कई कोर्सेस की मान्यता खतरे में

रीवा| Naidunia| पुनः संशोधित शुक्रवार, 2 मार्च 2012 (07:50 IST)
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प्रदेश सरकार ने भले ही पांच नए खोलने की हरी झंडी बजट में दिखा दी हो लेकिन पूर्व में चल रहे मेडिकल कॉलेज बद्हाली की कगार पर पहुंच चुके हैं। इसका जीता जागता उदाहरण संभागीय मुख्यालय स्थित श्यामशाह मेडिकल कॉलेज है। जहां सुविधाओं के अभाव के चलते मरीजों को परेशान होना पड़ता है और कई डिग्री- डिप्लोमा कोर्स की मान्यता पर भी खतरे की तलवार लटकी है। वहीं कई कोर्स भी बंद कर दिए गए हैं।


किसी से नहीं छिपी है असलियत-

मेडिकल कॉलेजों का हाल किसी से छिपा नहीं है। श्याम शाह मेडिकल कॉलेज रीवा सहित पांचों मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था रामभरोसे है। गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल, एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर, जीआर मेडिकल कॉलेज ग्वालियर, एनएससीबी मेडिकल कॉलेज जबलपुर, बुन्देलखण्ड मेडिकल कॉलेज सागर और एसएस मेडिकल कॉलेज रीवा के कई कोर्सों को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मान्यता नहीं मिल सकी है। वजह मेडिकल कॉलेज में व्यवस्थाओं की कमी, प्रोफेसर का न होना और सुविधाओं का अभाव। जिसके चलते मध्यप्रदेश के मेडिकल छात्रों की डिग्री- डिप्लोमा कोर्स को अवैध करार कर दिया जाता है और इन मेडिकल छात्रों को प्रदेश के बाहर रोजगार भी उपलब्ध नहीं हो पाता। इन कॉलेजों की व्यवस्था सुधारने के बजाय नए मेडिकल कॉलेज खोलना लोगों के समझ में नहीं आ रहा है।


कई विभागों में जड़ा ताला-

मेडिकल कॉलेज द्वारा संचालित संजय गांधी चिकित्सालय बदहाली की कगार पर पहुंच गया है। वर्तमान में यहां 97 सीनियर डॉक्टर के पद हैं जबकि इसमें महज 45 डॉक्टर ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा 70 फीसदी नर्सिंग स्टॉफ की भी कमी है। इसके अलावा कैंसर यूनिट, सिटी स्केन जैसे विभाग में ताला जड़ा हुआ है। यहां करोड़ों रुपए की आधुनिक मशीनों को बोल्ड थेरेपी, सोनोग्राफी जैसी बेशकीमती मशीनें लगाई गई, लेकिन इन्हें चलाने वाले ऑपरेटर मौजूद नहीं होने से बंद हैं और मरीज दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

छात्र नहीं कर पाते पढ़ाई-

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कई डिग्री और डिप्लोमा कोर्सों पर मान्यता की तलवार लटकी हुई है। एमसीआई की मान्यता के अनुसार निर्मित पदों के लिए लगातार इंटरव्यू किए जा रहे हैं लेकिन नॉन क्लीनिकल में शिक्षक नहीं मिल रहे हैं। लिहाजा, मेडिकल कॉलेज में पीजी की पढ़ाई कर रहे छात्रों से चिकित्सालय में प्रेक्टिस कराई जाती है और छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान आता है।

हड़ताल की वजह-

एक ओर जहां उत्तरप्रदेश में जूनियर डॉक्टरों को 40 हजार रुपए, छत्तीसगढ़ में 50 से 55 हजार, पंजाब में 45 हजार तनख्वाह मिलती है लेकिन मध्यप्रदेश में महज 20 से 22 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है। जूनियर डॉक्टरों की आए दिन हड़ताल होती रहती है। जूनियर डॉक्टर कामबंद कर हड़ताल कर देते हैं फिर इनकी मांगें भी मान ली जाती हैं लेकिन खामियाजा इलाज करा रहे मरीजों को भुगतना पड़ता है।

इनका कहना है-

नाक, कान, गला, बेहोशी, हड्डी रोग डिग्री- डिप्लोमा के कोर्स बंद हैं। चूंकि इन कोर्स के लिए मान्यता नहीं मिली है लिहाजा प्रोफेसर जैसे पद रिक्त हैं। जिसके लिए कई बार राज्य शासन को पत्र भी लिखा जा चुका है। बिना मान्यता के कोई कोर्स नहीं चलाए जा रहे हैं।

- सीबी शुक्ला

अधीक्षक, संजय गांधी अस्पताल, रीवा



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