Shri Krishna 27 Oct Episode 169 : द्रोण की योजनानुसार रचा गरुड़ व्यूह, पांडव उलझ जाते चाल में

abhimanyu vadh
अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: बुधवार, 28 अक्टूबर 2020 (10:13 IST)
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 27 अक्टूबर के 169वें एपिसोड ( Shree Episode 169) में कर्ण के पिता सूर्यदेव श्रीके पास जाते हैं तो श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि जिस तरह इंद्रदेव ने की सहायता की है तुम भी अपने पुत्र की सहायता करो। तब सूर्यदेव कर्ण को बताते हैं कि इंद्रदेव तुमसे दान में तुम्हारे कवच कुंडल लेने आएंगे तो तुम सतर्क रहना। इस पर कर्ण कहता है कि मैं एक योद्धा हूं। दान देना मेरा धर्म है और मैं अपने धर्म से हट नहीं सकता।

संपूर्ण गीता हिन्दी अनुवाद सहित पढ़ने के लिए आगे क्लिक करें... श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


प्रतिदिन की तरह कर्ण प्रात:काल को सूर्यवंदना करते हैं तभी उसी समय इंद्र ब्राह्मण का भेष बदलकर कर्ण के पास पहुंचकर दान में उससे उसके कवच और कुंडल मांग लेते हैं। कर्ण समझ जाते हैं कि कहते हैं कि कृपया इस ब्राह्मण के भेष से निकलकर अपने असली रूप में आइये। इंद्र कहते हैं कि अच्छा तो तुम्हें अपने पिता ने सबकुछ सच बता दिया। यह सुनकर कर्ण कहता है कि परंतु निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है देवराज इंद्र आप पुत्र मोह में बहक गए थे। परंतु मैं अपने धर्म के पथ पर अटल खड़ा हूं। फिर कर्ण अपने कवच कुंडल दे देता है।
यह देखकर देवराज इंद्र कहते हैं कि हे दानवीर तुम्हारे इस अनुपम दान ने तो देवराज इंद्र की झोली को भी छोटा कर दिया है। हे अंगराज! मैं तुमसे प्रसन्न हूं और तुम्हें कोई वरदान देना चाहता हूं। मांगों क्या चाहते हो? यह सुनकर कर्ण कहता है कि क्षमा करना देवराज, दानी यदि याचक के सामने हाथ फैलाए तो इसका उससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। हे देवेंद्र मैं अपना हाथ फैलाकर दान धर्म का अपमान नहीं कर सकता।.. यह सुनकर इंद्र कहते हैं कि वाह कर्ण वाह तुम धन्य हो, तुम महादानी हो। मैं तुमसे प्रसन्न हूं और अति प्रसन्न हूं और तुम्हें एक शक्ति प्रदान करता हूं। हे दानवीर मैंने तुम्हें दिव्य वासवी शक्ति प्रदान की है। तुम जिस किसी भी योद्धा पर इसका प्रयोग करोगे, निश्चित ही उसका वध हो जाएगा। परंतु तुम इस शक्ति का प्रयोग केवल एक ही बार कर सकोगे। इसके उपरांत यह शक्ति लौटकर मेरे पास आ जाएगी।
उधर, द्रोणाचार्य एक गुप्त मंत्रणा करके बताते हैं कि पांडवों ने गुप्तचरों का जाल फैला रखा है कल रात की मंत्रणा उनकी आंखों में धूल झोंकने के लिए थी। जिसको सच मानकर पांडव इस भ्रम में रहेंगे कि हम आज साधारण युद्ध करेंगे। आप सभी को अंधेरे में रखने के लिए क्षमा चाहता हूं। तब अश्वत्थामा पूछता है कि परंतु पिताश्री पहले आप ये बताइये कि आपकी वास्तविक नीति क्या है? तब द्रोणाचार्य कहते हैं कि मैं आज चक्रव्यूह की रचना करूंगा।... यह सुनकर सभी खुश हो जाते हैं।
परंतु द्रोणाचार्य कहते हैं कि चक्रव्यूह को भेदना सिर्फ श्रीकृष्ण और अर्जुन ही जानते हैं। अर्जुन आप सब अर्जुन को उलझाकर रणभूमि के दूसरे छोर तक ले जाएं तो मैं चक्रव्यूह की रचना करूंगा। फिर हम इस चक्रव्यूह में चारों पांडवों को घेरकर उनका वध कर देंगे। यह सुनकर शकुनि कहता है कि यह कहना आसान है परंतु द्वारिकाधीश ऐसा नहीं होने देंगे, वो कुटिलों के शिरोमणी हैं। हमारी इस चाल को वो तुरंत भांप जाएंगे।
यह सुनकर द्रोणाचार्य कहते हैं कि पहली बात तो यह कि किसी को संदेह नहीं होगा, पहले मैं गरुड़ व्यूह की रचना करूंगा। फिर योजना अनुसार अर्जुन को हमारे एक विशेष योद्धा अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारेगा और भावुक अर्जुन युद्ध ना करने को अपना अपमान समझेगा और एक क्षत्रिय की भांति युद्ध करने पर विवश होगा। फिर जैसे ही युवराज दुर्योधन तीन बार शंख बजाएंगे मैं समझ जाऊंगा की अर्जुन दूर तक पहुंच गया है तब मैं व्यूह बदल दूंगा। अश्वत्थामा तुम अर्जुन के साथ साथ लगे रहना और जब अर्जुन दूर पहुंच जाए तो तुम तय करके विशेष ध्वनि में शंख बजाओ। फिर गंधार नरेश अपना शंख बजाएंगे और तब अंत में दुर्योधन जैसे ही तीन बार शंख बजाएंगे मैं समझ जाऊंगा कि अर्जुन दूर पहुंच गया है। तब गरूढ़ व्यूह की रचना चक्रव्यूह में बदल जाएगी।
अंत में द्रोणाचार्य कहते हैं कि अर्जुन को उलझाने के लिए त्रिगत देश के नरेशों को लगाना चाहिए। इस पर शकुनि कहता है कि नहीं अर्जुन के विरुद्ध कर्ण को लगाना चाहिये। दुर्योधन भी इसका समर्थन करता है परंतु यह सुनकर द्रोणाचार्य कहते हैं कि यदि हम कर्ण जैसे सर्वश्रेष्ठ योद्धा को अर्जुन के विरुद्ध लगाएंगे तो अर्जुन के पीछे पांडवों के सर्वश्रेष्ठ योद्धा अर्जुन के पीछे दीवार बनकर खड़े हो जाएंगे। ऐसे में हमारी योजन विफल हो सकती है।
फिर संजय बताता है कि महाराज कौरवों की रणनीति के अनुसार गुरु द्रोणाचार्य ने गरूढ़ व्यूह की रचना की है। यह देखकर पांडवों ने सेनापति धृष्टदुम्न ने अर्जुन से विचार विमर्ष करने के बाद शेन व्यूह की रचना की है।

द्रोणाचार्य की चाल के अनुसार गरूड़ व्यूह बनाकर त्रिगत नरेश सुशर्मा को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है कि अर्जुन को युद्ध उलझाकर मुख्‍य युद्ध भूमि से दूर ले जाया जाए और तब युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए।

अगले दिन के युद्ध में त्रिगर्त देश के दो प्रमुखों को अर्जुन से युद्ध करने के लिए लगा दिया जाता है। ये लोग अर्जुन को चुनौती देते हुए ललकारते हैं। श्रीकृष्ण सतर्क करते हैं कि यह गुरु द्रोण की कोई चाल है। तुम इन लोगों की चुनौती स्वीकार मत करो अर्जुन। ये दोनों तो तुम्हें पीठ दिखाकर भागने के लिए ललकार रहे हैं। यही तो युद्धनीति है कि तुम इनका पीछा करते करते दूर निकल जाओ। फिर गुरुद्रोण बड़े भैया को बंदी बना लेंगे। लेकिन अर्जुन कहते हैं कि मैं एक क्षत्रिय हूं और किसी के ललकारने पर पीठ दिखाकर नहीं जा सकता। तब अर्जुन त्रिगर्त नरेशों से युद्ध करने लगता है।
इधर, युधिष्ठिर इसको लेकर चिंतित हो जाते हैं कि अर्जुन तो बहुत दूर निकल गया। यदि मैं बंदी बना लिया गया तो युद्ध यहीं समाप्त हो जाएगा। नकुल कहते हैं कि अर्जुन के न होने का मतलब यह नहीं कि हम आपकी सुरक्षा नहीं कर सकते। तब भीम कहता है कि अर्जुन के अतिरिक्त गुरुद्रोण को कोई रोक नहीं सकता।

दुर्योधन के आदेश के अनुसार कृपाचार्य गरूढ़ व्यूह को चक्रव्यूह में बदलने के लिए झंडा लहराते। युधिष्‍ठिर और पांडव पक्ष को यह समझ में नहीं आता है कि ये सब क्या हो रहा है। बाद में सभी को पता चलता है कि कौरव सेना गरूढ़ व्यूह तोड़कर चक्रव्यूह बना रही है। उधर, संजय यह बताता है कि चक्रव्यूह की रचना हो गई है और अर्जुन चक्रव्यूह से दूर रणभूमि के दूसरे छोर पर युद्ध कर रहे हैं।
भीम कहता है कि चिंता करने की कोई आवश्‍यकता नहीं है भ्राताश्री। मैं अपनी गदा से कौरवों का यह चक्रव्यू तोड़ दूंगा। यह सुनकर युधिष्‍ठिर कहता है कि नहीं भीम ये असंभव है चक्रयूह गदा से नहीं तोड़े जाते। ये युद्ध योद्धाओं के बीच नहीं दो सेनाओं के बीच होता है और इसे केवल अर्जुन ही तोड़ सकता है। यह सुनकर अभिमन्यु कहता है कि मैं भी जानता हूं चक्रव्यूह को तोड़ना। यह सुनकर युधिष्‍ठिर कहता है कि क्या तुम चक्रव्यूह भेदा भी जानता हो? यह सुनकर अभिमन्यु कहता है हां जानता हूं। इस पर नकुल और सहदेव कहते हैं भ्राताश्री फिर तो हमें देर नहीं करना चाहिये क्योंकि यह चक्रव्यूह हमारे सेना को निकलने के लिए आगे बड़ रहा है।
तब युधिष्‍ठिर अभिमन्यु से कहते हैं कि चक्रव्यूह को भेदने के तुरंद बाद तुम वापस लौट आओगे। यह सुनकर अभिमन्यु कहता है कि क्षमा करें ताऊश्री मैं चक्रव्यूह भेद सकता हूं परंतु लौटने के रास्ता मैं नहीं जानता। यह सुनकर युधिष्ठिर कहता है कि क्या तुम लौटना नहीं जानते? अभिमन्यु कहता है कि नहीं? इधर, अभिमन्यु अपनी पत्नी उत्तरा से मिलकर प्रेमपूर्ण बातें करता है और अंत में वह बताता है कि मुझे चक्रव्यूह आधा ही आता है। तब अभिमन्यु बताता है कि मैंने चक्रव्यूह कैसे गर्भ में सीखा।

यह सुनकर युधिष्ठिर अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने से मना कर देते हैं और कहते हैं कि यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अर्जुन को क्या उत्तर दूंगा। तब अभिमन्यु कहता है कि यदि मैंने चक्रव्यूह ध्वस्त नहीं किया तो उस समय आप पिताजी को क्या जबाब देंगे जब हमारी सेना में लाशों के ढेर लगे होंगे और उसमें मेरी भी लाश होगी? यह सुनकर युधिष्ठिर धर्म संकट में पड़ जाते हैं तब भीम कहता है कि भ्राताश्री आप चिंता मत कीजिये में अभिमन्यु के पीछे पीछे चक्रव्यूह में घुस पड़ूंगा।

फिर अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करने लगता है और अंदर घुसता ही जाता है कि परंतु जयद्रथ आकर भीम और अन्य पांडवों को बीच में ही रोककर चक्रव्यूह में घुसने से रोक देता है। जय श्रीकृष्णा।

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा




और भी पढ़ें :