Shri Krishna 29 July Episode 88 : सुभद्रा को एक राक्षस ले उड़ता है आकाश में तब होता है अर्जुन से प्रेम का इजहार

karan and krishna
अनिरुद्ध जोशी|
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 29 जुलाई के 88वें एपिसोड ( Shree Episode 88 ) में कहते हैं- एक बार फिर से तुम अपनी मुरली सुना दो, बहुत दिन हुए तुम्हारी मुरली सुने। तब श्रीपुन: मुरली बजाने लग जाते हैं। फिर दाऊ भैया मुरली की धनु में गुम होकर आंखे बंद करके मगन हो जाते हैं। तभी कुछ देर बाद मुरली की धुन बंद होती है तो उनकी आंखें खुली है और वो देखते हैं कि कन्हैया तो नहीं है। वे पुकारने लगते हैं- कन्हैया...कन्हैया। फिर वे खड़े होकर जोर-जोर से कन्हैया...कन्हैया पुकारने लगते हैं तो शकुनि आकर पूछता है- दाऊजी इतनी रात गए आप किसे पुकार रहे हैं? इस पर बलराम कहते हैं शकुनि मामा यहां कन्हैया आया था। इस पर शकुनि हंसते हुए कहता है कि दाऊजी आपको कोई भ्रम हुआ होगा। वासुदेव तो द्वारिका में है।...नहीं नहीं वो यहां स्वयं आया था। तब शकुनि कहता है- मेरे विचार से तो आपने कोई सपना देखा होगा दाऊजी। बलरामजी असमंजस में पड़ जाते हैं।


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‍उधर, द्वारिका में श्रीकृष्ण की मुरली की धुन पर रुक्मिणी अपने शयनकक्ष से उठकर आती है और कहती है- भगवन! आज आपके मुरली के स्वर व्याकुल हो गए थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आप किसी को मना रहे हैं। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं देवी मैं तुमसे कुछ छुपा नहीं सकता। मैं दाऊ भैया को मना रहा था। उनसे विनति कर रहा था कि वे द्वारिका वापस लौट आए। यह सुनकर रुक्मिणी कहती हैं कि इसका अर्थ ये कि आप हस्तिनापुर होकर आएं हैं। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवी शकुनि मामा ने हमारे भोलेभाले दाऊ भैया को जाल में फंसाया है। इसीलिए मैं उन्हें सावधान करने गया था परंतु दाऊ भैया मेरी बात समझने के लिए तैयार ही नहीं है। भविष्य में अनर्थ होने वाला है उसी की चिंता मैं कर रहा था।
यह सुनकर रुक्मिणी कहती हैं आप भविष्य की चिंता कर रहे थे परंतु प्रभु कुछ वर्तमान की भी सोचिये। आपने कहा था कि सुभद्रा और अर्जुन का संबंध होगा परंतु मुझे तो उसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। दोनों के मन में आपकी माया ने प्रेम के बीज तो डाल दिए हैं परंतु आज तक दोनों अपने प्रेम को व्यक्त करने में संकोच कर रहे हैं तो संबंध कैसे होगा? मुझे तो विश्वास ही नहीं होता। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह संबंध तो अवश्य होने वाला है देवी। इस कौरव और पांडव वंश का जो महाविनाश होने वाला है उस महाविनाश के खंडहरों में एक ही फूल बचेगा और वह फूल सुभद्रा के गर्भ से पैदा होने वाला है, यही विधि का विधान है देवी।

यह सुनकर रुक्मिणी चौंक जाती है और कहती हैं- भगवन आज आप ऐसी निर्मम बातें क्यों कर रहे हैं? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- रुक्मिणी भविष्य में निर्मम संहार होने वाला है, भीषण युद्ध होने वाला है जिसमें भाई-भाई का प्राण हरण करेगा, पिता ‍पुत्र का, शिष्य गुरु को जीवित नहीं छोड़ेगा और गुरु शिष्य को। लहू के सारे नाते लहू से नहाएंगे। हां लहू के सारे नाते लहू से नहाएंगे रुक्मिणी। वास्तव भयंकर है महाभयंकर है। इसी संहार में कुरुकुल का विनाश अटल है। परंतु इसी कुरुकुल के एक फूल को बचाना चाहता हूं देवी। यह सुनकर रुक्मिणी कहती है- वो कैसे? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन और सुभद्रा का विवाह कराके।...सुभद्रा से ही कुरुकुल का वंश चलेगा।
तब रुक्मिणी कहती है- सुनकर संतोष हुआ भगवन! किंतु दोनों का मिलन करा दो। दोनों एक-दूसरे की तलाश में शिकार पर गए हैं। परंतु वो देखिये...देखिये एक पहाड़ी के इस ओर और दूसरा पहाड़ी के उस ओर। भगवन आप तो स्वयं प्रेम के अवतार हैं इन दोनों प्रेमियों पर दया कीजिये। इनका एकांत में मिलन करा दीजिये प्रभु। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- तुम चिंता न करो। देवी योगमाया मेरी सहायता करने आ रही है।
यह सुनकर रुक्मिणी पुन: अपने शयनकक्ष में सोने चली जाती है तब योगमाया आती है। योगमाया कहती है- मेरे लिए क्या आज्ञा है सर्वेश्वर। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम तो जानती हो योगमाया कि मेरी बहन सुभद्रा और अर्जुन आपस में मिलने के लिए तड़प रहे हैं। मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब किसी विचार का मेरे मन में स्फुरण मात्र होता है तो वह तुम्हारे मन पर अंकित हो जाता है तो जैसा हमारे विचार पटल पर चित्र बन रहा है वैसा ही समय के आंचल पर लिख दो। योगमाया कहती है- जो आज्ञा प्रभु।
तभी उधर, सुभद्रा के समक्ष एक विशालकाय दानव आकर खड़ा हो जाता है फिर वह बैठकर जोर-जोर से हंसने लगता है। यह देखकर सुभद्रा धनुष उठाकर उस पर तीर चलाती है लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं होता है। फिर सुभद्रा और उसकी दोनों सखियां जोर-जोर से चीखने लगती है- कोई बचाओ, कोई बचाओ। इस दौरान वह दानव सुभद्रा को रथ सहित उठा लेता है लेकिन उनकी सखियां नीचे कूदकर सुभद्रा से भी रथ से नीचे उतरने का कहती है लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती है।

दानव सुभद्रा को रथ सहित लेकर आकाश में उड़ जाता है और पहाड़ी के उस पार जाता है। उस पार वह अर्जुन के समक्ष आसमान में जाकर स्थिर हो जाता है। उसके हाथ में रथ रहता है। रथ पर सुभद्रा जोर-जोर से चीखती है- कृष्णा बचाओ..भैया बचाओ। तभी अर्जुन आसमान में देखता है तो यह देखकर दंग रहा जाता है और कहता है सुभद्रा!...सुभद्रा भी अर्जुन को देखकर करती है- पार्थ...पार्थ बचाओ मुझे।


फिर अर्जुन कहता है- ठहर दुष्ट ठहर। अपने प्राणों की रक्षा चाहता है तो सुभद्रा को छोड़ दें। यह सुनकर राक्षस कहता है- नहीं छोडूंगा। यदि तुम वीर हो तो करो सुभद्रा की रक्षा। मैं तो इसे लेकर ही जाऊंगा।... तब अर्जुन तीर चलाता है तो राक्षस गायब होकर दूसरी ओर प्रकट होकर हंसने लगता है। ऐसा कई बार होता है तब अर्जुन दिव्यास्त्र चलाकर उस दानव को घायल कर देता है तो वह रथ को भूमि पर रखकर अपनी माया से उसके चारों ओर आग लगा देता है और गायब हो जाता है। सुभद्रा चीखती है- पार्थ बचाओ मुझे..मेरी रक्षा करो। उस अग्नि की तपन से सुभद्रा बेहोश हो जाती है तो अर्जुन उसे रथ में से उठाकर दूसरी ओर ले जाता है।

फिर योगमाया अपनी माया से पास मैं ही एक सुंदर झरना और बगीचा निर्मित कर देती है। अर्जुन सुभद्रा को उठाकर वहां ले जाता है और चट्टान पर लेटाकर झरने से एक पत्ते में पानी भरकर लाता है और सुभद्रा को पानी पीलाकर होश में लाता है और कहता है सुभद्रा तुम ठीक तो हो? तब सुभद्रा कहती है- आप? ऐसा कहकर वह उठने लगती है तो अर्जुन उन्हें पकड़कर कहता है- अभी लेटी रहो, नहीं तो चक्कर आ जाएगा। फिर अर्जुन सुभद्रा को अपनी अंजुली से पानी पीलाता है और अपने अंगस्त्र से मुंह पोंछता है और तपीश वाले स्थान गीले वस्त्र से हाथ-मुंह आदि को गिला करता है। यह देखकर सभुद्रा को आनंद आ जाता है।

फिर दोनों में प्रेमपूर्ण वार्तालाप होता है और अंत में बातों ही बातों में दोनों एक दूसरे से प्रेम का इजहार कर देते हैं। इधर, श्रीकृष्ण रुक्मिणी को बताते हैं कि अब यह जान लो कि अर्जुन और सुभद्रा दोनों मिल गए हैं और सुभद्रा ने अर्जुन के जीवन रथ का सारथी बनना स्वीकार भी कर लिया है, आओ मेरे साथ। फिर श्रीकृष्ण और रुक्मिणी दोनों अपने कक्ष से उठकर गैलरी में खड़े हो जाते हैं तो श्रीकृष्ण बताते हैं वे देखों दोनों साथ आ रहे हैं।...

अर्जुन रथ से उतरकर सुभद्रा को कंधे से पकड़ता है तो सुभद्रा मुस्कुराकर उसे संकेतों से ऐसा करने से मना करती है फिर दोनों अलग अलग होकर महल में प्रवेश करते हैं।...यह देखकर गैलरी में श्रीकृष्ण के साथ खड़ी रुक्मिणी कहती है- अच्छा तो ये बात है परंतु सुभद्रा ने आपसे पूछे बिना ही हां कह दी। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- हां ये तो बात है। अच्छा ये बताओ जब तुम रथ पर बैठकर मेरे साथ कुंडलपुर से आई थीं तो क्या तुमने अपने भैया रुक्मी से पूछा था? यह सुनकर रुक्मिणी चुप होकर शरमा जाती है।
फिर उधर, अर्जुन और सुभद्रा दोनों महल में प्रवेश करते हैं तो रास्ते में अर्जुन सुभद्रा का हाथ पकड़ लेता है तो सुभद्रा कहती है- हमारा हाथ छोड़ दीजिये कोई देख लेगा तो क्या कहेगा? यह सुनकर अर्जुन कहता है कि हम एक बार किसी का हाथ पकड़ लेते हैं तो उसे जीवनभर नहीं छोड़ते हैं राजकुमारी जी। यह सुनकर सुभद्रा मुस्कुरा कर कहती है- चलो ये भी देख लूंगी परंतु इस समय तो छोड़ दीजिये। सामने भैया-भाभी का कक्ष है हम पर दया कीजिये। यह सुनकर अर्जुन कहता है- ठीक है आपकी जैसी आज्ञा।

फिर दोनों श्रीकृष्ण के कक्ष में प्रवेश करते हैं तो श्रीकृष्ण और रुक्मिणी दोनों उनका स्वागत करते हैं। रुक्मिणी सुभद्रा का हाथ देखकर कहती है अरे ये क्या हुआ, तुम्हारे हाथ पर ये पट्टीका कैसी? इस पर सुभद्रा सारा घटनाक्रम बताती है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- सुभद्रा की इस बात पर तुम्हारा क्या मत है पार्थ? तुम दोनों साथ-साथ जंगल में...यह सुनकर अर्जुन सकपकाकर कहता है- बात ये है कन्हैया कि मैं तो पहले ही शिकार पर जा चुका था। मुझे तो जब सुभद्रा की चीखें सुनाई दी तब मुझे पता चला कि सुभद्रा भी अरण्य में है। यह जानकर उस राक्षस का प्रतिकार कर दिया, बस। यह सुनकर रुक्मिणी कहती है- बस! तो फिर सुभद्रा के हाथ में ये पट्टीका किसने बांधी? यह सुनकर अर्जुन फिर सकपका जाता है और कहता है- मैंने। वो तो वन औषधियों से जो भी उपचार हो सकता था मैंने कर दिया। जय श्रीकृष्णा।
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