानूनों को आदर्श क़ानून मानते हैं। उनके अनुसार मोदी सरकार से ग़लती यह हुई कि राज्यों सरकारों से इन क़ानूनों को लागू करने को नहीं कहा।

गुरचरण दास कहते हैं, "बहुत से राज्य इसे लागू कर देते, ख़ासतौर से जिन राज्यों में बीजेपी सत्ता पर है। क्योंकि जो समस्या है वो पंजाब, हरियाणा और थोड़ा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं। 2005-06 में जब सरकार वैट (मूल्य वर्धित कर) लेकर आयी थी तो बहुत से राज्यों ने इसका विरोध किया था। सरकार ने कहा था ठीक है जो राज्य इसे लागू करना चाहता है करे, जो नहीं करना चाहते हैं न करें। अगले 18 महीने में सभी राज्यों ने इसे लागू किया क्योंकि इसका फ़ायदा लोगों ने देखा।"
प्रोफ़ेसर एलेग्जेंडर हेज़ेल का ज़ोर इस बात पर था कि मोदी सरकार को कृषि क्षेत्र में सुधार लाना चाहिए लेकिन किसानों से बातचीत के बाद। वो कहते हैं, "मैंने पढ़ा है कि मोदी ने अपने भाषण में ज़ीरो बजट खेती की बात की है जिसके लिए उन्होंने एक समिति के गठन का एलान किया है जिसमें किसानों को भी शामिल करने की बात कही गयी है। ये एक अच्छा क़दम है और यह रिफ़ॉर्म की तरफ़ एक बार फिर से जाने की तरफ पहला क़दम कहा जा सकता है।"
जिनेवा भू-राजनीतिक अध्ययन संस्थान (जीआईजीएस) की निदेशक एलेक्जेंडर लैम्बर्ट ने कहा, "भारतीय संसद महज़ रबर स्टांप की तरह काम नहीं करती है, यह बताने के लिए मोदी सरकार और उनकी टीम को विपक्षी राजनीतिक दलों और सभी साझेदारों के साथ ठोस बातचीत करके रास्ता निकालना चाहिए ताकि दुनिया के सबसे बड़े देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति बने। जब यह कहा जा रहा है कि बड़ी-बड़ी एग्री बिजनेस करने वाली कंपनियां और फूड और फाइनेंस सेक्टर की फर्म्स कृषि नीतियों पर कब्ज़ा जमा रही है यह भी देखना होगा कि छोटे किसानों का नुकसान नहीं हो।"

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