मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस तरह गुरु तेग बहादुर पर किए थे अत्याचार, चांदनी चौक पर हुआ था बलिदान

guru tegh bahadur
Last Updated: शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022 (19:42 IST)
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पीएम नरेंद्र मोदी ने सिखों के नौंवें गुरु, गुरु तेगबहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर लालकिले पर आयोजित एक समारोह के दौरान बलिदान के प्रतीक गुरुद्वारा शीशगंज साहिब का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश में मजहबी कट्टरता की आंधी आई थी, जिन्होंने धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी थी। उस समय भारत को अपनी पहचान बचाने के लिए एक बड़ी उम्मीद गुरु तेग बहादुर के रूप में दिखी थी। औरंगजेब की आततायी सोच के सामने उस समय गुरु तेग बहादुर ‘हिन्द दी चादर’ बनकर, एक चट्टान बनकर खड़े हो गए थे।’... आओ जानते हैं इसी संदर्भ में कि आखिर औरंगजेब ने मजहबी कट्टरता के चलते क्या किया था।


1. औरंगजेब के काल में गुरु तेग बहादुर सिंहजी सिखों के नौवें गुरु थे, जिनका जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में 18 अप्रैल सन् 1621 में हुआ हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता से शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा ग्रहण कर ली थी। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया था।

2. सिखों के 8वें गुरु, गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु हो जाने की वजह से गुरु तेग बहादुर जी को जनमत से गुरु बनाया गया था। गुरु बनते ही उन पर देश और धर्म की रक्षा की बड़ी जिम्मेदारी आ गई। तेग बहादुर सिंह 20 मार्च, 1664 को सिक्खों के गुरु नियुक्त हुए थे। उनके पिता का नाम गुरु हरगोविंद सिंह और माता का नाम नानकी जी था। उनके पिता सिखों के 6वें गुरु थे।

3. मुगलकाल के अंतिम दौर में औरंगजेब का आतंक था। 31 जलाई 1658 को औरंगजेब मुगल बादशाह बना तभी से आतंक का दौरा प्रारंभ हो गया। उसने ही वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा का केशवराय मंदिर तुड़वाया था। उसने जहां वीर छत्रपति शिवाजी के राज्य को हड़पने का प्रयास किया वहीं उसने सिख साम्राज्य को ध्वस्त करने का कार्य भी किया। उसने गुजरात और मध्यप्रदेश में भी आतंक मचा रखा था। औरछा की रानी सारंधा ने भी मुगल सेना से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त किया था।

4. औरंगजेब के अत्याचार से उसके शासन क्षेत्र की सभी हिन्दू जनता त्रस्त थी। उसने हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया था। खासकर उसने यह आदेश पारित कर दिया था कि सभी ब्राह्मणों का सफाया कर दिया जाए। जो जितनी जनेऊ लाएगा उसे उतनी स्वर्ण अशर्फिया दी जाएगी। इस तरह औरंगजेब से पूरा भारत त्रस्त्र था। उसी दौर में उसने कश्मीरी पंडितों के सफाए का फरमान भी जारी किया था। उसने कश्मीर के सूबेदार इफ्तार खान को ये आदेश किया कि कश्मीर में एक भी हिन्दू बचना नहीं चाहिए। यह बात 1674 और 1675 के बीच की है।
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5. उस काल में औरंगजेब ने यह फरमान जारी कर दिया था कि 'सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें।' उसके इस फरमान के चलते ही उसके शासन क्षेत्र की हिन्दू जनता में भय व्याप्त हो गया। उसके आतंक का शिकार सबसे पहले कश्मीरी पंडित हुए। पंडित कृपाराम दत्त के नेतृत्व में कश्मीरी पंडितों का एक दल आनंदपुर में गुरु तेग बहादुर के पास अपनी रक्षा के लिए पहुंचा और उन्होंने गुरुजी से कहा कि आप हमारे प्राणों की रक्षा करें। उन्होंने गुरुजी को अपनी व्यथा सुनाई। उस समय वहां पर गुरुजी के 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) भी थे। पंडितों की व्यथा सुनकर उन्हें भी बड़ा दु:ख हुआ और उन्होंने अपने पिता से पूछा इसका हल कैसे होगा। इस पर गुरुजी ने कहा कि जब कोई महान पुरुष बलिदान दें।

पिता की यह बात सुनकर बाला प्रीतम ने उत्तर दिया:- आपसे महान कौन हो सकता है। यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएं विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।

6. बाला प्रीतम की यह बात सुनकर गुरु की बहुत प्रसन्न हुए और इसके बाद गुरु तेग़ बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह ‍दें कि यदि वो गुरु तेग़ बहादुर से धर्म परिवर्तन कराने में सफल रहा तो उनके बाद हम सभी भी खुशी खुशी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग़ बहादुर जी से धर्म परिवर्तन कराने में सफल नहीं रहे तो फिर हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे'।

7. औरंगज़ेब ने जब गुरुजी की यह बात सुनी तो वह क्रोधित हो गया। उसने मुगल सेना को आदेश दिया कि गुरुजी को बंधक बनाकर पेश किया जाए। बाद में गुरुजी दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए। औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग़ बहादुर जी नहीं माने तो उन्हें बंधक बनाकर उन पर भयानक अत्याचार किए गए। इसके बाद उनके दो शिष्यों को मुगलों के दरबार में ही जिंदा जलाकर मार डाला गया ताकि गुरु तेग़ बहादुर जी पर दबाव बनाया जा सके, लेकिन गुरुजी नहीं झुके। फिर उन्होंने औरंगजेब से कहा- 'यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए।'

8. गुरुजी की बातें सुनकर औरंगजेब आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग़ बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवम्बर 1675 को हंसते-हंसते देश और धर्म के लिए बलिदान दे दिया। उनकी शाहादत के बाद संयुक्त पंजाब और कश्मीर में एक विद्रोह शुरु हो गया। गुरु तेग़ बहादुरजी की याद में उनके 'शहीदी स्थल' पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा 'शीश गंज साहिब' है।

9. गुरुजी की शहादन के बाद उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह को गुरु बनाया गया और गुरु गोविंद सिंह ने फिर खालसा पंथ की स्थापना की। गुरु गोविंद सिंह जी ने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया और उन्होंने धर्म की रक्षार्थ मुगलों से कई लड़ाइयां लड़ी। पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, दो पुत्रों का चमकौर के युद्ध में शहीद होना, आतंकी शक्तियों द्वारा दो पुत्रों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाना, वीरता व बलिदान की विलक्षण मिसालें हैं। गुरु गोविंदसिंह इस सारे घटनाक्रम में भी अडिग रहकर संघर्षरत रहे, यह कोई सामान्य बात नहीं है।



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