क्या है हिन्दू धर्म, जानिए

Hindu rules
Last Updated: मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022 (13:38 IST)
हमें फॉलो करें
हिन्दू धर्म को विश्‍व का सबसे प्राचीन धर्म माना जाता है। इस धर्म की उत्पत्ति कब हुई, कौन है इस धर्म के संस्थापक, क्या है इस धर्म के का नाम और कितने हैं धर्मग्रंथ, क्या है इसका दर्शन, सिद्धांत, इतिहास और कितने हैं इसके संप्रदाय। हिन्दू शब्द की उत्पति भारत की प्रमुख सभ्यता सिन्धु घटी सभ्यता, सिंधु नदी तथा भारत के प्रहरी हिमालय के नाम से मिलकर मानी जाती है। हालांकि इस धर्म का मूल नाम सनातन धर्म माना जाता है। आओ जानते हैं यहां सबकुछ।


कब हुई हिन्दू धर्म की उत्पत्ति (Origin of the word Hindustan): धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस धर्म की उत्पत्ति मावन की उत्पत्ति के पूर्व हुई थी परंतु विद्वानों के अनुसार इस धर्म का प्रारंभ स्वयंभुव मनु के काल में हुआ था। हालांकि ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस धर्म की उत्पत्ति का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से पूर्व का माना जाता है। अनुमानीत 15 हजार ईसा पूर्व इस धर्म की उत्पत्ति हुई थी।

कौन है इस धर्म के संस्थापक ( Who is the founder of this hindu religion) : इस धर्म की स्‍थापना किसी एक व्यक्ति विशेष ने नहीं की है। कहते हैं कि जिन्होंने ऋग्वेद की रचना की उन ऋषियों और उनकी परंपरा के ऋषियों ने इस धर्म की स्थापना की है। जिनमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनके साथ ही प्रारंभिक सप्तऋषियों का नाम लिया जाता है। ब्रह्म (ईश्‍वर) से सुनकर हजारों वर्ष पहले जिन्होंने वेद सुनाए, वही संस्थापक माने जाते हैं। हिन्दू धर्म वेद की वाचिक परंपरा का परिणाम है। गीता में श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि जब जब धर्म की हानि होगी मैं धर्म स्थापना के लिए आऊंगा।
हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ (Hindu scriptures) : हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों के 2 भाग हैं- 1.श्रुति और 2.स्मृति। श्रुति के अंतर्गत वेद और स्मृति के अंतर्गत पुराण, महाभारत, रामायण एवं स्मृतियां आदि हैं। वेद ही है धर्मग्रंथ, जो 4 हैं:- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों का सार उपनिषद, उपनिषदों का सार गीता है। श्रुति को ही धर्मग्रंथ माना जाता है स्मृति को नहीं। वेदों में सबसे प्राथम ऋग्वेद है। उसी में से यजु, साम और अथर्व का निर्माण हुआ। अत: ऋग्वेद ही हिन्दुओं का एकमात्र धर्मग्रंथ है। इसके अलावा उपवेद हैं- ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्य वेद- ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

हिन्दू धर्म का दर्शन (philosophy of Hinduism) : हिन्दू दर्शन मोक्ष पर आधारित है। ब्रह्मांड में आत्माएं असंख्य हैं, जो शरीर धारण कर जन्म-मरण के चक्र में घूमती रहती हैं। आत्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। मोक्ष सिर्फ भक्ति, ज्ञान और योग से ही प्राप्त होता है। यही सनातन पथ है। तत्व ज्ञान हमें ईश्‍वर, आत्मा, ब्रह्मांड, पुनर्जन्म और कर्मों के सिद्धांत के बारे में बताता है। तत्व ज्ञान दर्शन का ही एक अंग है। वेदों के अलावा उपनिषद और गीता में तत्व ज्ञान को बताया गया है। वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं।

ये 6 षड्दर्शन हैं- 1. न्याय, 2. वैशेषिक, 3. मीमांसा, 4. सांख्य 5. वेदांत और 6. योग। सांख्य एक द्वैतवादी दर्शन है। महर्षि वादरायण, जो संभवतः वेदव्यास ही हैं, का 'ब्रह्मसूत्र' और उपनिषद वेदांत दर्शन के मूल स्रोत हैं। महर्षि पतंजलि का 'योगसूत्र' योग दर्शन का प्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है। वैशेषिक दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद ने इस दार्शनिक मत द्वारा ऐसे धर्म की प्रतिष्ठा का ध्येय रखा है, जो भौतिक जीवन को बेहतर बनाए और लोकोत्तर जीवन में मोक्ष का साधन हो। न्याय दर्शन नाम से तर्क प्रधान इस प्रत्यक्ष विज्ञान की शुरुआत करने वाले अक्षपाद गौतम हैं।
एकेश्वरवाद या बहुदेववाद (monotheism or polytheism) : हिन्दू धर्म में ईश्‍वर को एक अनंत शक्ति माना गया है जो संपूर्ण ब्रह्मंड में व्याप्त है। ईश्वर एक ही है जिसे ब्रह्म कहा गया है। वेदों का एकेश्वरवाद दुनिया के अन्य धर्मों से भिन्न है। देवी, देवता और भगवान असंख्य हैं, लेकिन ब्रह्म ही सत्य है और उससे बढ़कर कोई नहीं। ब्रह्म के बाद ही त्रिदेवों की सत्ता है और उसके बाद अन्य देव और असुरों की। देव-असुरों के बाद पितरों की और पितरों के बाद मानव की सत्ता मानी गई है।

हिन्दू धर्म का सिद्धांत (doctrine or ): हिन्दू धर्म के यूं तो कई सिद्धांत है परंतु 10 सिद्धांत प्रमुख है- 1. षष्ठ कर्म का सिद्धांत (नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित और निषिद्ध) 2.पंच ऋण का सिद्धांत (देव, ऋषि, पितृ, अतिथि और जीव ऋण), 3.पुरुषार्थ का सिद्धांत (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), 4.आध्‍यात्मवाद का सिद्धांत, 5.आत्मा की अमरता का सिद्धांत, 6.ब्रह्मवाद का सिद्धांत, 7.आश्रम का सिद्धांत (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास), 8. मोक्ष मार्ग का सिद्धांत, 9. व्रत और संध्यावंदन का सिद्धांत और 10. अवतारवाद का सिद्धांत।

1. वैदिक : श्रौत परंपरा, आर्य समाज, ब्रह्म समाज, आदि।

2. शैव : पाशुपत, आगमिक, रसेश्वर, महेश्वर, कश्मीरी शैव, वीर शैव, तमिल शैव, नंदीनाथ, कालदमन, कोल, लकुलीश, कापालिक, कालामुख, लिंगायत, अघोरपंथ, दशनामी, नाथ, निरंजनी संप्रदाय-नाथ संप्रदाय से संबंधित, शैव सिद्धांत संप्रदाय (सिद्ध संप्रदाय), श्रौत शैव सिद्धांत संप्रदाय (शैवाद्वैत/शिव-विशिष्टाद्वैत) आदि।)।
3. शाक्त : श्रीकुल, कालीकुल आदि- जो सभी देवियों के उपासक हैं।

4. वैष्‍णव : भागवत, दत्तात्रेय संप्रदाय, सौर संप्रदाय, पांचरात्र मत, वैरागी, दास, रामानंद-रामावत संप्रदाय, वल्लभाचार्य का रुद्र या पुष्टिमार्ग, निम्बार्काचार्य का सनक संप्रदाय, आनंदतीर्थ का ब्रह्मा संप्रदाय, माध्व, राधावल्लभ, सखी, चैतन्य गौड़ीय, वैखानस संप्रदाय, रामसनेही संप्रदाय, कामड़िया पंथ, नामदेव का वारकरी संप्रदाय, पंचसखा संप्रदाय, अंकधारी, तेन्कलै, वडकलै, प्रणामी संप्रदाय अथवा परिणामी संप्रदाय, दामोदरिया, निजानंद संप्रदाय- कृष्ण प्रणामी संप्रदाय, उद्धव संप्रदाय- स्वामी नारायण, एक शरण समाज, श्री संप्रदाय, मणिपुरी वैष्णव, प्रार्थना समाज, रामानुज का श्रीवैष्णव, रामदास का परमार्थ आदि।

5. स्मार्त : जो स्मृति पर आधारित है। यह पंच दोवों के उपासक हैं। पंच देव अर्थात सूर्य, विष्णु दुर्गा, गणेश और शिव। गणपत्य संप्रदाय, कौमारम संप्रदाय आदि।

6. संत : शुद्ध वैदिक संप्रदाय के अलावा गायत्री परिवार, रामकृष्ण मिशन, धामी संप्रदाय, कबीरपंथ, दादूपंथ, रविदासपंथ, थियोसॉफिकल सोसाइटी, राधास्वामी सत्संग, जयगुरुदेव आदि सभी भी वैदिक परंपरा के ही वाहक हैं।
7. तांत्रिक संप्रदाय:- दक्षिणाचार, वामाचार (वाममार्ग), कौलाचार (कुलमार्ग), विद्यापीठ (वामतंत्र, यामलतंत्र, शक्तितंत्र) वैष्णव-सहजिया, त्रिक संप्रदाय और दोनों शाक्त संप्रदाय तांत्रिक संप्रदायों में भी गिने जाते हैं।
हिन्दू प्रार्थना (Hindu prayer): संध्यावंदन हिन्दू प्रार्थना का एक तरीका है। संधिकाल में ही संध्यावंदन की जाती है। संधि 8 वक्त की होती है। उसमें से सूर्य उदय और अस्त अर्थात 2 वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। प्रार्थना के कई तरीके हैं। जैसे- पूजा-आरती, भजन-कीर्तन, संध्योपासना, ध्यान-साधना आदि।

हिन्दू तीर्थ और मंदिर (Hindu pilgrimage and Temple) : तीर्थों में चारधाम, 12 ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर, 52 शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी, जगन्नाथ और प्रयाग तीर्थों में सर्वोच्च है। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना जरूरी है। पुराणों में उल्लेखित देवताओं के मंदिरों को ही मंदिर माना गया है, किसी बाबा की समाधि आदि को नहीं। मंदिर का अर्थ है- मन से दूर एक स्थान। मंदिर में आचमन के बाद संध्योपासना की जाती है।

हिन्दू त्योहार (Hindu festival) : चन्द्र और सूर्य की संक्रांतियों के अनुसार कुछ त्योहार मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति और कुंभ श्रेष्ठ हैं। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, नवरात्रि, शिवरात्रि, दीपावली, होली, वसंत पंचमी, ओणम, पोंगल, बिहू, लोहड़ी, गणेश चतुर्थी, छठ, रक्षाबंधन, भाईदूज आदि प्रमुख हैं।

हिन्दू व्रत-उपवास (Hindu fasting) : सूर्य संक्रांतियों में उत्सव, तो चन्द्र संक्रांति में व्रतों का महत्व है। उत्तरायण में उत्सव तो दक्षिणायन में व्रतों का महत्व होता है। व्रतों में एकादशी, प्रदोष और श्रावण मास ही प्रमुख व्रत हैं। साधुजन चातुर्मास अर्थात श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।
हिन्दू दान-पुण्य (Hindu charity): पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है। वेदों में 3 प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1. उत्तम, 2. मध्यम और 3. निकृष्‍टतम।

हिन्दू यज्ञ (Hindu Yagya) : यज्ञ के 5 प्रकार- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ। वेदपाठ से ब्रह्मयज्ञ, सत्संग एवं अग्निहोत्र कर्म से देवयज्ञ, श्राद्धकर्म से पितृयज्ञ, सभी प्राणियों को अन्न-जल देने से वैश्वदेवयज्ञ और मेहमानों की सेवा करने से अतिथियज्ञ संपन्न होता है।

हिन्दू 16 सोलह संस्कार (Hindu 16 Sixteen Sanskars) : गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातक्रम, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और वानप्रस्थ, परिव्राज्य या सन्न्यास, पितृमेध या अन्त्यकर्म। कुछ जगहों पर विद्यारंभ, वेदारंभ और श्राद्धकर्म का भी उल्लेख है। संस्कार से ही धर्म कायम है।

हिन्दू जीवन पद्धति (Hindu way of life ): हिन्दू धर्म विश्‍वास नहीं कर्म प्रधान धर्म है। हिन्दू धर्म में जीवन जीने के तरीकों पर जोर दिया गया है। यह जीवन पद्धति 4 पुरुषार्थ पर आधारित चार आश्रमों पर आधातिरत है। चार पुरषार्थ है- 1.धर्म 2.अर्थ, 3.काम और 4.मोक्ष। उक्त चार को दो भागों में विभक्त किया है- पहला धर्म और अर्थ। दूसरा काम और मोक्ष। काम का अर्थ है- सांसारिक सुख और मोक्ष का अर्थ है सांसारिक सुख-दुख और बंधनों से मुक्ति। इन दो पुरुषार्थ काम और मोक्ष के साधन है- अर्थ और धर्म। अर्थ से काम और धर्म से मोक्ष साधा जाता है। इन्हीं के मद्देनजर चार आश्रमों की स्थापना हुई है। चार आश्रम है- 1.ब्रह्मचर्या, 2.गृहस्थ, 3.वानप्रस्थ और 4.संन्यास।

हिन्दू कर्तव्य (Hindu duty) : कर्तव्य एक प्रकार के नियम है। जैसे 1.संध्यावंदन (वैदिक प्रार्थना और ध्यान), 2.तीर्थ (चारधाम), 3.दान (अन्न, वस्त्र और धन), 4.व्रत (श्रावण मास, एकादशी, प्रदोष), 5.पर्व (शिवरात्रि, नवरात्रि, मकर संक्रांति, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और कुंभ), 6.संस्कार (16 संस्कार), 7.पंच यज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ-श्राद्धकर्म, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ), 8.देश-धर्म सेवा, 9.वेद-गीता पाठ और 10.ईश्वर प्राणिधान (एक ईश्‍वर के प्रति समर्पण)।.

हिन्दू अनुयायी (Hindu followers) : इस धर्म के अनुयायी विश्व के अधिकांश हिस्से में पाए जाते हैं। जनसंख्‍या के मामले में हिन्दू दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। जिसके अनुनायी एशिया के कई देशों में अधिक संख्‍या में पाए जाते हैं। नेपाल और भारत एक हिन्दु बहुल देश है।



और भी पढ़ें :