सिंहासन बत्तीसी : तेईसवीं पुतली धर्मवती की कहानी

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एक बड़े पेड़ पर एक योगी जंजीरों से जकड़ा उल्‍टा लटका हुआ था। जंज़ीरों की रगड़ से उसके शरीर पर कई गहरे घाव बन गए थे। उन घावों से रक्त चू रहा था जो नदी में गिरते ही रक्तवर्ण पुष्पों में बदल जाता था।

कुछ दूरी पर ही कुछ साधु बैठे तपस्या में लीन थे। जब वे कुछ और फूल लेकर दरबार में वापस लौटे तो मंत्री ने राजा को सब कुछ बताया।

तब विक्रम ने उसे समझाया कि उस उलटे लटके योगी को राजा समझो और अन्य साधनारत संन्यासी उसके दरबारी हुए। पूर्वजन्म का यह कर्म उन्हें राजा या दरबारी बनाता है। अब मन्त्री को राजा की बात समझ में आ गई।
उसने मान लिया कि पूर्वजन्म के कर्म के फल के रूप में ही किसी को राजगद्दी मिलती है

(समाप्त)





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