सिंहासन बत्तीसी : इक्कीसवीं पुतली चन्द्रज्योति की कहानी

BBC Hindi|

अधीर होकर उन्होंने कहा- 'काश, चन्द्रदेव मदद करते!' इतना कहना था कि मानों चमत्कार हो गया। घाटियों में दूध जैसी चांदनी फैल गई। अन्धकार न जाने कहां गायब हो गया। सारी चीज़ें ऐसी साफ दिखने लगीं मानो दिन का उजाला हो।


थोड़ी दूर बढ़ने पर ही उन्हें ऐसे पौधे की झाड़ी नज़र आई जिस पर आधे नीले, आधे पीले फूल लगे थे। उन्होंने पत्तियां छुईं तो लाजवंती की तरह सकुचा गईं। उन्हें संशय नहीं रहा। उन्होंने ख्वांग बूटी का बड़ा-सा हिस्सा काट लिया।

वे बूटी लेकर चलने ही वाले थे कि दिन जैसा उजाला हुआ और चन्द्रदेव सशरीर उनके सम्मुख आ खड़े हुए। विक्रम ने बड़ी श्रद्धा से उनको प्रणाम किया। चन्द्रदेव ने उन्हें अमृत देते हुए कहा कि अब सिर्फ अमृत ही महामंत्री की पुत्री को जिला सकता है।





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