सिंहासन बत्तीसी : दसवीं पुतली प्रभावती की कथा

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राजकुमारी का मन लगाने के लिए सखी-सहेलियां थीं। तपस्वी से मिलकर विक्रमादित्य ने वसु के लिए राजकुमारी का हाथ मांगा। तपस्वी ने राजा विक्रमादित्य का परिचय पाकर कहा कि अपने प्राण वह राजा को सरलता से अर्पित कर सकता है, पर राजकुमारी का हाथ उसी युवक को देगा जो खौलते तेल से सकुशल निकल आए। बस यह शर्त पूरी होनी चाहिए।

राजा विक्रम ने उसे बताया कि वे खुद ही इस युवक के स्थान पर कड़ाह में कूदने को तैयार हैं तो तपस्वी का मुंह विस्मय से खुला रहा गया। तभी राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ वहां आई। वह सचमुच अप्सराओं से भी ज्यादा सुन्दर थी।

खैर, विक्रम ने तपस्वी से कहकर कड़ाह भर तेल की व्यवस्था करवाई। जब तेल एकदम खौलने लगा, तो मां काली को स्मरण कर विक्रम तेल में कूद गए। खौलते तेल में कूदते ही उनके प्राण निकल गए और शरीर भुनकर स्याह हो गया। मां काली अपने भक्त को इस तरह कैसे मरने देती। उन्होंने बेतालों को विक्रम को जीवित करने की आज्ञा दी।

बेतालों ने अमृत की बून्दें उनके मुंह में डालकर उन्हें जिंदा कर दिया। जीवित होते ही उन्होंने वसु के लिए राजकुमारी का हाथ मांगा। राजकुमारी के पिता को खबर भेज दी गई और दोनों का विवाह धूम-धाम से सम्पन्न हुआ।

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इतना कहकर प्रभावती खामोश हो गई। राजा भोज समझ गए कि विक्रम के अस अतुलनीय त्याग का उनके पास कोई जवाब नहीं है। और लौट गए अपने कक्ष की तरफ। अगले दिन 11वीं पुतली त्रिलोचना ने रोका राजा को और सुनाई विक्रमादित्य की सुंदर व रोचक कथा। पढ़ें अगले अंक में।



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