स्वतंत्रत संग्राम की पहली चिंगारी मेरठ से उठी जो प्रचंड ज्वाला बनी

मेरठ में कदम-कदम पर हैं आजादी की गाथाएं

हिमा अग्रवाल| पुनः संशोधित रविवार, 14 अगस्त 2022 (13:29 IST)
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1857 में अंग्रेजी हुकूमत से देश से खदेड़ने के लिए हजारों गुमनाम लोगों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी। इन क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए ब्रिटिश अफसरों की नींद उड़ाने के साथ एक ऐसी चिंगारी को हवा दी, जिसे अंग्रेज बुझा न सके। आजादी का सपना लेकर पूरा देश पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश के पहले स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा।

हिन्दुस्तान की आजादी के लिए हजारों गुमनाम क्रांतिवीरों को इतिहास ने भुला दिया है, वेबदुनिया परिवार इन आजादी के परवानों को शत-शत नमन करता है।

हिन्दुस्तान को आजाद करने की रूपरेखा बहुत पहले से शुरू हो चुकी थी, बस मौके का इंतजार था कि ब्रितानी हुकूमत पर किस तरह से प्रहार किया जाए। में अंग्रेज अफसरों की एक चूक ने क्रांति की ज्वाला को धधका दिया।
23 अप्रैल 1857 को अश्वरोही सेना के कमांडर ने निर्देश दिया कि सभी सिपाही अगली सुबह परेड ग्राउंड में पहुंचे। 24 अप्रैल को सभी भारतीय सैनिक परेड ग्राउंड में पहुंच गए, भारतीय सैनिकों को भनक लग चुकी थी कि उन्हें गाय की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से खोलने की ट्रेनिंग दी जाएगी। इन सैनिकों ने 24 अप्रैल को कारतूसों को मुंह से खोलने के लिए मना कर दिया।
गोरे अफसर अपनी अवहेलना सह न सके सके और उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई के आदेश दे दिए। 9 मई 1857 को चर्बी लगी कारतूस का इस्तेमाल करने से मना करने वाले 85 सिपाहियों का कोर्ट मार्शल करते हुए मेरठ की विक्टोरिया पार्क स्थित जेल में बंद कर दिया था। सैनिकों की वर्दी फाड़कर बेड़ियों में जकड़ना आजादी की अलख जगा गया। सैनिकों पर हुई इस अंग्रेजों कार्रवाई और अपमान ने क्रांति को जन्म दे दिया।
अंग्रेज सरकार के खिलाफ पहली बार 10 मई 1857 को मेरठ से स्वतंत्रता का बिगुल फूंका गया। उसी समय 11वीं व 20वीं पैदल सेना के भारतीय सैनिकों ने परेड ग्राउंड में एकत्रित होकर अंग्रेज सिपाहियों और अफसरों पर हमला बोल दिया।

भारतीय सैनिकों का हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिए जोश चरम पर था, जिसके चलते पहली गोली 20वीं पैदल सेना के सिपाही ने 11वीं पैदल सेना के सीओ कर्नल जार्ज फिनिश को रेस कोर्स के मुख्य द्वार पर मारी थी। उसी समय थर्ड कैवेलरी के जवान अश्वों पर सवार होकर 85 सिपाहियों के पास विक्टोरिया पार्क जेल पहुंच गए, जिन्हें कोर्ट मार्शल की सजा सुनाते हुए जेल में डाला गया था।
10 मई की सांझ होते-होते क्रांति पूरे मेरठ शहर में फैली और परतापुर के पास गांव रिठानी में क्रांतिकारी इकट्ठा हुए और रात में अंग्रेजी फौज को चकमा देकर दिल्ली लालकिले की तरफ रवाना हो गए। गोरे अंग्रेजों के खिलाफ मेरठ से शुरू हुई विद्रोह की आग पूरे देश में फैल गई। आजादी के शूरवीर भारतीय सिपाहियों की अदम्य साहस की कहानियां और निशानियां मेरठ में कदम-कदम पर अंकित हैं।

मेरठ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले 85 सैनिकों के नाम यहां शहीद स्मारक पर शिलालेख पर अंकित हैं। सफेद मार्बल से बना यह स्मारक 30 मीटर ऊंचा है और इसका निर्माण 1857 में शहीद हुए भारतीय सिपाहियों को श्रद्धांजलि देने के लिए किया गया था। 1857 की क्रांति में कोतवाल धनसिंह का अहम योगदान था। क्रांति के समय अंग्रेज अफसरों के आदेश के बावजूद उन्होंने क्रांतिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस आजादी के नायक धनसिंह की प्रतिमा आजादी के बाद सदर कोतवाली में लगाई गई है।
कैंट क्षेत्र में क्रांति का गवाह औघड़नाथ मंदिर आज देश-विदेश में विख्यात है। इस मंदिर को काली पलटन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। जब हमारा देश आजाद नहीं हुआ था तब अंग्रेजी हुकूमत भारतीय सिपाहियों को काली पलटन अर्थात ब्लैक आर्मी के नाम से बुलाती थी।
औघड़नाथ मंदिर परिसर में आज भी वह कुंआ मौजूद है, जहां मंदिर के पुजारी ने भारतीय सैनिकों को पानी पिलाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उन्होंने मुंह से चर्बी लगे कारतूस खोलें है। इस घटना ने भी क्रांति की ज्वाला धधकाने में अहम योगदान दिया था। अंग्रेजों ने मंदिर के पास ट्रेनिंग सेंटर भी बनाया था। आजादी के समय औघड़नाथ मंदिर परिसर में ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी आकर रुकते थे।

1857 की क्रांति से सूरजकुंड का पार्क का भी सीधा संबंध था। मेरठ के राजकीय संग्रहालय में 1857 की क्रांति का जिक्र करते हुए एक साधु को भी याद किया गया। संग्रहालय में एक फोटो के साथ ये लिखा गया है कि अप्रैल 1857 में एक साधु आए थे। जिसका वास्तविक नाम ज्ञात नही है, लेकिन उनको कमिंग ऑफ फकीर का नाम दिया गया।

इनके विषय में कहा जाता है कि मेरठ में एक साधु का आना और फिर 10 मई को बगावत हो जाना ये महज एक संयोग नहीं है। बल्कि इसके पीछे एक कुशल रणनीति है। यह फकीर अंबाला से सूरजकुंड मेरठ में आये थे और उन्होंने अपने अनुयायियों को कमल और रोटी देकर गांव-गांव क्रांति का संदेश भेजा था। इसी फकीर ने काली पल्टन से गुजरने वाले हर सैनिक के दिलों में क्रांति का बीज बोया था। वर्तमान में सूरजकुंड पार्क का जीर्णोद्धार व सौंदर्यीकरण कर दिया गया है।
मेरठ विक्टोरिया पार्क वह ऐतिहासिक स्थल है जहां 85 सैनिकों को चर्बी लगे कारतूसों के विरोध कोर्ट मार्शल करते हुए जेल में डाला गया था। तीसरी अश्वसेना के भारतीय सवारों ने अपने 85 सैनिकों को छुड़ाकर आजादी की पहली लड़ाई का बिगुल बजाया था। विक्टोरिया पार्क की जेल को तोड़कर जिन सिपाहियों को छुड़ाया गया, उन सैनिकों का नाम आज भी यहां शिलापट पर दर्ज है।

मेरठ का सदर बाजार भी क्रांति का साक्षी है। जंग ए क्रांति के दौरान सदर बाजार की वेश्याओं ने भारतीय 85 सैनिकों के कोर्ट मार्शल और वर्दी फाड़कर जेल में डालने का विरोध किया था।
इतिहासकारों के मुताबिक उस समय वेश्याएं भड़क गई थी, उन्होंने सदर बाजार से गुजरने वाले सैनिकों को ललकारते हुए कहा था कि तुम अपने हथियार हमें दो हम अंग्रेजों से मोर्चा लेकर जेल में बंद उन 85 सिपाहियों को आजाद करा देंगे। तुम लोग चूड़ियां पहनकर घर बैठ जाओ, इस ललकार को सुनने के बाद बाजार से गुजरने वाले सैनिकों का आत्मसम्मान जाग उठा और वह जंग में शामिल हो गए।



1857 की क्रांति की लहर शहर से शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्र में पहुंच गई, ग्रामीणों ने बगावत कर दी। मेरठ पांचली घाट व नगला गांव को भी क्रांति की कीमत चुकानी पड़ी थी। यहां चार जुलाई 1857 को अंग्रेजी सेना ने पूरे गांव को घेर लिये और 34 लोगों को फांसी पर लटका दिया था। क्रांति की इस ज्वाला में गांव गगौल, अक्लपुरा, भामौरी आदि में भी ग्रामीणों ने जान देकर आजादी की कीमत चुकाई थी। उस समय बागपत मेरठ का हिस्सा हुआ करता था, यहां के गांव बरकला और बसौंद, शामली में थाना भवन, बुलंदशहर में मालागढ़ गढ़ आदि थी क्रांति का क्षेत्रीय केंद्र रहा है।
वर्तमान में जहां मेरठ का कैंटोनमेंट जनरल अस्पताल बना हुआ है, वहां बेगम समरू की जेल हुआ करती थी, लेकिन बाद में अंग्रेजों ने इस पर अपना कब्जा कर लिया था। ऐसे ही जीरो माइल स्टोन को भी क्रांति के दौरान इस स्तंभ को स्थापित किया गया था। इसके अलावा डोगरा मंदिर के पीछे के हिस्से में स्थित दम दमा स्थल को क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने एक किले के तौर पर इस्तेमाल किया था। इसके अलावा माल रोड पर कमांडर वर्क्स इंजीनियर्स आफिस के पास थियेटर का शिलापट्ट दिखता है। 1857 में यहां एक ड्रामा थियेटर हुआ करता था। क्रांति के दौरान मारे गए यूरोपीय लोगों के शव यहीं पर रखे गए थे। सेंट जोंस कब्रिस्तान में क्रांति के दिन मारे गये 9 अंग्रेजों की कब्रें आज भी मौजूद है।
मेरठ कैंट क्षेत्र स्थित शहीद स्मारक, सदर बाजार, सदर थाना, पुलिस स्ट्रीट, वेस्ट एंड रोड, आफिसर्स मैस, काली पल्टन मंदिर, 20वीं नेटिव रेजिमेंट, एमएच रोड बंगला, सेंट्रल रेस्ट पाई, 11वीं नेटिव रेजिमेंट, परेड ग्राउंड रेजीमेंट, थर्ड नेटिव लाइट रेजीमेंट, चार्ल्स डासन का घर, चार्लोट चैम्बर, बंगल नंबर-241, कैप्टन एससी क्रेज का घर, बर्न डाउन बंगला, क्रामिकल स्मिथ का घर, मिलिट्री अस्पताल, शहर कोतवाली आदि क्रांति स्थल मौजूद हैं।
कल देश की आजादी गवाह बरगद और पीपल के पेड़ वर्तमान में कैंट के सीएबी इंटर कालेज प्रांगण में मौजूद है। यह वृक्ष भी आज 75 के हो रहे है। 15 अगस्त 1947 के आजादी के ऐतिहासिक पलों को सजाने के लिए क्रांतिकारियों और स्कूल प्रबंधन ने पीपल और बरगद के पेड़ रोपे, जो आज 75 वर्ष के वृक्ष बन चुके हैं। इन अमूल्य वृक्ष पर स्वतंत्रता सेनानी के नाम का शिलापट्ट भी लगा हुआ है।



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