जातिवाद, सांप्रदायिकता पर भी चोट करती है 'मधुशाला'

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जीवन की कठिनाई भरी डगर में भटकने वाले लोगों को उन्होंने यह कहकर रास्ता बताया-

मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
किस पथ से जाऊं,
असमंजस में है भोला-भाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब
पर मैं यह बतलाता हूं,
राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला
डॉ. बच्चन ने यह भी कहा-
चलने ही चलने में कितना
जीनव हाय बिता डाला,
दूर अभी है, पर कहता है
हर पथ बतलाने वाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को
साहस है न फिरूँ पीछे, किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर
दूर खड़ी है मधुशाला।

धार्मिक कट्टरवाद से उबरने के लिए उनकी सीख थी-
धर्मग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे सबको
तोड़ चुका जो मतवाला,पंडित, मोमिन, पादरियों के
फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी मधुशाला।

मयखाने को सर्वधर्म समभाव का स्थान बताते हुए उनकी टिप्पणी थी-
एक बरस में एक बार ही
जलती होली की ज्वाला,एक बार ही लगती बाजी,
जलते दीपों की माला,
दुनियावालों किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो,
दिन में होली रात दिवाली,
रोज मनाती मधुशाला।



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