खबर जिसने लादेन को बदल दिया

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1991 खत्म होते-होते एक बार फिर ऐसी स्थितियाँ बन गईं कि उसे घर छोड़ना पड़ा। एक कल्पनाशील इंजीनियर, एक तेज दिमाग व्यवसायी को फिर से हाथों में क्लाशनिकोव थामनी पड़ी। खूबसूरत से खूबसूरत घर का नक्शा बनाने वाले लादेन को घरों को उजाड़ने के अभियान में निकलना पड़ा।


दरअसल हुआ यह कि 1990 में जब इराक के सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्जा कर लिया तो सऊदी अरब ने इराक की भर्त्सना की। इस पर इराक ने सऊदी अरब को भी धमकी दी। लादेन को ये दोनों ही बातें बहुत खराब लगीं। एक तो उसे इराक का कुवैत पर कब्जा करना घोर साम्राज्यवादी रवैया लगा। उससे भी अपमानजनक बात सद्दाम हुसैन द्वारा अपने देश को धमकाना लगी। सद्दाम हुसैन के इस रवैये से लादेन तमतमा गया। उसने सऊदी अरब के शाह फहद के साथ तुरंत एक बैठक की और अपने देश की रक्षा के लिए अपनी सेवाएं देने की पेशकश की।
लादेन उन दिनों मकतब-अल-खिदमत नामक एक संगठन चला रहा था। इस संगठन का खुले तौर पर उद्देश्य तो जनकल्याण था, लेकिन इस जनकल्याण की ओट में असली मकसद इस्लाम की प्रतिष्ठा के लिए पूरी दुनिया में लड़ रहे अतिवादी सशस्त्र इस्लामिक संगठनों को आर्थिक सहायता मुहैया करना था। यह संगठन एक तरह से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से एकत्र हुए मुजाहिदिनों की फौज था, जिसमें सबसे ज्यादा संख्या अफगानी मुजाहिदिनों की थी।
जिस समय लादेन ने शाह फहद से अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की थी, उस समय इस संगठन के नियंत्रण में दुनिया के तमाम देशों में 8 से 10 हजार सशस्त्र मुजाहिदीन लड़ रहे थे। इन देशों में बोस्निया, सोमालिया, अल्जीरिया, चेचन्या, अफगानिस्तान, फिलीपींस, जोर्डन, सूडान, मिस्र, फिलिस्तीन से लेकर भारत में कश्मीर तक शामिल था। इन मुजाहिदीन लड़ाकों के पास हालांकि इराक की नियमित सेनाओं की तरह बख्तरबंद डिवीजनें और ताकतवर हवाई सैन्य व्यवस्था नहीं थी, लेकिन लड़ने-मरने का जीवट और निजी तौर पर चलाए जाने वाले हथियारों मसलन- असाल्ट राइफलों, रॉकेट लांचरों, बारूदी सुरंगों और छोटी क्रूज मिसाइलों का विशाल भंडार था।
इतिहास गवाह है कि इन्हीं हथियारों से इन मुजाहिदिनों ने दुनिया की सबसे योग्य और प्रशिक्षित सोवियत सेना को अंततः अफगानिस्तान छोड़कर जाने के लिए बाध्य कर दिया था। लेकिन इस इतिहास के बावजूद सऊदी अरब के शाह परिवार को लादेन के बजाए अमेरिका पर भरोसा करना ज्यादा उचित लगा। शाह फहद ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई और देखते ही देखते अमेरिकी सैनिक और उनकी अगुवाई में कई योरपीय देशों के सैनिक सऊदी अरब आ पहुंचे।
ओसामा बिन लादेन को यह बात बुरी तो लगी, लेकिन यह कोई ऐसी बात नहीं थी कि इसके विरोध में वह अपने जीवन का रास्ता एक बार फिर से बदलने का फैसला ले लेता। आखिर इराक की संगठित सेना से अपने मुजाहिदिनों की तुलना की वास्तविकता को वह भी जानता था। इसलिए लादेन ने शाह के इस फैसले को कोई बहुत तूल नहीं दिया। हालाँकि ओसामा उन दिनों तक सऊदी अरब में एक लोकप्रिय हस्ती बन चुका था। इसलिए यह बात फैलते देर नहीं लगी कि लादेन की पहल को ठुकराकर शाह ने अमेरिका से सुरक्षा की मांग की है। खाड़ी के अखबारों ने इस विषय को खूब तूल दिया।
अखबारों द्वारा इस बात को बहुत महत्व दिए जाने के कारण धीरे-धीरे सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों में भी इस मामले को लेकर दो पक्ष उभरने लगे। एक पक्ष ऐसे लोगों का था जो यह मानते थे कि शाह ने लादेन की पहल को ठुकराकर गलत किया है। उसके मुताबिक लादेन इस्लामी दुनिया का एक लोकप्रिय और सम्मानित धार्मिक नेता है।

पूरी इस्लामिक दुनिया जानती है कि वह धर्म के प्रति प्रतिबद्ध और ईमानदार है। इसलिए लादेन की एक आवाज पर लाखों युवक आ जाते और इराक को अपनी औकात याद आ जाती। लेकिन एक और पक्ष था जो यह कह रहा था कि शाह ने लादेन की जगह अमेरिकी फौजों पर यकीन करके देश के हित में ही काम किया है।
मगर लादेन अपने पक्ष-विपक्ष की इन बातों को लेकर आमतौर पर उदासीन ही था। लेकिन तभी एक बड़ी घटना घट गई। खाड़ी देशों के मशहूर अंग्रेजी दैनिक 'खलीज टाइम्स' ने एक सनसनीखेज खबर छापी। अखबार के मुताबिक सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए आए अमेरिकी सैनिकों को यहौ की सरकार ने कई दर्जन औरतें उपलब्ध कराई हैं, ताकि देश से दूर रह रहे इन सैनिकों की 'सेक्सुअल जरूरतों' को पूरा किया जा सके।
इस खबर से न केवल लादेन और उसके साथी, बल्कि वे तमाम लोग जो सऊदी अरब को इस्लाम की पवित्र भूमि मानते हैं, आग-बबूला हो गए। सऊदी सरकार ने हालांकि इस खबर का खंडन किया लेकिन दूसरे ही दिन 'खलीज टाइम्स' और 'नवा-ए-वक्त' जैसे अखबारों ने लाल सागर के किनारे लड़कियों के साथ चुहलबाजी करते कुछ अमेरिकी सैनिकों के नंगे बदन चित्र छाप दिए।

एक और अखबार ने तो लाल सागर की सुनहरी बालू में स्थानीय लड़कियों के साथ लेटकर धूप स्नान का लुत्फ ले रहे कुछ सैनिकों के चित्र भी छाप दिए। इस सबसे लादेन बौखला गया। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वह शाह फहद से मिला और इस मामले में अपनी कड़ी आपत्ति जताई। शाह ने उससे कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। अखबार अपनी बिक्री के लिए शगूफे छोड़ रहे हैं।
तब लादेन ने खुद इस मामले की सचाई जानने का निश्चय किया। वह अपने चार पांच सशस्त्र साथियों को साथ ले एक बुलेट प्रूफ जीप में लाल सागर की तरफ निकल गया, जहां पर अमेरिकी सैनिकों का जमावड़ा था। वह जेद्दाह से लेकर यमन की खाड़ी तक गया और जहाँ-जहाँ भी अमेरिकी या उनके नेतृत्व में दूसरे यूरोपीय देशों के सैनिकों का जमावड़ा था, हर जगह उसे बहुत ही आपत्तिजनक दृश्य देखने को मिले। वे खुल्लम-खुल्ला स्वच्छंद यौनाचार कर रहे थे। अमेरिकी सैनिक इस्लाम द्वारा निषिद्ध हर आचरण कर रहे थे। मैडोना के अश्लील कैसेट बजा रहे थे, सिगरेट और शराब पी रहे थे तथा इस्लाम और अरब की परम्पराओं का मजाक उड़ा रहे थे।
इन विदेशी सैनिकों की हद यह थी कि उन्होंने मक्का जैसे तीर्थस्थल तक की पवित्रता को मिट्टी में मिला दिया था। गौरतलब है कि सऊदी अरब के होजाप्रांत में ही मुसलमानों के दो सबसे ज्यादा पवित्र तीर्थस्थल मक्का और मदीना स्थित हैं। मदीना वह जगह है, जहाँ पर 7 जून 632 ई. को पैगम्बर मुहम्मद साहब को दफनाया गया था और मक्का वह जगह है जहाँ मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था।
लादेन इन पापाचारों को देखकर भड़क उठा। उसने शाह फहद से साफ-साफ कहा कि वे अमेरिकी सैनिकों को इस्लामी उसूलों के तहत रहने के लिए कहें, लेकिन सैनिक भला कहां सुनते हैं? वह भी एक ऐसे आदमी की बात, जो उन्हीं की बदौलत सुरक्षित हो! अमेरिकी सैनिकों के मन में वैसे भी मुसलमानों के लिए कोई सम्मान नहीं था, फिर अरब के शाह तो उनके देश के लगभग गुलाम की तरह थे।
इधर शाह को ओसामा द्वारा इस मामले को तूल देना बहुत खराब लग रहा था। क्योंकि इससे देश में अमेरिकी सैनिकों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा था। चूँकि अमेरिकी सैनिकों को शाह ने बुलाया था, इसलिए लोगों में शाह के प्रति भी गुस्सा बढ़ रहा था। शाह को लगा कि लादेन की हरकतें अगर बढ़ती रहीं तो देश की जनता उसके विरुद्ध हो जाएगी।

वैसे भी वर्षों से कुछ प्रगतिशील संगठन शेखवाद के विरुद्ध आंदोलन कर ही रहे थे। इस नजरिए से लादेन, शाह को एक खतरनाक आदमी लगा, क्योंकि सऊदी अरब में ओसामा बिन लादेन एक ख्यातिप्राप्त व्यक्ति था। लोग उसे सच्चा इस्लामी और मुसलमानों के हितैषी के रूप में जानते थे। शाह को लगा कि अगर ओसामा ने उनके विरुद्ध विद्रोह का परचम थाम लिया तो देखते ही देखते सऊदी अरब में इस्लामी क्रांति हो जाएगी।
जिसकी मदद की उसे ही मारने पर उतारू हुआ अमेरिका : शाह ने मामले की नजाकत को समझते हुए अपने अत्यंत वफादार सैनिक अधिकारियों की एक बैठक की और उन्हें लादेन तथा लादेन के नेटवर्क को तहस-नहस कर देने का आदेश दे दिया। शाह के इस फैसले को अमेरिकी सैनिक अधिकारियों का भी समर्थन था क्योंकि बदली हुई परिस्थितियों में अमेरिका को लादेन एक समस्या लग रहा था। दरअसल जब तक सोवियत संघ का वजूद था, तब तक सोवियत संघ अमेरिकी हितों के लिए एक गंभीर खतरा था।
ऐसे में हर वह व्यक्ति, विचार अथवा व्यवस्था अमेरिका के हितों की रक्षक थी या अमेरिका उसे अपने हितों के रक्षार्थ पोषित-पल्लवित करता था, जो सोवियत संघ के विरुद्ध संघर्ष करे और उसे उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध हो। इसलिए सोवियत फौजों से लड़ने के दिनों में लादेन अमेरिकी आंख का तारा था। सीआईए के एजेंट, यहां तक कि सीआईए के महानिदेशक तक लादेन से गर्मजोशी से मिलते थे। न जाने कितने अमेरिकी अधिकारी गुप्त रूप से इस मुजाहिदीन से मिलने आते थे और न जाने कितनी सुविधाएँ उसे मुहैया कराते थे।
मगर अब सोवियत संघ खत्म हो चुका था। अफगानिस्तान से लाल फौजें कूच कर गई थीं। ऐसे में लादेन की अमेरिकी हितों के रक्षार्थ जो भूमिका थी, वह खत्म हो गई थी। इसलिए लादेन अब अमेरिका के लिए कोई कीमत नहीं रखता था। उल्टे अब लादेन अमेरिका के हितों के लिए खतरा बनकर उभर रहा था क्योंकि वह खाड़ी में अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति का विरोध कर रहा था। वह खाड़ी में अमेरिकी रसूख को कम करना चाहता था। वह और उसका संगठन ऐसे संगठनों की मदद भी करते थे, जो खाड़ी देशों के शेखों के विरुद्ध आंदोलनरत थे।
कुल मिलाकर ऐसी स्थितियाँ बन गई थीं कि अरब के शासकों और अमेरिका दोनों के लिए ही लादेन अचानक समस्या बनकर उभर आया था। अरबी शासकों के लिए लादेन अचानक समस्या इसलिए था क्योंकि वह उनके इस्लाम विरोधी चेहरे को बेनकाब कर रहा था। उसको ऐसा करते रहने देने का मतलब था, जनता की बगावत झेलना, क्रांति से जूझना और अंततः सत्ता से हाथ धो बैठना। उसको बढ़ते रहने देने का मतलब था, अरब की सरजमीं से शेखडम के पाँव उखाड़ना।
यही कारण थे कि लादेन को लेकर अमेरिका और सऊदी शाह रातों-रात एक हो गए। लादेन और उसके साथियों को ठिकाने लगाने की जो योजना सऊदी सरकार ने बनाई, उसे अमेरिकी फौज और खाड़ी में मौजूद अमेरिकी फौज के खुफिया तंत्र ने हर तरह से मदद की, लेकिन लादेन का खात्मा करना इतना आसान नहीं था। वह शाह और अमेरिकी फौज के मुकाबले कहीं ज्यादा चौकन्ना साबित हुआ। आखिर उसने 12 सालों तक सोवियत संघ की ताकतवर सेना के विरुद्ध सफल छापामार लड़ाई लड़ी थी।
केजीबी के एक से एक तेज दिमाग जासूसों से उसका पाला पड़ा था लेकिन ये सब उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाए थे। लादेन उसी समय हर संभावित नतीजे को भाँप गया था, जब वह पहली बार शाह से अमेरिकी फौजों के कुकृत्यों की शिकायत करने गया था। उसी समय से लादेन और उसके साथी यह मान गए थे कि एक दिन शाह और अमेरिकी फौजें दोनों उसके विरुद्ध एक हो जाएंगे। ऐसे में क्या करना चाहिए। इसकी तैयारी लादेन और उसके साथियों ने उसी समय से शुरू कर दी थी।
लादेन का निजी खुफिया तंत्र उसी समय से पल-पल की गतिविधि पर नजर रख रहा था। जिस समय सऊदी सरकार और अमेरिकी फौज ने यह निर्णय लिया कि लादेन और उसके संगठन को नेस्तनाबूद कर दिया जाए, उस समय लादेन अपने परिवार और कुछ वफादार अंगरक्षकों के साथ लीबिया की राजधानी ट्रिपोली पहुंच गया था। इस तरह लगभग डेढ़ सालों तक गैर आतंकवादी, सामान्य जीवन जीने के बाद लादेन एक बार फिर से घुमंतू गुरिल्ला जीवन से दो-चार था।
पहले और अब के जीवन में फर्क सिर्फ दुश्मनों का था। पहले दुश्मन सोवियत सेनाएं थीं मगर इस बार दुश्मन वे लोग थे, जो कल तक उसके साथ थे बल्कि कहना चाहिए कि इन्हीं लोगों ने उसे इस्लाम के नाम पर, इस्लाम के लिए लड़ने वाला इतना खूंखार योद्धा बनाया था लेकिन वक्त की बात है कि लादेन को इन्हीं के विरुद्ध हथियार उठाना पड़ा क्योंकि ये लोग कह कुछ रहे थे, इनकी असलियत कुछ और थी।



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