अपने ही शहर में बेगाने हैं मिर्जा ग़ालिब

आगरा| भाषा|
मात्र 10 वर्ष की उम्र में ही बेमिसाल शायरी करने वाले मिर्जा ने अपने शायराना सफर को अशद उपनाम से शुरू किया, जिसे बाद में सारी दुनिया ने के नाम से पुकारा।


13 वर्ष की उम्र होते-होते वे आगरा छोड़ दिल्ली चले गए, जहां उनकी शादी नौ अगस्त 1810 को दिल्ली के प्रसिद्ध शायर इलाही बख्श खां मारूफ की बेटी उमराव बेगम से हुई इसलिए दिल्ली वाले उन्हें मिर्जा नौशा भी कहते थे।

मिर्जा को मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर की ओर से नजमुद्दौला, दबीरुलमुल्क, निजाम जंग की उपाधियां भी मिली थीं, लेकिन बहादुर शाह जफर के पतन के साथ ही मुगल सल्तनत धीरे-धीरे समाप्त हो गई, जिससे मिर्जा साहब की तकलीफें बढ़ती गईं।

वर्ष 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज हुकूमत ने मिर्जा साहब की पेंशन तक बंद कर दी। अपने आखिरी दिनों की तकलीफ मिर्जा साहब ने अपने शेरों में बयां की है।


उन्होंने लिखा कि दमें वापिस व सरे राह है, अजीजो अब अल्लाह ही अल्लाह है। मिर्जा कभी भी सही बात कहने में नहीं चूके। यही कारण है कि दुनिया के प्रति अपने व्यावहारिक दृष्टिकोण से मिर्जा ने जन्नत की हकीकत को भी बादशाह से बयान करने में गुरेज नहीं किया। उन्होंने कहा, हमको मालूम है जन्नत की हकीकत, लेकिन दिल बहलाने को ग़ालिब यह भी ख्याल अच्छा है।

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