तेनालीराम की कहानियां : बहुरुपिए हैं या राजगुरु

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उन्होंने को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘तुम ठीक हो ना? घाव तो नहीं हुआ?’ तेनालीराम ने महाराज को कवच दिखा दिया। उसे एक खरोंच भी न आई थी। महाराज ने पूछा, ‘क्या तुम्हें इस व्यक्ति पर संदेह था, जो तुम कवच पहनकर आए हो?’


‘महाराज, अगर इसकी नीयत साफ होती तो यह दरबार में मेरे उपस्थित रहने की शर्त न रखता,’ तेनालीराम ने कहा। महाराज बोले, ‘इस दुष्ट को मैं दंड देना चाहता हूं। इसने तुम्हारे प्राण लेने का प्रयत्न किया है। मैं इसे अभी फांसी का दंड दे सकता हूं लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम स्वयं इससे बदला लो।’

‘जी हां, मैं स्वयं ही इसको मजा चखाऊंगा।’ तेनालीराम गंभीरता से बोला।
‘वह कैसे?’ महाराज ने पूछा। ‘बस आप देखते जाइए’, तेनालीराम ने उत्तर दिया।



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