सिंहासन बत्तीसी : छब्बीसवीं पुतली मृगनयनी की कहानी

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इन्द्र ने जब यह अद्भुत चमत्कार देखा तो उनकी चिन्ता और बढ़ गई, उन्होंने अपने सेवकों को बुलाकर आंधी-तूफान का सहारा लेने का आदेश दिया। इतने भयानक वेग से आंधी चली कि कुटिया तिनके-तिनके होकर बिखर गई। सब कुछ हवा में रुई की भांति उड़ने लगा। बड़े-बड़े वृक्ष उखड़कर गिरने लगे।


विक्रम के पांव भी उखड़ते हुए मालूम पड़े। लगा कि आंधी उन्हें उड़ाकर साधना स्थल से बहुत दूर फेंक देगी। विक्रम को समुद्र देव द्वारा दिया गया शंख याद आया और उन्होंने शंख को ज़ोर से फूंका। शंख से बड़ी तीव्र ध्वनि निकली। शंख ध्वनि के साथ आंधी-तूफान का पता नहीं रहा। वहां ऐसी शान्ति छा गई मानो कभी आंधी आई ही न हो। अब तो इन्द्रदेव की चिन्ता और अधिक बढ़ गई।
उन्हें सूझ नहीं रहा था कि विक्रम की साधना कैसे भंग की जाए। अब विक्रम की साधना को केवल अप्सराओं का आकर्षण ही भंग कर सकता था। उन्होंने तिलोत्तमा नामक अप्सरा को बुलाया तथा उसे जाकर विक्रम की साधना भंग करने को कहा।



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