शिक्षक दिवस कल और आज...

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समय बदला है, मूल्‍य नही
इस बारे में राजस्‍थान के चित्तौड़गढ़ की शिक्षिका सुरेखा शर्मा कहती हैं कि आज भी समाज में शिक्षकों के प्रति सम्‍मान बरकरार है। मुझे लगता है कि समय के साथ-साथ छात्रों का आभार प्रकट करने का तरीका बदल गया है लेकिन मूल भावना आज भी वैसी ही है, जैसी पहले हुआ करती थी। मैंने महसूस किया है कि अक्‍सर स्‍कूल या कॉलेज छोड़ देने के बाद विद्यार्थियों को अपने शिक्षकों के प्रति जुड़ाव महसूस होता है। यही एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि भी होती है कि सैकड़ों बच्‍चे उम्रभर उसकी स्‍मृतियों को सँजोए रखते हैं।

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शिक्षक और छात्र दोनों के मन में हो विश्वास
जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत माया मालवीय का कहना है कि आज यदि हम यह कहते हैं कि समाज में शिक्षकों के प्रति सम्‍मान घटा है, तो हमें इसके कारणों की भी पड़ताल करनी होगी। जहाँ शिक्षकों ने अपने कार्य के प्रति समर्पण कम किया है वहीं उनके प्रति सम्‍मान में कमी आई है लेकिन जो शिक्षक आज भी विद्यादान के प्रति समर्पित हैं उन्‍हें अपने विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से सम्‍मान मिल रहा है।

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आत्‍मविश्‍लेषण करें शिक्षक
विगत दस वर्षों से शिक्षा जगत से जुड़ी मौसमी जोशी का कहना है कि शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को भी आत्‍मविश्‍लेषण करना चाहिए। अगर आज समाज में‍ शिक्षकों का सम्‍मान कम हुआ है तो इसके लिए कुछ हद तक जिम्‍मेदार शिक्षक भी हैं। आज शिक्षा महँगी जरूर हो गई है लेकिन उसके मूल्‍य घट रहे हैं। मैंने कई बार अनुभव किया कि खुद शिक्षक ही छात्रों को पढ़ाने में अक्षम्‍य गलतियाँ कर रहे हैं। ऐसे में यदि उनके प्रति सम्‍मान कम होता है तो इसकी जिम्‍मेदारी छात्रों पर या समाज पर नहीं थोपी जा सकती है।

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तोहफे नहीं भावनाओं का महत्‍व
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित हो चुकी शिक्षिका संगीता विनायका का मानना है कि आज के बच्‍चे सेलिब्रेशन पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हैं, उनके लिए शिक्षक दिवस एक कार्यक्रम की तरह है। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज भी विद्यार्थियों के मन में अपने शिक्षक के प्रति सम्‍मान है। यदि शिक्षक अपने विद्यार्थियों से दिल से जुड़े हों तो बदले में उन्‍हें अपने विद्यार्थियों से भी बेहद प्‍यार और सम्‍मान मिलता है।

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शिक्षक शब्द से जुड़ी गरिमा को पहचाने
नूपुर दीक्षित|
कहते हैं कि शिक्षक उस मोमबत्ती की तरह होता है, जो खुद जलकर दूसरों को प्रकाश देती है। भारतीय संस्‍कृति में गुरु को ईश्‍वर से भी श्रेष्‍ठ बताया गया है क्योंकि ईश्‍वर तक पहुँचने का या पाने का मार्ग गुरु द्वारा ही बताया गया हैशब्‍दों के इस मायाजाल से परे आज के शिक्षक आज स्‍वयं के बारे में, ‘शिक्षक दिव’ के बारे में क्‍या सोचते हैं? यही जानने का हमने किया एक प्रयास।
तेईस वर्षों से शिक्षण कार्य से जुड़ी हेमा दीक्षित का मानना है कि छात्र, शिक्षक का सम्‍मान करते हैं या नहीं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शिक्षक के साथ किसी छात्र का अनुभव कैसा है? यदि शिक्षक छात्रों के मनोभावों का समझें और उनके स्‍तर पर जाकर उन्‍हें कुछ ‍सिखाने या समझाने की कोशिश करे तो उसे भी अपने विद्यार्थियों से बहुत इज्‍जत और प्‍यार मिलता है। दूसरी ओर शिक्षकों को भी चाहिए कि वे ‘शिक्ष’ शब्‍द के साथ जुड़ी गरिमा और उत्‍तरदायित्‍व को समझें और छात्र को केवल पाठ ना पढ़ाए, उसे जीने का सलीका ‍िसखाएँ।



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