रिमझिम फुहारों की कसम

फाल्गुनी

स्मृति आदित्य|
ND
महकती

बरखा के दमकते मोती
कोंपलों के मुहाने पर
जब भी चम-चम चमके हैं
मेरे के में
तुम्हारी यादों के बादल
झर-झर कर बरसे हैं।


नशीली बूँदों की कसम
धरती पर आकर जब भी
जल के दीपक थिरके हैं
मेरी आँखों की मुँडेर पर तुम्हारी प्रतीक्षा के अनार
टूट-टूट कर बिखरे हैं।

लहराते सावन की कसम
मौसम ने जब भी मुस्कुराकर
हरा रंग पहना है
मेरे मन के धुसर होते रंगों ने
इन्द्रधनुषी ुलिका को चुना है।
गड़-गड़ गरजते बादलों की कसम
मचलती बिजली ने जब भी
पूरी कायनात को हिलाया है
मेरे को
तुम्हारी दूरियों के झोंकों ने
जार-जार ुलाया है।
सौंधी-सौंधी मिट्टी की कसम
नन्ही कलियों ने उसमें लिपट
जब भी खिलते हुए मुझे दुलराया है
मेरे हाथों को, तुम्हारे हाथों ने
ख्वाबों में देर तक सहलाया है।



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