Shri Krishna 18 June Episode 47 : शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद बली ने क्यों दी तीन पग भूमि दान में?

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: शुक्रवार, 19 जून 2020 (11:31 IST)
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निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 18 जून के 47वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 47 ) में सांदीपनि ऋषि विष्णु के कच्छप और मोहिनी अवतार की कथा के बाद की कथा सुनाते हैं। पिछले एपिसोड में वामन अवतार के कथा की शुरुआत हुई थी।

फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है।

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यह सुनकर दानवीर राजा महाबली यज्ञशाल छोड़कर उन्हें दान देने के लिए उठते हैं तो शुक्राचार्य रोककर कहते हैं कि यज्ञ का मुहूर्त निकला जा रहा है। राजा कहते हैं कि जब तक मेरे राज्य में एक भी याचक है तो मैं यज्ञ कैसे कर सकता हूं? यह कहकर वह ब्राह्मण वेशधारी वामन के पास पहुंचकर उनसे कहते हैं कि कहो क्या चाहिए तुम्हें? तब वामन भगवान कहते हैं, राजन! आप भक्त प्रहलाद के पौत्र और महान आत्मा विरोचन के पुत्र हैं और आप स्वयं महान दानवीर हैं अत: यह ब्राह्मण आपसे अपनी यज्ञशाला के लिए तीन पग भूमि दान में मांगने आया है। यह सुनकर राजा महाबली हंसते हुए कहते हैं बस तीन पगभूमि? अरे मांगना हो तो एक राज्य मांग लो।
तभी वहां शुक्राचार्य आकर कहते हैं कि हे राजन! आपका अंतिम यज्ञ पूर्ण होने पर आप त्रिलोकी के राजा बन जाएंगे और यह जो ब्राह्ण है यह और कोई नहीं विष्णु है जो छल से आपके पास आए हैं। यह तीन पग में ही संपूर्ण लोक को नाप देंगे। राजा महाबली यह सुनकर कहते हैं कि हे महर्षि! मेरे द्वार पर चाहे कोई भी आए, मैं अपने पूर्वजों की परंपरा के अनुसार उसे खाली हाथ वापस नहीं जाने दे सकता। इससे मेरी और मेरे पूर्वजों की कीर्ती प्रतिष्ठा गिर जाएगी। यदि ये सचमुच में ही विष्णु है तो यह मेरा सौभाग्य है कि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर खड़े हैं। यह सुनकर शुक्राचार्य क्रोधित होकर कहते हैं राजन यदि तुम इन्हें दान दोगे तो मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम श्रीहिन हो जाओ। ऐसा कहकर शुक्राचार्य वहां से चले जाते हैं।
फिर महाबली कहते हैं, हे ब्रह्मण श्रेष्ठ! मैं आपको दान दूंगा। ऐसा कहकर महाबली हाथ में जल लेकर दान का संकल्प लेकर दान का श्लोक पढ़ते हैं और कहते हैं कि भक्त प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र आपको तीन पग भूमि दान में देता है।

दान का संकल्प लेने के बाद वामन रूपी प्रभु विष्णु अपने वामन रूप में ही विराट होने लगते हैं। यह देखकर राजा और उसके सभी सेवक अचंभित होकर हाथ जोड़ लेते हैं। आसमान से देवता भी भगवान के इस रूप को देखते हैं। विराट से विराट होकर वामन भगवान अपने दो पग में ही त्रिलोक को नापकर कहते हैं, हे दैत्य राज बली! तुमने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया था। दो पग में तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप दी। इस प्रकार तुम्हारा सबकुछ मेरा हो चुका है। परंतु अभी तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई है क्योंकि अब तुम्हारे पास कुछ नहीं रहा। इसलिए तीसरा पग रखने के लिए तुम मुझे कोई स्थान नहीं दे सकते। तुम्हारा वचन झूठा हो गया।

आसमान में देखते हुए आश्चर्य चकित और अचंभित दैत्यराज महाबली कहते हैं, नहीं भगवन मैं अपने वचन को सत्य करके दिखाता हूं। आप अपना तीसरा पैर मेरे सिर पर रखिये। यह कहकर राजा अपना सिर झुका देते हैं। यह सुनकर भगवान प्रसन्न होकर अपना तीसरा पैर दैत्यराज बली के सिर पर रखकर हटा लेते हैं।

फिर भगवान विष्णु रूप में प्रकट हो जाते हैं। यह देखकर बली अति प्रसन्न होकर भगवान के हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। फिर भगवान कहते हैं, महात्मा बली तुम सचमुच दृढ़ प्रतिज्ञ हो। हम तुमसे अति प्रसन्न हैं। गुरु के श्राप और हमारी माया से भी भयभीत नहीं हुए। सबकुछ खोकर भी तुमने अपना वचन पूरा किया है। अत: हम तुम्हें वो स्थान देते हैं जो बड़े-बड़े देवताओं के लिए भी प्राप्त करना कठिन है। सावर्णि मनवंतर में तुम्हें मेरे परम भक्त इंद्र का पद प्राप्त होगा। तब तक तुम सुतल लोक में अपने दादा महाराज प्रहलाद के साथ आनंदपूर्वक निवास करोगे। तुम मुझे वहां सदा सर्वदा पास ही देखोगे। यह सुनकर बली अति प्रसन्न हो जाता है और तब भगवान वहां से अदृश्य हो जाते हैं।
सांदीपनि ऋषि से यह कथा सुनकर श्रीकहते हैं कि गुरुदेव भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं। वे चाहे तो अपने संकल्प मात्र से ही दुष्टों का नाश कर सकते हैं। फिर उन्हें इस प्रकार धरती पर स्वयं आने की क्या आवश्यकता है? यह सुनकर ऋषि कहते हैं तुमने सत्य ही कहा, इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि उनकी लीलाओं को देखकर संसार के समस्त प्राणियों में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि उसका कोई रखवाला है जो उसे हर संकट से बचा सकता है। यह विश्वास ही उसे धर्म पर दृढ़ रहने के लिए प्रेरणा देता हैं।
फिर ऋषि सांदीपनि कहते हैं कि अब तक मैंने तुम्हें भगवान के जिन अवतारों की कथा सुनाई है वे प्राय: आवेशावतार थे जो 10 और 11 कलाओं से सुशोभित थे। आज मैं तुम्हें भगवान के की कथा सुनाऊंगा जो 12 कलाओं से सुशोभित थे। इस अवतार की विशेषता ये है कि भगवान ने अपने आदर्श रूप को स्थापित किया। जिस समय श्रीराम का अवतार हुआ उसी काल में श्री परशुरामजी भी इस धरती पर उपस्थित थे। दो अवतारों का एक साथ धरती पर होना भी उस काल की विशेषता थी। परंतु पुराणों के अनुसार जब श्री परशुरामजी का श्रीराम से सामना हुआ तो परशुरामजी का अवतार काल समाप्त हो गया। एक प्रकार से श्री परशुरामजी को भी आवेशावतार ही कहा जा सकता है।
फिर सांदीपनि ऋषि सीता के स्वयंवर में परशुरामजी के आगमन और उनके द्वारा श्रीराम को विष्णु का धनुष देने की घटना को सुनाते हैं और बताते हैं कि परशुरामजी को श्रीराम में विष्णु के दर्शन हुए तो वे समझ गए कि मेरा अवतार काल समाप्त हुआ और वे उसी क्षण तपस्या के लिए चले गए। फिर सांदीपनि ऋषि भगवान श्रीराम के जन्म, बचपन और उनके गुरुकुल जाने तक की कथा सुनाते हैं। जय श्रीकृष्‍ण।

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