खुदरा कारोबार 2010 : विदेशी कंपनियों पर बहस

भाषा|
देश में मिले जुले खुदरा कारोबार में विदेशी कंपनियों के प्रवेश की राह अभी आसान नहीं दिखती, पर वर्ष 2010 में इस मुद्दे पर सरकार साफ शब्दों में परिचर्चा शुरू कराने में कामयाब रही।


विभिन्न राजनीतिक और व्यापारिक संगठनों के विरोध तथा गली मोहल्ले की दुकानों में लगे करोड़ों लोगों की रोजीरोटी की चिंताओं के बीच बहु ब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी कंपनियों का प्रवेश बीत रहे इस वर्ष में भी एक बड़ा संवेदनशील विषय बना रहा।

औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) ने इस विषय पर इसी साल के मध्य में परिचर्चा पत्र जारी किया। बाद में सरकार ने इस मुद्दे पर एक अंतर मंत्रालयी समिति का गठन भी किया था। समझा जाता है कि विचार-विमर्श पूरा हो गया है।
सीआईआई और फिक्की जैसे उद्योग मंडल जहाँ बहु ब्रांड रिटेल में एफडीआई की अनुमति देने की वकालत कर रहे हैं, वहीं खुदरा व्यापारियों के प्रमुख संगठन इसके पक्ष में नहीं हैं।

डीआईपीपी की ओर से जारी परिचर्चा पत्र में इस तर्क को भी शामिल किया गया है कि खुदरा कारोबार करने वाली आधुनिक कंपनियों के आने से बेहतरीन शीत भंडारण श्रंखलाओं का विकास होगा। तर्क यह भी है कि इससे ताजा कृषि उत्पादों की बर्बादी को रोका जा सकेगा और महँगाई रोकने में मदद मिलेगी।
देश में सालाना एक हजार अरब रुपए की कृषि उपज भंडारण सुविधाओं के अभाव में बर्बाद हो जाती है और यदि बेहतर ढाँचागत सुविधाएँ हों, तो इसमें से आधी बर्बादी को रोका जा सकता है।

व्यापारियों के प्रमुख संगठन कनफेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने खुदरा क्षेत्र में (एफडीआई) का विरोध करते हुए कहा कि कृषि के बाद रिटेल क्षेत्र ही ऐसा है जिसने सबसे ज्यादा लोगों को रोजी-रोटी का जरिया मुहैया कराया हुआ है।
यदि सरकार वास्तव में इस क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना चाहती है, तो उसे विदेशी कंपनियों को यहाँ बुलाने की जरूरत नहीं है। वह देश में ही छोटी-बड़ी दुकानों को आधुनिक बना सकती है उनका कंप्यूटरीकरण कर सकती है। हम इसमें पूरा सहयोग करने को तैयार हैं।

अभी केवल एकल ब्रांड खुदरा कारोबार में 51 प्रतिशत तक तथा थोक कारोबार में शतप्रतिशत एफडीआई की अनुमति है।
खुदरा कारोबार को खोलने का विरोध करने वाले आशंका जताते हैं कि इससे छोटे किराना दुकानदारों पर रोजी रोटी का संकट आ जाएगा। हालाँकि, सरकार ने परिचर्चा पत्र में इस बात पर भी राय माँगी है कि क्या इस क्षेत्र को ‘धीरे-धीरे’ खोला जा सकता है।

फ्यूचर समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) किशोर बियाणी का मानना है कि सरकार अगले कुछ माह में बहु ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति दे सकती है। हालाँकि, बियाणी का मानना है कि इस क्षेत्र में शुरुआत में सिर्फ 49 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति ही दी जानी चाहिए। बियाणी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सरकार नए साल पर रिटेल क्षेत्र को कोई तोहफा जरूर देगी।
समझा जाता है कि वाल-मार्ट और कैरफोर जैसे वैश्विक रिटेलर भारत में प्रवेश के इच्छुक हैं। उद्योग मंडल फिक्की के अनुमान के अनुसार वर्तमान में देश का खुदरा क्षेत्र कुल 435 अरब डॉलर का है।

फिक्की के निदेशक (खुदरा एवं उपभोक्ता सामान) समीर बर्डे का कहना है कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का मसला राजनीतिक अधिक है। जब तक सरकार कोई मजबूत कदम उठाने को तैयार नहीं होती, तब तक इस क्षेत्र को खोले जाने की संभावना नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से पहले वाल-मार्ट स्टोर्स इंक के सीईओ और अध्यक्ष माइक ड्यूक दिल्ली आए थे और सरकार में उच्चपदों पर बैठे लोगों से मुलाकात की थी। (भाषा)



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