हिमालय के चमत्कारिक महात्मा की रहस्यमय दास्तां

- रमेश चंद्र राय

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प्राकृतिक व्यतिक्रम से ही रोग उत्पन्न होते हैं। तथा समानुपातन से उनका निदान भी हो जाता है। यह एक शाश्वत एवं स्वयं सिद्ध नियम है। यह केवल शास्त्र या पुराणों का ही कथन नहीं है। जब भी नैसर्गिक संचरण में भेद पैदा होगा, कोई न कोई अनपेक्षित या कृत्रिम घटना-दुर्घटना जन्म लेगी ही। इसी बात या तह को कोई बहुत पढ़कर समझता है। तथा कोई प्रकृति की गोद में बैठ निरंतर अनुभव के द्वारा संग्रहीत करता है।


ऊधमपुर (जम्मू) से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक स्थान है जिसे शिवखेरी के नाम से जाना जाता है। यहां पर भगवान शिव का एक बहुत पुराना स्थान है। यह बहुत ही दुर्गम स्थान पर है। इसमें जाना सबके बस की बात नहीं है। फिर भी यहां पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। जम्मू से सीधे यहां के लिए बस सेवा है। चाहे जो भी हो, यह एक अति मनोरम स्थान है।
शिवखेरी से लगभग सात किलोमीटर पहले मुख्य रास्ते से पश्चिमोत्तर दिशा में एक स्थान है देवजल। बिल्कुल संकरी चतुर्दिक सघन पहाड़ियों से घिरा चीड़ एवं देवदार के घने वृक्षों से ढका यह स्थान बड़ा ही डरावना दीख पड़ता है। वैसे भी यहां पर घूमने जाना वर्जित है। क्योकि यहां बड़े बड़े बाघ एवं भालू जैसे हिंसक जीव पाए जाते हैं।
इन पहाड़ियों के बीच में एक बिल्कुल खाली एवं साफ सुथरा लगभग पचासों एकड़ में फैला स्थान है। बिल्कुल सपाट एवं समतल स्थान है। यहां तक पहुंचने के लिए एक अति संकरी पगडंडी जो पहाड़ियों के बीच से होकर पेड़ो एवं घनी झाड़ियों से गुजराती है, उसी से आना होता है।

सुगंध से ही पता चलता है इस स्थान पर महात्मा जी आने वाले हैं,

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