लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी जब ताशकंद समझौते से हुईं नाराज़

BBC Hindi| पुनः संशोधित शनिवार, 2 अक्टूबर 2021 (08:29 IST)
रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता
भारत में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने समाज के बेहद साधारण वर्ग से अपने जीवन की शुरुआत कर देश के सबसे पड़े पद को प्राप्त किया।
 
चाहे रेल दुर्घटना के बाद उनका रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा हो या 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनका नेतृत्व या फिर उनका दिया 'जय जवान जय किसान' का नारा, लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता के जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, उसके बहुत कम उदाहरण मिलते हैं।
 
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य ग़रीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता प्रदान करवाना था। आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे।
 
ललिता शास्त्री का जवाब
उनको घर का ख़र्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ़ से 50 रुपये प्रति माह दिए जाते थे। एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा कि क्या उन्हें ये 50 रुपये समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का ख़र्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं?
 
ललिता शास्त्री ने तुरंत जवाब दिया कि ये राशि उनके लिए काफ़ी है। वो तो सिर्फ़ 40 रुपये ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बचा रही हैं।
 
लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपये कर दी जाए और बाकी के 10 रुपये किसी और ज़रूरतमंद को दे दिए जाएं।
 
अनिल की ग़लती
शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री बताते हैं, "एक बार रात के भोजन के बाद उनके पिता ने उन्हें बुलाकर कहा कि मैं देख रहा हूँ कि आप अपने से बड़ों के पैर ढंग से नहीं छू रहे हैं। आप के हाथ उनके घुटनों तक जाते हैं और पैरों को नहीं छूते।
 
अनिल ने अपनी ग़लती नहीं मानी और कहा कि आपने शायद मेरे भाइयों को ऐसा करते हुए देखा होगा।
 
इस पर शास्त्री जी झुके और अपने 13 साल के बेटे के पैर छूकर बोले कि इस तरह से बड़ों के पैर छुए जाते हैं। उनका ये करना था कि अनिल रोने लगे। वो कहते हैं कि तब का दिन है और आज का दिन, मैं अपने बड़ों के पैर उसी तरह से छूता हूँ जैसे उन्होंने सिखाया था।
 
भारत के गृहमंत्री
जब लालबहादुर शास्त्री भारत के गृह मंत्री थे, जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर उनके प्रेस सचिव थे। कुलदीप याद करते हैं कि एक बार वो और शास्त्री जी महरोली से एक कार्यक्रम में भाग लेकर लौट रहे थे। एम्स के पास उन दिनों एक रेलवे क्रॉसिंग होती थी जो उस दिन बंद थी।
 
शास्त्री जी ने देखा कि बगल में गन्ने का रस निकाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक फाटक खुलता है क्यों न गन्ने का रस पिया जाए। इससे पहले कि कुलदीप कुछ कहते वो ख़ुद दुकान पर गए और अपने साथ-साथ कुलदीप, सुरक्षाकर्मी और ड्राइवर के लिए गन्ने के रस का ऑर्डर किया।
 
दिलचस्प बात ये है कि किसी ने उन्हें पहचाना नहीं, यहाँ तक कि गन्ने का रस बेचनेवाले ने भी नहीं। अगर उसे थोड़ा बहुत शक़ हुआ भी होता तो वो ये सोच कर उसे दरकिनार कर देता कि भारत का गृह मंत्री उसकी दुकान पर गन्ने का रस पीने क्यों आएगा।
 
लोन पर कार खरीदी
शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक उनका अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। एक बार उनके बच्चों ने उलाहना दिया कि अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। अब हमारे पास अपनी कार होनी चाहिए।
 
उस ज़माने में एक फ़िएट कार 12,000 रुपये में आती थी। उन्होंने अपने एक सचिव से कहा कि ज़रा देखें कि उनके बैंक खाते में कितने रुपये हैं? उनका बैंक बैलेंस था मात्र 7,000 रुपये। अनिल याद करते हैं कि जब बच्चों को पता चला कि शास्त्री जी के पास कार ख़रीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि कार मत ख़रीदिए।
 
लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि वो बाक़ी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटाएंगे। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार ख़रीदने के लिए 5,000 रुपये का लोन लिया। एक साल बाद लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया।
 
इंदिरा की पेशकश
उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गाँधी ने सरकार की तरफ़ से लोन माफ़ करने की पेशकश की लेकिन उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने इसे स्वीकार नहीं किया और उनकी मौत के चार साल बाद तक अपनी पेंशन से उस लोन को चुकाया।
 
अनिल बताते हैं कि जहाँ-जहाँ भी वो पोस्टिंग पर रहे, वो कार उनके साथ गई। ये कार अभी भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है और दूर- दूर से लोग इसे देखने आते हैं।
 
कुलदीप नैयर कहते हैं कि एक बार रूस में लेनिनग्राद में शास्त्री बोलशोई थियेटर की स्वान लेक बैले प्रस्तुति देखते हुए बहुत असहज हो रहे थे।
 
बेटे की रिपोर्ट कार्ड
मध्यांतर में उनकी बगल में बैठे हुए कुलदीप ने उनसे पूछा कि क्या वो बैले का आनंद ले रहे हैं तो शास्त्री ने बहुत भोलेपन से जवाब दिया कि उन्हें शर्म आ रही है क्योंकि नृत्यांगनाओं की टांगे नंगी हैं और अम्मा बगल में बैठी हुई हैं। वो अपनी पत्नी ललिता को अम्मा कहा करते थे।
 
साल 1964 में जब शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे। उस ज़माने में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग नहीं हुआ करती थी। हाँ अभिभावकों को छात्र का रिपोर्ट कार्ड लेने के लिए ज़रूर बुलाया जाता था।
 
शास्त्री ने भी तय किया कि वो अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वो स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि वो कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
 
ताशकंद समझौता
अनिल याद करते हैं, "मेरी कक्षा 11 बी पहले माले पर थी। वो ख़ुद चलकर मेरी कक्षा में गए। मेरे क्लास टीचर रेवेरेंड टाइनन उन्हें वहाँ देखकर हतप्रभ रह गए और बोले सर आपको रिपोर्ट कार्ड लेने यहाँ आने की ज़रूरत नहीं थी। आप किसी को भी भेज देते। शास्त्री का जवाब था, "मैं वही कर रहा हूँ जो मैं पिछले कई सालों से करता आया हूँ और आगे भी करता रहूँगा।"
 
रेवेनेंड टाइनन ने कहा, "लेकिन अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं।" शास्त्री जी मुस्कराए और बोले, "ब्रदर टाइनन मैं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला, लेकिन लगता है आप बदल गए हैं।"
 
शास्त्री पर दबाव
वर्ष 1966 में ताशकंद में भारत-पाकिस्तान समझौते पर दस्तख़त करने के बाद शास्त्री बहुत दबाव में थे। पाकिस्तान को हाजी पीर और ठिथवाल वापस कर देने के कारण उनकी भारत में काफ़ी आलोचना हो रही थी।
 
उन्होंने देर रात अपने घर दिल्ली फ़ोन मिलाया। कुलदीप नैयर बताते हैं, "जैसे ही फ़ोन उठा, उन्होंने कहा अम्मा को फ़ोन दो। उनकी बड़ी बेटी फ़ोन पर आई और बोलीं अम्मा फ़ोन पर नहीं आएंगी। उन्होंने पूछा क्यों? जवाब आया इसलिए क्योंकि आपने हाजी पीर और ठिथवाल पाकिस्तान को दे दिया। वो बहुत नाराज़ हैं।

शास्त्री को इससे बहुत धक्का लगा। कहते हैं इसके बाद वो कमरे का चक्कर लगाते रहे। फिर उन्होंने अपने सचिव वैंकटरमन को फ़ोन कर भारत से आ रही प्रतिक्रियाएं जाननी चाही। वैंकटरमन ने उन्हें बताया कि तब तक दो बयान आए थे, एक अटल बिहारी वाजपेई का था और दूसरा कृष्ण मेनन का और दोनों ने ही उनके इस क़दम की आलोचना की थी।"
 
शास्त्री जी का देहांत
कुलदीप बताते हैं, "उस समय भारत-पाकिस्तान समझौते की खुशी में ताशकंद होटल में पार्टी चल रही थी। मैं चूँकि शराब नहीं पीता था इसलिए अपने होटल के कमरे में आ गया और सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि अगले दिन तड़के मुझे शास्त्री जी के साथ अफ़गानिस्तान के लिए रवाना होना था। मैंने सपने में देखा कि शास्त्रीजी का देहांत हो गया। फिर मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। जब बाहर आया तो एक वहाँ एक रूसी औरत खड़ी थी। बोलीं- यॉर प्राइम मिनिस्टर इज़ दाइंग।"
 
कुलदीप कहते हैं, "मैंने जल्दी-जल्दी अपना कोट पहना और नीचे आ गया। जब मैं शास्त्री जी के डाचा में पहुंचा तो देखा बरामदे में रूसी प्रधानमंत्री कोसिगिन खड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर इशारा किया कि शास्त्री जी नहीं रहे। जब मैं कमरे में पहुंचा तो देखा बहुत बड़ा कमरा था और उस कमरे में एक बहुत बड़ा पलंग था। उसके ऊपर एक बहुत छोटा सा आदमी नुक्ते की तरह सिमटा हुआ निर्जीव पड़ा था। रात ढाई बजे के करीब जनरल अयूब आए। उन्होंने इज़हारे-अफ़सोस किया और कहा, "हियर लाइज़ अ पर्सन हू कुड हैव ब्रॉट इंडिया एंड पाकिस्तान टुगैदर''(यहाँ एक ऐसा आदमी लेटा हुआ है जो भारत और पाकिस्तान को साथ ला सकता था)।
 
सर्वोच्च नागरिक सम्मान
भारत का यह दुर्भाग्य ही रहा कि ताशकंद समझौते के बाद वह इस छोटे क़द के महान पुरुष के नेतृत्व से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो गया। उन्हें 1966 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया और अली सरदार जाफ़री ने उनकी आख़िरी उपलब्धि के सम्मान में एक नज़्म लिखी-
 
मनाओ जश्ने मोहब्बत कि ख़ून की बू न रही
 
बरस के खुल गए बारूद के सियाह बादल
 
बुझी-बुझी सी है जंगों की आख़िरी बिजली
 
महक रही है गुलाबों से ताशकंद की शाम
 
ख़ुदा करे कि शबनम यूँ ही बरसती रहे
 
ज़मीं हमेशा लहू के लिए तरसती रहे।

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