पृथ्वी के पार की दुनिया

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इस दुनिया के पार भी क्या कोई दुनिया है? इस सवाल का जवाब अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं चला। जब भी कभी, कहीं इस तरह का कोई सवाल कोई उठाता है तो जवाब देने वाला व्यक्ति पसोपेश में पड़ जाता था कि वह क्या कहे क्योंकि अभी तक विज्ञान भी यह नहीं खोज पाया थाकि क्या वास्तव में इस दुनिया के पार भी कोई दुनिया है, पर लगता है जल्द ही यह रहस्य भी उजागर होने वाला है।

इस रहस्य का राज खुलने के साथ ही यह भी पता चल जाएगा कि आक्टोपस जैसे बहुभुजा वाले प्राणी की उत्पत्ति कैसे हुई और कहीं यह प्राणी किसी दूसरे ग्रह से तोनहीं आया। पृथ्वी से डायनासौर कैसे लुप्त हो गए। अभी तक की खोजों का तो यही निष्कर्ष था कि प्रकृति ने ही आक्टोपस को जन्म दिया है और प्राकृतिक आपदाओं की वजह से डायनासौर जैसा विशालकाय जीव लुप्त हो गया।

अमेरिका में पृथ्वी के पार जीवन की संभावनाओं की खोज के लिए विज्ञान की एक नई अनोखी शाखा के तहत अध्ययन शुरू किया गया है। इसे एक्सोबायलॉजी (या एस्ट्रोबायलॉजी) नाम दिया गया है। विज्ञान की इस शाखा के अंतर्गत पृथ्वी के पार जीवन की संभावनाओं तथा पृथ्वीके बदलते व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है। धीरे-धीरे जब इस एक्सोबायलॉजी की खोजें सामने आएँगी, तब यह पहचान करना आसान हो जाएगा कि हमारे आसपास जो मौजूद है वह वस्तुतः पृथ्वी पर जन्मे प्राणी हैं या उन्हें किसी अन्य ग्रह से भेजा गया है। तब शायद यह भी पता चलजाए कि जिन्हें हम अभी तक सामान्य प्राणी समझते थे वह तो किसी और ग्रह का वासी है।

समझा जाता है कि किसी भी स्थान पर जीवन की उत्पत्ति के लिए गुरुत्वाकर्षण की जरूरत प्रमुख होती है। जीवन वहीं विद्यमान हो सकता है जहाँ गुरुत्वाकर्षण हो। इसलिए कि आकार और ऊँचाई पर गुरुत्वाकर्षण की अलग-अलग शक्तियाँ काम करती हैं। गुरुत्वाकर्षण जितना प्रबल होगाउत्पत्ति की संभावनाएँ उतनी ही अधिक होगी। इसलिए कि किसी भी वस्तु की ऊपरी और निचली सतह पर यह अलग-अलग तरह से प्रभावी होता है। अब यदि विभिन्ना ग्रहों पर गुरुत्वाकर्षण की स्थिति को आँका जाए तो यह भी एक समान नहीं होती। प्लूटो पर गुरुत्वाकर्षण की स्थिति पृथ्वी के मुकाबले 500 गुना कम होती है जबकि जुपिटर पर यह 300 गुना अधिक होती है। अब ये एक्सोबायलॉजी के लिए खोज का विषय है कि इन ग्रहों पर जीवन की संभावनाएँ कैसी हैं।

गुरुत्वाकर्षण की तरह तापमान भी जीवन की उत्पत्ति में प्रभावी होता है। वैज्ञानिक भी इस बात पर एकमत हैं कि सिर्फ पानी की मौजूदगी को जीवन होने का आधार नहीं माना जा सकता, इसलिए कि जब तक पानी अपने तरल रूप में नहीं होगा, वह जीवन के लिए बेमतलब है।

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पानी केतरल रूप का तात्पर्य है तापमान की मौजूदगी। सीधे शब्दों में कहें तो उन्हीं ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं की खोज की जाना ठीक होगा जहाँ सूर्य की गर्मी या (रोशनी) पहुँचती होगी क्योंकि तभी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होगी जो वनस्पति को जीवित रखेगी। ऐसी स्थिति में जीवन तो वहीं हो सकता है जहाँ पृथ्वी जैसा वातावरण और पर्यावरण मौजूद हो।



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