गुरु बिना जीवन की कल्पना असंभव

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गुरु बिना जीवन की कल्पना ही असंभव है। आप किसी भी क्षेत्र में हों किसी भी आयु वर्ग के हों, किसी भी स्तर पर हों अपने आसपास देखेंगे तो पाएँगे कि कोई न कोई आपका गुरु जरूर है। जिस प्रकार मनुष्य बगैर समाज के नहीं रह सकता, उसी प्रकार हरेक व्यक्ति के जीवन में गुरु की भूमिका में कोई होता है। साथ ही कहीं वह खुद किसी का गुरु होता है।

स्कूली जीवन में शिक्षक, ऑफिस लाइफ में बॉस या वरिष्ठ सहकर्मी, प्रौढ़ावस्था में कोई अन्य बुजुर्ग, आत्मिक शांति के लिए बनाए गए साधु-संत आदि गुरु का ही रूप हैं।

कोई भी कार्य करने के लिए कदम-कदम पर आपको मार्गदर्शक की जरूरत होती है। छोटे से छोटे से लेकर बड़े से बड़ा काम भी बगैर मार्गदर्शन के कैसे पूर्ण होगा। कंकड़ के ढेर में मोती जैसा आपको चमकाने का कार्य गुरु का होता है।

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विशाल मिश्रागीता ज्ञान बिना कुछ ाहीजीवन गुरु बिन कुछ नाही
भीतर से सहारा देकर ऊपर से चोट मारकर जैसे कुम्हार मिट्‍टी का बर्तन बनाता है, उसी प्रकार गुरु हमें इस जीवन रूपी चुनौती के लिए तैयार करते हैं। गुरु पर पूर्ण श्रद्धा निश्चित रूप से आपको उन्नति के मार्ग पर ले जाती है। वर्तमान के परिदृश्य को देखते हुए ‍यदि किसी व्यक्ति में आस्था नहीं जागती तो ईश्वर को ही अपना गुरु मान लें। जीवन के सारे दुख-दर्द चुटकियों में छूमंतर हो जाएँगे।



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