अपने ही शहर में बेगाने हैं मिर्जा ग़ालिब

आगरा| भाषा|
हालांकि ने अपनी आखिरी सांस दिल्ली में ही ली, लेकिन आगरा में जन्म लेने के कारण वे आगरावासी ही रहे लेकिन आज उनकी स्मृतियां आधुनिक चकाचौंध में खत्म होती नजर आ रही हैं।


तिलस्मी खजाने के मानिंद शायरी करने वाले ग़ालिब की शायरी वर्षों गुजर जाने के बाद भी खत्म न होने वाला पैगाम देती है। ग़ालिब को उर्दू का पहला दानीश्वर शायर कहा जाता है। उनका लिखा, 'दीवाने ग़ालिब' आज साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र ग्रंथ का स्थान ले चुका है।

आगरा की सरजमीं के ग़ालिब आज अपने ही शहर में बेगाने से हो गए हैं। आगरा द्वारा बेगानापन दिखाए जाने पर मिर्जा का शेर- 'दिले नादान तुझे हुआ क्या है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है' और 'हमको उनसे है वफा की उम्मीद जो नहीं जानते वफा क्या है' आज बिलकुल सटीक बैठता है। (भाषा)



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