सेहत 2010 : राहत भी, मुसीबत भी

बीता साल : उम्मीद की लहर पर रहा सवार

WD|
साल 2010 में चिकित्सा जगत नए-नए शब्दों से परिचय करवाता रहा। कहीं सुपर बग का शोर मचा तो कहीं एड्स जैसी लाइलाज बीमारी का जवाब खोज लेने का दावा हवा में लहराता रहा। एक अच्छी खबर चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार की हाथ लगी जिसमें टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के जनक रॉबर्ट एडवर्ड्स की झोली में यह अवॉर्ड आया। वहीं हैती में हैजे का प्रकोप तीन हजार लोगों की मौत का कारण बना। स्वाइन फ्लू का हल्ला पूरी तरह थमा नहीं और महाराष्ट्र को स्वाइन फ्लू की राजधानी का दर्जा मिल गया।

नए प्रयोग और नई खोज हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी जारी रही। कहीं खिली चेहरे पर मुस्कान तो कहीं मायूसी ही हाथ लगी। बीते वर्ष देश और विदेश की सेहत कैसी रही, प्रस्तुत है मिलीजुली खबरों के साथ तीन प्रमुख बीमारियों के आईने में एक अवलोकन :

कैंसर :
दुनिया भर के वैज्ञानिक कैंसर के इलाज के लिए नित नए प्रयोग करने में लगे हैं। बीच-बीच में सफलता के छोटे-छोटे पड़ाव भी रोगियों के लिए उम्मीद की किरण बन कर आए। बीते वर्ष कैंसर को खत्म करने की दिशा में वैज्ञानिकों ने बड़ी कामयाबी हासिल की। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने दावा किया कि उन्होंने जानलेवा बीमारी कैंसर के कारणों तथा उसका इलाज खोज लिया है।
उनके अनुसार, उन्होंने एक ऐसी दवा का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है जो आनुवांशिक आँकड़ों का उपयोग करते हुए ट्यूमर पर हमला करती है। हर साल 75 लाख से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली इस बीमारी से लड़ने में यह खोज काफी महत्वपूर्ण साबित होगी।

इस सफलता की तुलना पेनेसिलीन की खोज से की गई। जिसे दुनिया का पहला एंटीबायोटिक कहा जाता है। ब्रिटेन के कैंसर जीनोम प्रोजेक्ट के प्रमुख प्रोफेसर मार्क स्ट्राटन ने बताया कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में शोधकर्ताओं ने यह उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
उन्होंने कहा कि कैंसर के जिनोम में जितने तरह के भी बदलाव हो सकते हैं, उन सभी का पता लगाना संभव हो गया है। अब हम इस बीमारी के कारणों को पूरी तरह समझ पाएँगे। यह कैंसर की समाप्ति की शुरुआत है। पीएलएक्स 4032 नामक यह दवा त्वचा कैंसर के ट्यूमर को 80 फीसदी तक नष्ट कर सकती है।

जीन में बदलाव के कारण ही हर तरह का कैंसर होता है। गलत डीएनए की पहचान करने की दिशा में हाल के वर्षो में काफी प्रगति हुई है। जीन सिक्वेंसिंग टेक्नोलॉजी के आने के बाद इसमें तेजी आई है। जीन को निशाना बनाने वाली दवा का फायदा यह है कि वह सिर्फ बीमार कोशिकाओं पर ही हमला करती है और स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुँचाती हैं।
हालाँकि इस दवा की खोज के बाद भी शोधकर्ताओं के सामने बड़ी चुनौती है। अभी उन्हें अलग-अलग तरह के कैंसर के मामले में जीन में होने वाले सभी बदलावों का पता लगाना है। शोधकर्ताओं का लक्ष्य ट्यूमर में नजर आने वाली सभी आनुवांशिक (जेनेटिक) गड़बडि़यों की सूची बनाना है।

वहीं दूसरी तरफ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने खुलासा किया कि हर दिन संतुलित मात्रा में एस्प्रिन का सेवन कैंसर से बचाता है। 25,000 मरीज़ों पर किए गए इस शोध में सामने आया है कि हर दिन एस्प्रिन लेने वाले मरीजों में कैंसर से मौत का खतरा कम हो गया। अनुसंधान में शामिल अधिकांश मरीज ब्रिटेन के रहने वाले थे। रिसर्च में पाया गया है कि जिन मरीजों ने एस्प्रिन का सेवन किया उनमें कैंसर से मौत का खतरा 25 प्रतिशत कम हो गया।
जिन मरीजों ने एस्प्रिन का सेवन किया उनमें ना सिर्फ कैंसर बल्कि सभी बीमारियों को लेकर मौत का खतरा 10 प्रतिशत कम हो गया। अधिकतर मामलों में एस्प्रिन का इलाज चार से आठ साल तक रहता है लेकिन कुछ मामलों में इसके फायदे 20 साल तक भी देखे गए। शोध के दौरान आंत के कैंसर के खतरे में 40 प्रतिशत, फेफड़ों के कैंसर में 30 प्रतिशत, प्रोस्टेट ग्रन्थि के कैंसर में 10 प्रतिशत और श्वास की नली के कैंसर में 60 प्रतिशत की कमी आई। ब्रिटेन में कैंसर पर अनुसंधान करने वाली संस्था ‘कैंसर रिर्सच यूके’ का कहना है कि ये परिणाम सकारात्मक हैं। लेकिन जो लोग इसका सेवन करना चाहते हैं वे अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।



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