प्यार का सुनहरा अवसर

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वेलेंटाइन-डे हमारे देश को विदेशों से मिली कई प्रथाओं में से एक है, जिसे हमारी युवा पीढ़ी ने अपनी सुविधा के अनुसार ढाल कर अपनाया है। दरअसल दुर्भाग्य की बात यह है कि हमने वेलेंटाइन-डे के पीछे छुपे उद्देश्य को समझे बिना ही इसका अनुसरण किया है।

यह दिन इटली देश के एक महान व्यक्तित्व संत वेलेंटाइन की याद में मनाया जाता है, जो एक पादरी थे और चाहते थे कि सभी प्रेमियों को अपनी मंजिल अर्थात उनका जीवन साथी मिलना ही चाहिए।

दुःख की बात यह है कि आज ज्यादातर युवा इस दिन को फैशन व ट्रेंड मानकर अपने बनावटी प्रेम का प्रदर्शन करते हैं। कुछ वर्ग समाज का ऐसा भी है जो बिना सोचे-समझे इसका विरोध करते हैं, क्योंकि यह एक विदेशी परंपरा है। हमें यह समझना होगा कि यह दिन एक सुनहरा अवसर है, अपने प्रियजनों को अपनी जिंदगी में उनकी अहमियत बताने की और रिश्तों की वह खूबसूरती जो रोजाना के कार्यों में कहीं धुँधली हो गई है उसे फिर से निखारने की।

वेलेंटाइन डे प्यार करने वालों के लिए प्यार का इजहार करने का दिन माना जाता है। अब सवाल यह उठता है कि प्यार का इजहार करने के लिए क्या हमें वेलेंटाइन डे का इंतजार करना चाहिए? क्या प्यार के इजहार के लिए खास दिन की आवश्यकता है? नहीं न! फिर वेलेंटाइन डे को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?
  वेलेंटाइन-डे हमारे देश को विदेशों से मिली कई प्रथाओं में से एक है, जिसे हमारी युवा पीढ़ी ने अपनी सुविधा के अनुसार ढाल कर अपनाया है। दरअसल दुर्भाग्य की बात यह है कि हमने वेलेंटाइन-डे के पीछे छुपे उद्देश्य को समझे बिना ही इसका अनुसरण किया है।      


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इन दिनों फूलों, कार्डों और अन्य उपहारों की खूब खरीदी-बिक्री होती है। इस व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष वर्ग वेलेंटाइन डे जैसे अवसरों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान कर रहा है या फिर आज की पीढ़ी को अपने प्यार को इजहार करने के लिए किसी विशेष दिन की जरूरत पड़ने लग गई है। जिन दिनों वेलेंटाइन डे नहीं मनाया जाता था, तब क्या प्यार नहीं होता था या प्यार का इजहार नहीं होता था। क्या प्यार के इजहार के लिए शुभकामना संदेश या उपहार जरूरी है?

शायद कोई भी प्यार जैसे सुंदर जज्बात के विरोध में नहीं होगा लेकिन इसका विरोध तो इसके मनाने के तरीके को लेकर है। लेकिन औरों की नजर से देखें तो कोई एक दिन प्यार के इजहार के लिए नहीं होता। वह तो हर दिन, हर पल, कहीं भी, किसी भी वक्त किया जा सकता है। जिस तरह पानी के बहाव में हर चीज बहती चली जाती है, आज के युवा सही-गलत का फैसला किए बिना समय के बहाव में बहते चले जा रहे हैं। जरूरत उन्हें सही रास्ता दिखाने की है।

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उनकी सोच को सही दिशा देने में माता-पिता की अहम भूमिका होती है। अगर वे चाहें तो अपने बच्चों को भटकने से रोक सकते हैं। यह तभी संभव है, जब वे बच्चों से खुलकर बातें करेंगे, उन्हें सही और गलत के बीच का फर्क समझाएँगे। अगर माता-पिता में हिचक होगी, तो बच्चों को सही रास्ता कौन दिखाएगा?



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